कहां गए वो जुबली हिट्स के दिन?

 शनिवार, 25 अगस्त, 2012 को 07:32 IST तक के समाचार
एक था टाइगर

रा.वन, रेडी, बॉडीगार्ड, हाउसफुल और अब एक था टाइगर. इन सारी फिल्मों में क्या समानता है. सभी फिल्मों ने अपनी रिलीज के पहले ही हफ्ते में 100 करोड़ रुपए का कारोबार कर लिया.

एक समानता ये भी है कि इन सभी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के व्यवसाय में दूसरा हफ्ता आते-आते जबरदस्त गिरावट आई.

फिल्म व्यापार से जुड़े जानकारों का मानना है कि इन फिल्मों ने अपनी कुल बॉक्स ऑफिस कमाई का तकरीबन 80 से 85 फीसदी कलेक्शन पहले हफ्ते में ही कर लिया.

एक जमाना था, जब रमेश सिप्पी की 'शोले' मुंबई के मिनर्वा थिएटर में पांच साल तक चली थी. अभिनेता राजेंद्र कुमार की तो तकरीबन हर फिल्म जुबली हिट होती थी. इसी वजह से उन्हें 'जुबली कुमार' तक कहा जाने लगा था.

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इस साल रिलीज हुई ब्लॉकबस्टर अग्निपथ की भी बॉक्स ऑफिस कमाई दूसरा हफ्ता आते-आते काफी गिर गई.

90 के दशक में रिलीज हुई यश चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' मुंबई के एक थिएटर में 10 साल तक चली.

तो अब क्या वजह है कि बड़ी बड़ी ब्लॉकबस्टर कही जाने वाली फिल्में पहले हफ्ते के बाद दर्शकों को लुभा ही नहीं पातीं.

हाल के सालों की कुछ बहुत बड़ी हिट फिल्मों पर नजर डालें तो '3 इडियट्स' ही ऐसी फिल्म थी जिसने पहले हफ्ते के बाद भी दर्शकों में दिलचस्पी बनाए रखी.

फिल्म ने अपने दूसरे और तीसरे सप्ताह में भी जबरदस्त बिजनेस किया था और इसकी कुल कमाई 200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा थी.

इसी वजह से इसे हिंदी फिल्मों के इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म माना जाता है.

कॉर्पोरेट बॉम्बिंग

"पायरेसी के डर से और पूरे देश में खासतौर में मल्टीप्लेक्स के फैलाव की वजह से हर कोई पहले ही हफ्ते में अपनी फिल्म से अधिकतम मुनाफा कमा लेना चाहता है. इसमें कुछ गलत भी नहीं है. "

कोमल नाहटा, फिल्म व्यापार विशेषज्ञ

फिल्मों और फिल्म व्यापार से जुड़े लोग इसकी कई वजह बताते हैं.

80 के दशक से अब तक मिस्टर इंडिया, नो एंट्री और वॉन्टेड जैसी फिल्में बना चुके निर्माता बोनी कपूर ने बीबीसी को बताया, "दरअसल अब 'एक था टाइगर' जैसी बड़ी फिल्में तीन हजार या उससे भी ज्यादा प्रिंट्स के साथ रिलीज होती हैं. हर एक मल्टीप्लेक्स में इनके रोजाना 25-25 शो चलते हैं. तो पहला हफ्ता खत्म होते होते ज्यादातर दर्शक फिल्म देख चुके होते हैं. इसलिए अब किसी को अपनी फिल्म की सिल्वर जुबली मनाने से क्या मतलब. जब पूरी कमाई पहले ही हफ्ते में हो जाती है."

बोनी कपूर ने बताया कि हालिया रिलीज 'एक था टाइगर' 3,200 स्क्रीन पर रिलीज हुई, जबकि 80 के दशक में रिलीज उनकी फिल्म 'मिस्टर इंडिया' पूरे भारत में महज 250 थिएटर में रिलीज हुई थी.

बोनी ने बताया कि उनकी फिल्म 'वॉन्टेड' ने 8-9 सप्ताह में जितने पैसे कमाए थे, उतने पैसे 'एक था टाइगर' ने चार दिन में कमा लिए.

फिल्म व्यापार से जुड़े लोग इतने सारे प्रिंट्स के साथ फिल्म को एक साथ रिलीज करने के इस चलन को 'कॉर्पोरेट बॉम्बिंग' कहते हैं.

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एक था टाइगर 3,200 प्रिंट्स के साथ रिलीज हुई.

फिल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा कहते हैं, "पायरेसी के डर से और पूरे देश में खासतौर में मल्टीप्लेक्स के फैलाव की वजह से हर कोई पहले ही हफ्ते में अपनी फिल्म से अधिकतम मुनाफा कमा लेना चाहता है. इसमें कुछ गलत भी नहीं है. पहले फिल्मों को 7-8 सप्ताह में जितने लोग देखते थे अब उतने लोग एक हफ्ते में फिल्मों को देख लेते हैं. तो फिल्म दूसरे हफ्ते तक दम भी तोड़ दे तो किसी को कोई शिकायत नहीं होती."

भावनात्मक जुड़ाव की कमी

लेकिन क्या सिर्फ यही एक वजह है फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर उम्र कम होने की, या कोई और भी वजह है.

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी मानती हैं कि आजकल की बड़ी बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों से भी दर्शक जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता जैसे पहले की हिट फिल्मों के साथ होता था.

नम्रता कहती हैं, "रेडी, बॉडीगार्ड और एक था टाइगर ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई की. लेकिन आज मैं बैठकर सोचूं तो मुझे रेडी और बॉडीगार्ड का एक भी दृश्य याद नहीं आता. फिल्में पैसे तो कमा रही हैं लेकिन लोग थिएटर से निकलते ही उन्हें भुला देते हैं. हाल की किसी भी बड़ी ब्लॉकबस्टर को आप क्लासिक का दर्जा नहीं दे सकते."

नम्रता की राय है कि कुछ हद तक दर्शक भी इसके लिए दोषी हैं.

राऊडी राठौर

आज फिल्मों का जितना प्रचार किया जाता है, उतना पहले कभी नहीं होता था.

वो बताती हैं, "पहले दर्शक फिल्म देखने के लिए फिल्म देखता था. अब सोचते हैं कि चलो शॉपिंग करने निकले हैं, खाने-पीने निकले हैं तो फिल्म भी देख लेते हैं. मानो फिल्म देखने और पॉपकार्न खाने में कोई फर्क ही नहीं रह गया हो. ऐसे दर्शक ही रेडी, बॉडीगार्ड या राऊडी राठौर जैसी फिल्मों को हिट बनाते हैं."

कोमल नाहटा भी मानते हैं कि सारा खेल शुरुआती तीन दिनों का हो गया है.

वो कहते हैं, "बड़ा स्टार ले लो. फिल्म का धुआंधार प्रमोशन कर लो. उसमें आइटम सॉन्ग डाल दो. बस पहले हफ्ते भीड़ जुट जाएगी. इसलिए लोग कहानी पर नहीं बल्कि फिल्म की पैकेजिंग पर ध्यान देते हैं."

बोनी कपूर भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं.

तो क्या इस दौर में ऐसी फिल्में बनाना मुश्किल है जो पहले हफ्ते की सीमा रेखा को पार कर सकें.

नम्रता इत्तेफाक कहती हैं कि 3 इडियट्स और उससे पहले लगान और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों ने दिखाया कि कहानी में दम हो तो दर्शकों को फिल्म से पहले हफ्ते के बाद भी जोड़े रखा जा सकता है. ऐसी ही और फिल्मों की जरूरत है.

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