गीत छापने की मशीन नहीं गीतकार: प्रसून

 रविवार, 30 सितंबर, 2012 को 08:15 IST तक के समाचार
प्रसून जोशी

प्रसून जोशी आजकल बॉलीवुड के सबसे कामयाब गीतकारों में शुमार होते हैं.

हिंदी फिल्मों में गीतों की क्या अहमियत है, शायद किसी को बताने की जरूरत नहीं है. बोल खूबसूरत हों तो गाने में चार चांद लग जाते हैं और इससे फिल्म की लोकप्रियता भी बढ़ जाती है.

इस हुनर में प्रसून जोशी खासे माहिर हैं जिन्होंने एक से बढ़कर एक गीत लिखे हैं.

पेश है उनके साथ बीबीसी की खास बातचीत, जिसमें उन्होंने बॉलीवुड और गीत लेखन पर विस्तार से बात कीः

बहुत से लोगों के लिए आप उम्दा गीतकार हैं. आपकी नजर में बेहतरीन गीतकार कौन होता है?

काफी मुश्किल सवाल है क्योंकि बहुत सारे दिग्गज लोगों ने इस विधा में काम किया है. मुझे गर्व है कि मैं भी इस परंपरा का हिस्सा हूँ. लेकिन ये बताना आसान नहीं है कि आखिर ऐसा क्या है, जो किसी फिल्म के गीत को सुंदर बनाता है. भाषा शायद मायने रखती है- क्या कहा जा रहा है और कैसे कहा जा रहा है, उसमें क्या नयापन है और कितना प्रयोग किया गया है, ये बहुत अहम है. ये सब चीज़ें गाने को खूबसूरत बनाती हैं. सबसे जरूरी है ये देखना कि गाना लोगों के दिलों में उतरा या नहीं.

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किसी अभिनेता से पूछो कि फिल्म करने से पहले वे किन चीजों पर गौर करते हैं तो जवाब मिलता है कहानी. आप गीत लिखने के लिए हाँ बोलते हैं, तो क्या देखते हैं?

मैं कई बार फिल्म की कहानी खुद ही लिखता हूँ. जैसे 'भाग मिल्खा भाग' की कहानी मैने लिखी है. 'रंग दे बसंती' के डायलॉग मैने ही लिखे हैं. इसलिए कई बार तो मेरा काम आसान हो जाता है. लेकिन जब फिल्म एकदम नई होती है, तो मैं ये देखता हूँ कि मुझे इस काम में क्या नया करने और सीखने को मिलेगा. मेरा काम ये नहीं है कि मैं मशीन की तरह गीत छापता जाऊं. गीत लिखना खुद को समझने और सुलझाने की प्रक्रिया भी है.

जब 'तारे जमीं पर' मिली तो उससे पहले मैने बच्चों के बारे में सोचा नहीं था. पर इसके गीत लिखते समय मुझे अहसास हुआ कि कितनी सुंदर दुनिया है. फिल्म के टाइटल सॉन्ग में बच्चों को मैने कई उपमाएं दीं हैं- देखो इन्हें ये हैं ओस कि बूंदें, पत्तों की गोद में आसमां से कूदें. अंगड़ाई लें फिर करवट बदल के, नाजुक से मोती हंस दें फिसल के, खो न जाएं ये तारे जमीं पर.

या जब मैं 'दिल्ली 6' के गाने लिखता हूं तो मुझे पुरानी दिल्ली की संस्कृति के बारे में पता चलता है. जब लव सॉन्ग लिखता हूँ तो सोचता हूँ कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के बारे में क्या सोच सकता है. यानी जहां मुझे भी खुद को समझने का मौका मिले, वही गीत मुझे अच्छा लगता है.

बहुत से छोटे फिल्मकार भी होते हैं जिनके पास पैसे नहीं होते. क्या आप ऐसी किसी फिल्म से जुड़ते हैं जहां आपको पता है कि पैसे नहीं मिलेंगे लेकिन कहानी अच्छी है.

प्रसून जोशी ने भाग मिलखा भाग की कहानी भी लिखी है

बिल्कुल. दो फिल्में मैने अभी की हैं. 'देख इंडियन सर्कस' के लिए मैने कुछ भी फीस नहीं ली. दूसरी है 'चिट्गांव' जो रिलीज़ होगी. मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनूं. पैसा ही सब कुछ नहीं है.

हां कुछ मजबूरियाँ होती हैं कि थोड़ा बहुत पैसा चाहिए ही होता है. पर मैं ऐसे लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश करता हूं.

आप गीत लिखते हैं, कई फिल्मों के डायलॉग भी लिखे हैं. 'भाग मिल्खा भाग' की कहानी भी लिखी. क्या इसके बाद डाइरेक्टर बनने का सोचा है?

निर्देशन के ऑफर मेरे पास आते रहते हैं. जिस दिन मुझे लगेगा कि अब लेखन से आगे बढ़कर खुद फिल्म बनानी चाहिए तो जरूर करूंगा. 'भाग मिल्खा भाग' में मैं लेखक बनकर संतुष्ट हूँ. मुझे लगता है कि राकेश मेहरा इसके साथ न्याय करेंगे. जिस दिन मुझे लगेगा कि कोई मेरी कहानी के साथ न्याय नहीं हो पाएगा, तो मैं खुद निर्देशन करूंगा.

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