हीरोइन: हुस्न है, हुनर भी पर पैसा नहीं

करीब चार साल पहले विद्या बालन से एक इंटरव्यू के दौरान मैने उनसे हीरोइनों के प्रति फिल्म इंडस्ट्री के रवैये पर सवाल पूछा था.

तब उनका जवाब था, “कॉमर्शियल स्तर पर फ़िल्म आज भी हीरो के नाम पर चलती है. आमतौर पर ऐसी फ़िल्म निर्माता के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं होती जो हीरोइन के इर्द-गिर्द घूमती हों. हीरो-हीरोइन की फ़ीस में यहाँ बहुत अंतर होता है.”

देखा जाए तो चार साल में बहुत कुछ बदल गया है. विद्या की इश्किया परवान चढ़ी, हीरोइन के इर्द गिर्द घूमती द डर्टी पिक्चर से विद्या सफलता की नई ‘कहानी’ लिख चुकी हैं. उन्हें विद्या बालन नहीं ‘विद्या बालन खान’ बोला जा रहा है.

पर आज भी विद्या की कमाई किसी खान जितनी हो पाई है? क्या उन्हें भी टॉप अभिनेताओं जैसी फीस मिलती है? करीना जैसी टॉप हीरोइनों की शिकायत है कि उन्हें शाहरुख या सलमान की तरह मोटी रकम वाले चेक नहीं मिलते.

करीना, कटरीना-सलमान की फीस का फर्क

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि अपने कई दशकों के करियर में उन्होंने यही देखा है कि हीरो और हीरोइन की फ़ीस में ज़मीन आसमान का अंतर रहा है.

अतीत पर नज़र डालते हुए वे कहते हैं, “अगर 1933 मे बनी सीता राम के लिए पृथ्वीराज कपूर को 50 हज़ार मिले थे और सीता बनी दुर्गा खोटे को 10 हज़ार. जब नरगिस, नूतन, मधुबाला और मीनाकुमारी जैसी धुरंधर अभिनेत्रियों का बोलबाला था तो भी उनकी फीस हीरो से कम होती थी. हाँ ये ज़रूर है कि अंतर ज़मीन आसमान का नहीं था. हीरो को पाँच लाख मिलते थे और हीरोइन को ढाई लाख.”

हालांकि इंडस्ट्री में कई लोग आज भी इस पर खुल कर बात नहीं करते. अभिनेत्री श्रीदेवी से जब फीस में अंतर के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था, "मैं ऐसा नहीं मानती. हीरोइन को भी अच्छा पैसा मिलता है. वे इसकी हकदार भी हैं.”

श्रीदेवी ने ये ज़रूर कहा कि हीरोइन को भी अच्छा पैसा मिलता है पर इस पर ज़्यादा कुछ नहीं बोलीं कि हीरो से कम क्यों मिलता है.

जैसा समाज में, वैसा फिल्मों में

तो मेहनताने में इस ‘भेदभाव’ का क्या कारण है? अपनी फिल्म हीरोइन को फिल्म उद्योग का आइना बताने वाले मधुर भंडारकर बिना लाग लपेट के कहते हैं, “लोग फिल्म देखने जाते हैं तो पूछते हैं कि हीरो कौन है, ये नहीं पूछते हीरोइन कौन है. हीरो फिल्म को कमर्शियल स्तर पर लेकर जा सकता है. हीरोइन तो उठ कर दस लोगों को पीट नहीं सकती, कहीं भी उठकर गाना नहीं गा सकती. लोगों की मानसिकता है कि वो बड़े हीरो की ही फिल्में देखेंगे.”

कई अभिनेत्रियाँ फीस में विशाल अंतर के लिए पुरुष प्रधान सामाजिक ढाँचे को ही ज़िम्मेदार मानती हैं.

रानी मुखर्जी भी फ़ीस में भेदभाव को सामाजिक ढाँचे से ही जोड़कर देखती हैं. वे कहती हैं, “ज़्यादातर महिलाएँ हिंदुस्तान में पतियों का ध्यान रखती हैं, खाना बनाती है. आम भारतीय महिला खुद से टिकट कटाकर सिनेमाहॉल में फिल्म देखने नहीं जाती है. उसे घर में पाइरेटेड सीडी पर फिल्म देखने को मिलती है. अगर ये चीज़ बदल जाए, अगर बड़ी संख्या में महिलाएँ भी खुद से फिल्में देखने जाने लगें तो इसका असर फिल्मों और हमारी फीस पर सीधा-सीधा पड़ेगा.”

तो क्या ये समझा जाए कि अगर महिलाएँ दर्शकों के रूप में एक बड़ा बाज़ार बनकर उभरे तो हीरोइन की भी अहमियत बढ़ेगी या महिला प्रधान फिल्में और बनेंगी और हीरोइन को ज़्यादा पैसे भी मिलेंगे?

विद्या सच में बन पाएँगी खान?

मिसाल के तौर पर करीना कपूर की फिल्म हीरोइन का काफी जलवा है लेकिन बताया यही जा रहा है कि उनकी ये फिल्म डिस्ट्रिब्यूटरों में उतने ऊँचे दाम में नहीं बिकी जितनी कि किसी सलमान या शाहरुख़ की बिकती. ज़ाहिर है निर्माता भी इस बात को पहले से ही जानता है और हीरोइन की फीस भी उसी अनुपात से रखता है.

फिल्म कारोबार से जुड़े लोग भविष्य को लेकर ज़्यादा आशावान नहीं हैं. जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, “विद्या बालन ने द डर्टी पिक्चर जैसी हिट दी है. लेकिन आपको क्या लगता है कि उनकी और इमरान हाशमी की आने वाली फिल्म घनचक्कर में विद्या को इमरान से कई गुना ज़्यादा पैसा मिलेगा.. ऐसा नहीं होगा.”

ट्रेड एनेलिस्ट कोमल नाहटा भी नाउम्मीद हैं. वे कहते हैं , “जितना पैसा हीरो को मिलता है अगर हीरोइन को भी देने लगें तो प्रोड्यूसर का दीवालिया निकल जाएगा क्योंकि लोग हीरो के नाम पर ही फिल्म देखते हैं. मुझे नहीं लगता है कि हीरोइन को कभी भी उतने पैसे मिलेंगे जितने हीरो को मिलते हैं.”

ये सवाल मुझे घूमाफिरा कर विद्या बालन के उसी जवाब पर ले आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि कॉमर्शियल स्तर पर फ़िल्म आज भी हीरो के नाम पर चलती है और ऐसी फ़िल्म निर्माता के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं होती.

शायद इसीलिए बॉलीवुड की हीरोइन मेहनत तो करती है पर मेहनताने और मेहनत का ग्राफ आपस में मेल नहीं खाता.

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