किसने सिखाया शबाना आजमी को हंसना

  • 29 सितंबर 2012
शबाना आज़मी
Image caption शबाना ने फिल्मों में अपनी शुरुआत श्याम बेनेगल की फिल्म अंकुर से की.

जिनकी मुस्कुराहट पर गाने बने हो जैसे कि 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', अगर वो ही आप से कहें कि एक ज़माने में वो मुस्कुराने से सिर्फ इसलिए कतराती थी क्योंकि उनके दांतों का मज़ाक उड़ाया जाता था तो इस बात पर यकीन करना ज़रा मुश्किल है.

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में खुद शबाना आज़मी ने इस बात का खुलासा कुछ इस अंदाज़ में किया, ''मेरे दांत थोड़े उभरे हुए हैं, तो जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की उस वक़्त जो फ़िल्मी पत्रिकाएं आती थी उनमें मेरे दांतों का बड़ा मज़ाक उड़ाया जाता था. मैं अपने दांतों को लेकर, अपनी हंसी को लेकर बहुत ही झिझकने लगी थी.''

लेकिन आज तो ऐसा नहीं है, आज तो शबाना खुल कर हसती हैं, तो किसने जगाया उनमें ये विश्वास?

इस सवाल का जवाब भी दिया शबाना ने. वो कहती हैं, ''महेश भट्ट ने मुझसे कहा कि क्यों तुम अपनी मुस्कुराहट को छुपाने की कोशिश करती हो. क्या तुम्हें ये लगता है कि मुस्कुराहट का दांतों से कोई वास्ता है. इसका ताल्लुक तो सीधा आँखों से है. अगर आप सच्चाई से हसेंगे तो वो लोगों तक ज़रूर पहुंचेगी. भट्ट साहब की ये बात सुनकर मुझे ऐसा लगा कि मानो किसी जोगी ने मुझे एक नुस्खा बता दिया हो. इस बात को सुनकर मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया.''

'इतना बत्तीसी दिखाना ठीक नहीं'

आत्मविश्वास क्या लौटा शबाना ने तो खुल कर हंसना शुरू कर दिया. अब उनकी इस हंसी पर भी एक खास टिप्पणी महेश भट्ट ने की.

शबाना कहती हैं, ''भट्ट साहब की बात सुनकर मैं बहुत हंसती थी, खुलकर हंसती थी, तब भट्ट साहब ने बड़े ही मज़ाकिया अंदाज़ में मुझसे ये कहा कि भई हर बार अपनी बत्तीसी दिखाने की ज़रूरत नहीं है. आज जब मुझसे लोग कहते हैं कि मेरी मुस्कुराहट बहुत अच्छी है तो मैं बोलती हूं कि एक ज़माना ऐसा था जब मैं अपने दांत छुपा कर रखती थी क्योंकि लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे.''

दांत तो दांत बतौर अभिनेत्री एक और कमी के कारण शबाना को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी. अब आप सोचेंगे कि अपनी पहली ही फिल्म 'अंकुर' के लिए जिसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता हो उसमें कोई कमी कैसे हो सकती है भला.

लेकिन ज़रा शबाना जी की बात पर गौर फरमाइए. वो कहती हैं, ''मुझे नाचना नहीं आता था. न तब आता था जब मैंने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की थी और न ही आज आता है. इस बात की वजह से एक-आद बार मुझे बेइज्ज्ती सहनी पड़ी.''

'जो रोल पसंद आते हैं करती हूं'

ये तो बात हुई उस ज़माने की लेकिन आजकल कम ही फिल्मों में क्यों नज़र आती हैं शबाना?

वो कहती हैं, ''देखिए ऐसा है जो रोल मेरे पास आते हैं उनमें से जो किरदार मुझे पसंद आते हैं वो मैं कर लेती हूं जो नहीं आते उन्हें मैं नहीं करती. इस साल मैंने तीन फिल्में की हैं, साथ ही मैं रंगमंच से जुड़ी हूं और उसमें भी मैं व्यस्त रहती हूं.''

अपनी बात को पूरा करते हुए शबाना कहती हैं, ''मेरी फिल्में करने की वजह साफ़ है, अगर मुझे लगता है कि मैं किसी फिल्म में काम करके किसी की मदद कर सकती हूं तो मैं वो फिल्म कर लेती हूँ. या फिर मुझे लगता है कि रोल अच्छा है. ये भी हो सकता है कि फिल्म छोटी है लेकिन जो संदेश वो देना चाह रही है वो ज़रूरी है तो मैं वो फिल्म कर लेती हूं. या कभी पैसा अच्छा मिल जाता है. लेकिन हां ये भी है कि आज फिल्में करना मेरी मजबूरी नहीं है.''

शबाना आज़मी जल्द ही मीरा नायर की फिल्म 'द रिलेक्टेंट फंडामेंटलिस्ट' और दीपा मेहता की फिल्म 'मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' में नज़र आएंगी.

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