डॉक्टर बनना चाहती थी आशा पारेख

आशा पारेख
Image caption आशा पारेख को सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है.

बीते ज़माने की मशहूर अभिनेत्री आशा पारेख आज 70 वर्ष की हो गई हैं. बतौर अभिनेत्री 'दिल देके देखो' से हिंदी फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत करने वाली आशा पारेख ने बीबीसी को बताया कि बचपन में तो उनकी आँखों में कुछ और ही सपने थे.

आशा जी कहती हैं कि बचपन में वो डॉक्टर बनना चाहती थी. तो आशा जी के साथ ऐसा क्या हुआ कि उनका इरादा बदल गया?

अपना इरादा बदलने की वजह बताते हुए वो कहती हैं, ''मेरा स्कूल शहर से थोड़ा दूर था. एक दिन जब मैं स्कूल जा रही थी तो रास्ते में एक आदमी का एक्सीडेंट हो गया. वो आदमी खून मैं लतपत पड़ा था. मुझसे वो खून देखा नहीं गया. उस दिन मेरी समझ में आ गया कि भई मैं डॉक्टर तो नहीं बन सकती. फिर मैंने सोचा कि मैं सिविल सर्विस में भर्ती हो देश की सेवा करुँगी. लेकिन मेरी किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था.''

जिस वक़्त आशा जी के पास 'दिल देके देखो' का ऑफर आया उस वक़्त आशा जी दसवी कक्षा की छात्र थी. लेकिन 1959 में इस फिल्म में बतौर अभिनेत्री अपनी शुरुआत करने से पहले उन्होंने फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में भी काम किया. तो ये मौका उन्हें कैसे मिला?

इस सवाल के जवाब में आशा जी कहती हैं, ''मैं स्टेज पर काम किया करती थी. मेरे काम को देख कर स्वर्गीय बिमल रॉय ने मुझे बुलाया और मुझसे पूछा कि

क्या मैं फिल्मों में काम करना चाहूंगी. उस वक़्त मैं बहुत छोटी थी मैंने हाँ कर दी और इस तरह से मैंने 'बाप-बेटी' में काम किया.''

क्या आप जानते हैं कि करियर की शुरुआत में आशा जी को एक फिल्म से सिर्फ दो दिन की शूटिंग के बाद ही निकाल दिया गया. इस किस्से को भी बंटा आशा पारेख ने बीबीसी के साथ.

वो कहती हैं, ''मैंने कम उम्र में विजय भट्ट जी के साथ 'चैतन्य महाप्रभु' में काम किया था. जब में 16 साल की हुई तो उन्होंने मेरे सामने 'गूंज उठी शहनाई' का प्रस्ताव रखा और कहा कि वो मुझे हीरोइन का रोल दे रहे हैं. दो दिन की शूटिंग के बाद न जाने क्या हुआ और विजय भट्ट ने कहा कि इस लड़की में स्टार वाली कोई बात नहीं है. ये नहीं चलेगी. और बस मुझे फिल्म से निकाल दिया गया.''

लेकिन कहते हैं न जो होता है अच्छे के लिए ही होता है. अगर आशा जी को 'गूंज उठी शहनाई' से न निकाला जाता तो 'दिल देके देखो' में उन्हें शम्मी कपूर के साथ बॉलीवुड में डेब्यू करने का मौका कैसे मिलता.

वैसे ये आशा जी की किस्मत ही थी कि उन्हें इस फिल्म में काम करने का मौका मिला. फिल्म के निर्देशक नासिर हुसैन चाहते थे कि इस रोल के लिए वो आशा पारेख और उस ज़माने की दूसरी मशहूर अभिनेत्री साधना दोनों का स्क्रीन टेस्ट लें.

जिस दिन ये टेस्ट होना था उस दिन साधना बीमार पड़ गई और आ नहीं पाई और दिन भर आशा जी अकेले ही शूट करती रही. नासिर साहब को आशा जी का काम पसंद आया और उन्हें ये फिल्म मिल गई.

और बस इसके बाद तो एक के बाद एक लगातार आशा जी ने कई हिट फिल्में दी. तीसरी मंजिल, लव इन टोक्यो, उपकार, कटी पतंग और मेरा गाँव मेरा देश उनकी कई यादगार फिल्मों में से हैं.

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