कैसी है रानी की 'अइय्या': फ़िल्म समीक्षा

  • 12 अक्तूबर 2012

ज़िंदगी को लेकर मस्तमौला रवैया, इस थीम पर बनी फिल्मों की कमी नहीं है. लेकिन ऐसी फिल्मों में केंद्रीय पात्र लड़की का हो, ऐसी फिल्में बहुत कम बनी हैं.

नवोदित निर्देशक सचिन कुंदलकर ने अपनी इस फिल्म में एक लड़की की ख्वाहिशों और उसके सपनों की दास्तां कही है. 'अइय्या' एक बेतुकी फिल्म के रूप में सामने आई है. हां, फिल्म की मुख्य किरदार मीनाक्षी नाम की एक मिडिल क्लास लड़की है, जिसे सच्चे प्यार की तलाश है ये किरदार काफी वास्तविक लगता है. लेकिन अगर आप ऋषिकेश मुखर्जी के रियलिस्टिक और सिंपलिस्टिक सिनेमा की तलाश में ये फिल्म देखना जाएगे तो आपको भरपूर निराशा हाथ लगेगी.

एक लड़की, जो अपने सपने पूरा करना चाहती है. उसकी ज़िंदगी में कई दिक्कतें आती हैं जो उसे उसकी मंज़िल तक पहुंचने से रोकती हैं. लेकिन शायद ये पहला मौका है जब किसी हिंदी फिल्म में एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की किसी 'हंक' के सपने देखती है.

फिल्म की कहानी

Image caption मलयालम अभिनेता पृथ्वीराज की ये पहली हिंदी फिल्म है. वो स्क्रीन पर काफी अच्छे लगते हैं.

मीनाक्षी (रानी मुखर्जी) एक मराठी देशपांडे परिवार की लड़की है. उसकी मां को उसकी शादी की चिंता सताती रहती है और वो हमेशा उसके लिए उपयुक्त दुल्हे की तलाश में व्यस्त रहती है. उसके परिवार में उसकी बीमार दादी एक असहाय बेचारा पिता और एक छोटा भाई है, जो 'किसी काम का नहीं' है. जो सिर्फ गली के आवारा कुत्तों की ही चिंता में लगा रहता है.

मीनाक्षी एक कॉलेज में नौकरी करने लगती है ताकि वो अपने परिवार से कुछ समय के लिए ही सही थोड़ा दूर हो सके.

वहां, उसकी मुलाकात एक चित्रकार सूर्या (पृथ्वीराज) से होती है. और उसे देखते ही वो उस पर फिदा हो जाती है. वो उससे बात भी नहीं करती लेकिन सूर्या की 'खुशबू' की वजह से वो उसके करीब चली जाती है. बल्कि उसे किसी मर्द की सबसे ज़्यादा कोई बात आकर्षित करती है तो वो 'खुशबू' ही होती है.

इस बीच उसके मां-बाप उसकी सगाई माधव (सुबोध भावे) से करा देते हैं. वो काफी सीधा सादा इंसान है. उसे सीधी सरल रोमांटिक फिल्में अच्छी लगती हैं. वो मीनाक्षी के चुलबुले व्यवहार से बिलकुल जुदा होता है.

लेकिन फिर मीनाक्षी के सूर्या के प्रति लगाव का क्या होता है. वो कई बार उसका पीछा करती है. एक बार तो उसके घर तक पहुंच जाती है. लेकिन फिर भी उसे बातचीत करने का साहस नहीं जुटा पाती.

लचर है फिल्म

फिल्म की थीम काफी दिलचस्प है. फिल्म में रानी, बहुत खूबसूरत लगी हैं. उन्होंने अपने रोल को बहुत बेहतरीन तरीके से निभाया भी है. अपने प्रशंसकों का दिल जीतने की हर मुमकिन कोशिश की है.

लेकिन फिल्म के किरदार काफी लाऊड किस्म के हैं जो कि इसके लिए काफी नुकसानदायक साबित हुए हैं. फिल्म में हास्य परिस्थितियां पैदा करने की बड़ी नाकामयाब और हल्की कोशिशें हैं.

फिल्म की लंबाई भी इसकी एक बहुत बड़ी कमी है. और दर्शक थोड़ी देर के बाद बोर होना शुरू हो जाते हैं.

मलयालम फिल्मों के मुख्य कलाकार पृथ्वीराज की ये पहली हिंदी फिल्म है. उनकी स्क्रीन प्रजेंस ज़बरदस्त है. सुबोध भावे ने भी अच्छा काम किया है. लेकिन फिल्म का मुख्य आकर्षण रानी मुखर्जी ही हैं.

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