यश चोपड़ा: रोमांस से परे साहसी फिल्मकार की दास्तां

मेरी टेढ़ी मेढ़ी कहानियाँ, मेरे हँसते रोते ख़्वाब

कुछ सुरीले बेसुरे गीत मेरे

कुछ अच्छे बुरे किरदार

वो सब मेरे हैं., उन सबमें मैं हूँ

बस भूल न जाना, रखना याद मुझे..जब तक है जान

मीडिया में आए ये आख़िरी शब्द थे जो निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा ने कुछ दिन पहले अपने सम्मान में रखे एक मीडिया कार्यक्रम में कहे थे.

सुनिए यश चोपड़ा- रोमांस के जादूगर की कहानी

इन पंक्तियों के एक-एक शब्द जैसे उनके जीवन की कहानी कहते हैं. आज की पीढ़ी जिस तरह शाहरुख़ ख़ान को किंग ऑफ़ रोमांस कहती है वैसे ही निर्माता- निर्देशकों में ये ख़िताब बेशक यश चोपड़ा को जाता है.

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मुझे याद है कि कुछ साल पहले जब मैं स्विट्ज़रलैंड गई थी तो स्थानीय लोगों ने बताया था कि स्विट्ज़रलैंड में यश चोपड़ा के नाम पर एक झील है क्योंकि अपनी कई रोमांटिक फ़िल्में उन्होंने यहीं फ़िल्माई थीं.

लेकिन यश चोपड़ा की शख्सियत को केवल रोमांस में बाँधना उनके साथ बेइंसाफ़ी होगी. आज भले ही उन्हें केवल मोहब्बत और रोमांस के लिए याद किया जाता है लेकिन 60 और 70 के दशक में उनकी सृजनशीलता बिल्कुल दूसरे शिखर पर थी.

रोमांस के चश्मे से परे भी बनाई फिल्में

अपने बड़े भाई के साथ फ़िल्मों में काम करने के बाद यश चोपड़ा की निर्देशन में नींव 1959 में धूल का फूल और धर्मपुत्र जैसे सामाजिक विषयों वाली फ़िल्मों से पड़ी थी.

धर्मपुत्र में उन्होंने बंटवारे के ज़ख्म लोगों के सामने रखे तो 1965 में उन्होंने फ़िल्म वक़्त के ज़रिए करारा प्रहार किया. कौन भूल सकता है वक़्त का वो गाना- ओ मेरी ज़ोहरा जबीं..

इतने बड़े पैमाने पर मल्टीस्टारर फ़िल्म शायद लोगों ने नहीं देखी थी. परिवार के बिछड़ने और मिलने का जो फ़ॉर्मूला वक़्त में उन्होंने अपनाया वो हिंदी सिनेमा में बरसों बरस चलता रहा और चल रहा है.

यश चोपड़ा के निधन पर बॉलीवुड की प्रतिक्रिया

हाल के बर्षों में यश चोपड़ा पर एक तरह की या केवल रुमानी फ़िल्में बनाने का आरोप लगता रहा है. लेकिन यश चोपड़ा को केवल रोमांस के चश्मे से देखने वालों को शायद उनकी फ़िल्म इत्तेफ़ाक़ देखनी होगी. 24 घंटों में सिमटी ऐसी स्पसेंस फ़िल्म मैने हिंदी सिनेमा में कम ही देखी है.

पाकिस्तान में जन्मे यश चोपड़ा पर परिवार से इंजीनियर बनने का दबाव था लेकिन यश चोपड़ा को तो फ़िल्मों का रोग लग चुका था. सो अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा के पास वो भी मुंबई आ गए.

70 के दशक में उन्होंने एक से एक बेमिसाल फ़िल्में बनाईं. अमिताभ बच्चन-सलीम जावेद-यश चोपड़ा के घातक तालमेल ने दीवार और त्रिशूल जैसी फ़िल्में दीं. अमिताभ बच्चन को बुलंदियों पर पहुँचाने में यश चोपड़ा का भी हाथ रहा. दाग़ में दो पत्नियों के बीच संघर्ष करते व्यक्ति की दास्तां कहने की हिम्मत तब उन्होंने की.

जीवन की वास्तविकता और कठोर सच्चाईयों से रूबरू करवातीं फ़िल्मों के बीच उन्होंने सिलसिला और कभी कभी भी दी.

भटकाव वाला दौर

80 का दशक यश चोपड़ा के लिए भटकाव वाला दौर रहा. दर्शक के तौर पर मैं 80 के दौर की उनकी ज़्यादातर फ़िल्मों से सामांजस्य नहीं बना पाई.

एक इंटरव्यू में ख़ुद यश चोपड़ा ने कहा था कि 80 के दौर में उन्हें अपनी ही एक फ़िल्म का पोस्टर देखकर लगा था कि उनकी फ़िल्मों में केवल पोस्टर पर से सितारों के चेहरे बदल रहे हैं, कहानी वही रहती है. तब उन्होंने चाँदनी बनाई.

स्विट्ज़रलैंड की वादियाँ, ख़ूबसूरत नज़ारे, रोमांस का ऐसा ताना बाना उन्होंने बुना कि हर ओर वाक़ई चाँदनी बिखर गई.

कहना ग़लत नहीं होगा कि यश चोपड़ा ख़ूबसूरती के पुजारी थे. रुपहले पर्दे पर हुस्न को कैसे चार चाँद लगाए जाते हैं, इसमें यश चोपड़ा माहिर थे. श्रीदेवी, जूही चावला, माधुरी दीक्षित की फ़िल्में इसकी मिसाल हैं.

जब तक रही जान

पिछले 10-15 सालों में उन्होंने लम्हे, दिल तो पागल है और वीर ज़ारा जैसी चुनिंदा फ़िल्में ही निर्देशित की. लेकिन यश चोपड़ा को एक और योगदान के लिए याद रखा जाएगा. वे पर्दे के पीछे ही रहे पर उनके प्रोडक्शन हाउस यश राज फिल्मस के बैनर तले पिछले एक दशक में कई फ़िल्में बनीं.

कुछ ख़राब फ़िल्में बनीं, कुछ औसत तो कुछ बेहतरीन पर इसी बहाने कई अभिनेताओं, अभिनेत्रियाँ, निर्देशकों, तकनीशियनों को अपनी ज़मीन तलाशने का मौक़ा मिला. शाहरुख़ भी यहीं से निकले हैं. अमिताभ जब दूसरी पारी में काम की तलाश में थे तो यश राज बैनर की मोहब्बतें ने उनके करियर में नई जान फूँकी.

इस दीवाली उनके निर्देशन में बनी फ़िल्म जब तक है जान रिलीज़ होने वाली है. अभी कुछ दिन पहले शाहरुख़ के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि ये उनकी आख़िरी फ़िल्म होगी....नियती ने भी जैसे उनके शब्दों को पकड़ लिया. उन्हें मौक़ा नहीं दिया कि वे इस फ़ैसले पर दोबारा सोच सकें.

उनकी सारी फ़िल्में क्लासिक नहीं हैं, लोगों ने कई फ़िल्मों को नापसंद भी किया लेकिन जब तक जान रही, यश चोपड़ा ने रोमांस, ड्रामा, एक्शन से लोगों का भरपूर मनोरंजन किया...उसके लिए शुक्रिया.

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