बदलते वक्त के साथ बढ़ता रहा 'यश'

  • 27 अक्तूबर 2012
Image caption यश चोपड़ा को उनके 80वें जन्मदिन पर बधाई देते शाहरुख़ ख़ान.

साल 1965 में यश चोपड़ा ने शायद भारतीय सिनेमा की पहली मल्टी स्टारर फिल्म बनाई थी, जिसका नाम था 'वक्त'. जी हां वक्त. यही वो चीज़ है जिसे यश चोपड़ा ने कभी भी अपनी मुट्ठी से फिसलने नहीं दिया. हमेशा वक्त उनके और वो वक्त के साथ रहे.

ज़रा सोचिए जो शख़्स 70 के दशक में भारतीय सिनेमा की एक बड़ी ताकत था इसी शख्स का 2012 में भी अगर भारतीय सिनेमा में आधिपत्य हो, बल्कि उसकी ताकत पहले से भी कई गुना बढ़ गई हो, तो कुछ खास तो ज़रूर रहा होगा उसमें.

सुनिए: यश चोपड़ा को

यश चोपड़ा के सिनेमा ने ना सिर्फ समीक्षकों बल्कि दर्शकों का भी भरपूर प्यार पाया. यही बात उन्हें बाकी फिल्मकारों से जुदा बना देती है.

मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और सुभाष घई जैसे दिग्गज निर्देशक भी वक्त की आंधी से अपने आपको बचा नहीं पाए और कभी सुपरहिट फिल्मों की लाइन लगा देने वाले ये फिल्मकार एक-एक हिट को तरस गए. लेकिन यश चोपड़ा ने ऐसा दौर देखा ही नहीं.

सीखने को हमेशा तैयार

यश चोपड़ा की कई फिल्मों की कहानी और गाने लिखने वाले मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर मानते हैं कि अक्सर कामयाब लोग अपने ही काम को दोहराने लगते हैं. वो ये भूल जाते हैं कि उनका जो काम सफल रहा है वो इसलिए सफल रहा क्योंकि वो नया था. अब वो अपनी उसी 'नए' काम की पुनरावृत्ति करेंगे तो ज़ाहिर है लोग बोर हो जाएंगे. यश चोपड़ा के साथ यही बात जुदा था.

बीबीसी से खास बात करते हुए जावेद अख़्तर कहते हैं, "देखिए बदलते वक्त के साथ लोग बदलते हैं, उनके जीने के तरीके बदलते हैं. तो लोगों को भी बदलना पड़ता है. यश जी ऐसा कर पाए, क्योंकि उनमें नम्रता थी. किसी तरह का कोई अहंकार नहीं था. वो नए-नए लोगों से भी सीखने के लिए तैयार रहते थे. वर्ना कई फिल्मकारों का तो ऐसा रवैया रहता है कि ये नए लड़के,ये हमें क्या सिखाएंगे."

यश चोपड़ा की शानदार फिल्में

Image caption बतौर निर्देशक अपनी आखिरी फिल्म 'जब तक है जान ' की रिलीज़ से पहले ही यश चोपड़ा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

जावेद अख़्तर ने बताया कि यश चोपड़ा अपनी फिल्मों में नए कलाकारों को पूरी छूट देते थे. उन्होंने अपने अंदर की नफासत, नज़ाकत और ठहराव को तो कायम रखा ही लेकिन नए लोगों से भी वो कई नई बातें आत्मसात करते रहे.

फिल्म इतिहासकार रश्मि दोरईस्वामी मानती हैं कि यश चोपड़ा ने बदलते वक़्त की नब्ज़ को पहचाना. उन्होंने 60 और 70 के दशक में जब नेहरू का समाजवाद प्रासंगिक नहीं रह गया था तो उसी हिसाब से फिल्में भी बनाईं. धूल का फूल जैसी फिल्मों में मौजूदा सामाजिक नियमों को चुनौती दी.

हर पीढ़ी पर मज़बूत पकड़

रश्मि दोरईस्वामी कहती हैं, "दीवार और त्रिशूल जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज के गुस्से को अमिताभ बच्चन के किरदार के रूप में आवाज़ दी. फिर काला पत्थर में उन्होंने कोयला खदान में काम करने वाले मज़दूरों की व्यथा कथा कही. इन फिल्मों में उन्होंने जिस वर्ग को टारगेट किया वो बहुत ही विशाल वर्ग था और उस वर्ग ने उनकी इन फिल्मों को हाथों हाथ लिया."

रश्मि दोरईस्वामी ने ये भी कहा कि यश चोपड़ा ही वो पहले भारतीय फिल्मकार थे जिन्होंने इंडियन डायस्पोरा (प्रवासी भारतीय) के असर को उनकी ताकत को पहचाना और इसी वजह से उनकी फिल्में इस वर्ग के बीच भी ख़ासी लोकप्रिय साबित हुईं.

क्लिक कीजिए और देखिए किसने दी यश चोपड़ा को अंतिम विदाई

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी की भी कुछ ऐसी ही राय है.

वो कहती हैं कि यश चोपड़ा ने हमेशा वक्त के रुख को पहचाना. "उन्होंने रोमांस ही नहीं भारत के समाजाकि-राजनीति माहौल को भी बेहतरीन तरीके से परखा. वक्त, दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर जैसी फिल्में बनाने के बाद वो रोमांस की तरफ भी लौटे".

नम्रता कहती हैं कि जब भारत-पाकिस्तान के बीच माहौल अच्छा होने लगा था और शांति की बातें चल रही थीं तो उन्होंने वक्त के मिजाज़ को पढ़ते हुए 'वीर-ज़ारा' बनाई. जो भारत-पाकिस्तान के लोगों को क़रीब लाने का संदेश देती थी. इस तरह की फिल्मों का बड़ा कैनवस होता है.

वापस लाए स्टूडियो कल्चर

Image caption यश चोपड़ा की फिल्म 'दीवार' से अमिताभ बच्चन की सुपर सितारा हैसियत बन गई.

जावेद अख़्तर यश चोपड़ा को भारतीय सिनेमा में 'स्टूडियो कल्चर' वापस लाने का भी श्रेय देते हैं.

1940 के दशक में बॉम्बे टॉकीज, फिल्मिस्तान, रंजीत स्टूडियो और मिनर्वा मूवीटोन सरीखी कंपनियां होती थीं जो फिल्में बनाती थीं, लेकिन बाद में कई एकल निर्माता आए. फिल्म बनाने में इस वजह से काफी अड़चनें आने लगीं. शूटिंग कैंसिल होने लगीं. लेकिन यश चोपड़ा ने दोबारा फिल्म व्यवसाय को काफी हद तक संगठित करने में अहम भूमिका निभाई.

जावेद अख़्तर कहते हैं, "उन्होंने यशराज स्टूडियो बनाया. जहां रिकॉर्डिग, एडिटिंग से लेकर हर तरह की सुविधा है."

जावेद अपनी बात ख़त्म करते हुए कहते हैं कि यश चोपड़ा आख़िरी वक़्त तक मानसिक तौर से पूरी तरह सक्रिय थे. वर्ना होता क्या है कि लोग शारीरिक तौर पर तो ज़िंदा रहते हैं लेकिन मानसिक स्तर पर जिस सक्रियता या रचनात्मकता की ज़रूरत होती है वो लोगों की सालों पहले ख़त्म हो चुकी होती है.

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