जाने भी दो यारो: नज़दीकी सिनेमा घरों में

Image caption 1983 की फिल्म 'जाने भी दो यारो' दो नवंबर को फिर से रिलीज़ हो रही है.

जब चारों तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ 'लड़ाई' की बातें हो रही हैं. रोज़ाना राजनीतिक नेताओं के नए-नए 'घोटालों' में लिप्त होने के खुलासों के दावे किए जा रहे हैं, ऐसे समय में भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करती हुई 1983 की कल्ट कॉमेडी फिल्म 'जाने भी दो यारो' फिर से सिनेमाघरों में रिलीज़ की जा रही है.

इसके प्रिंट को डिजिटली बेहतर किया गया है. जाने भी दो यारो में नसीरुद्दीन शाह, रवि बासवानी, भक्ति बर्वे, पंकज कपूर और सतीश शाह सरीखे कलाकारों ने काम किया था. इसका निर्देशन कुंदन शाह ने किया था और फिल्म का निर्माण एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास संघ) ने किया था.

फिल्म से जुड़े कुछ खास लोगों ने बीबीसी से बात करते हुए इसके फिर से रिलीज़ होने पर अपने विचार व्यक्त किए और साथ ही जब 1982-83 में फिल्म की शूटिंग चल रही थी, उस वक्त के कुछ दिलचस्प किस्से बांटे.

कुंदन शाह, निर्देशक

मुझे जब पता चला कि फिल्म को दोबारा रिलीज़ किया जा रहा है, तो मुझे हैरानी हुई. लगा कि अब कौन देखेगा इस फिल्म को. लेकिन मैंने जिस-जिस से इस बात की चर्चा की उसने कहा कि फिल्म को वो ज़रूर देखेंगे. इससे मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी कि इतने सालों बाद भी फिल्म को लेकर लोगों में उत्साह है.

जब हम इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि ये इस कदर चर्चित होगी. बहुत ही टाइट बजट में काम हुआ था. फिल्म के लिए छह लाख 84 हज़ार रुपए का बजट निर्धारित किया गया था.

मेरे लिए सबसे ज़्यादा खुशी का मौका तब था जब नसीरुद्दीन शाह ने फिल्म के लिए हां कर दी. सच मानिए, हम जैसे लोगों के लिए नसीरुद्दीन शाह तो अमिताभ बच्चन से भी बढ़कर थे.

Image caption फिल्म के लिए एनएफडीसी ने महज छह लाख चौरासी हज़ार रुपए का बजट निर्धारित किया था.

फिल्म की शूटिंग के दौरान इतनी तंगी थी कि कई बार शूटिंग में 60-70 लोग हो जाते थे, तो भी खाना 35 लोगों के लिए ही आता था. हम दाल में पानी मिलाकर उसे बढ़ा देते थे. रोटियां खत्म हो जाती थीं, तो पाव मंगा लेते थे. फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने जो कैमरा इस्तेमाल किया है, वो उनका खुद का कैमरा था.

सबसे मज़े की बात तो ये है कि शूटिंग के दौरान लाइटिंग इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास जेनरेटर नहीं था, तो हम बिजली चोरी करते थे. ज़रा सोचिए कितना विरोधाभास था. फिल्म में हमने भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया और इसी की शूटिंग के लिए हमें बिजली चोरी करनी पड़ी.

फिल्म की शूटिंग के पहले तीन-चार दिन में ही सब इतने तंग हो गए कि इंतज़ार करने लगे कि कब शूटिंग खत्म होगी. ओमपुरी ने हंसते हुए कहा था कि ये सबसे गरीब फिल्म यूनिट है जिसके साथ वो काम कर रहे हैं.

जब फिल्म का सबसे मशहूर 'महाभारत' सीन शूट हो रहा था, तो हमें समझ में नहीं आ रहा था कि इसके लिए कैसे डायलॉग लिखें.

मैं और सहलेखक सतीश कौशिक संघर्ष कर रहे थे. तब हमारे दूसरे लेखक रंजीत कपूर बोले कि इसमें क्या मुश्किल है. हमने फुटपाथ किनारे बिकने वाली ढाई रुपए की किताब 'द्रौपदी चीरहरण' खरीदी और उसी से प्रेरणा लेकर इस सीन के संवाद लिख डाले.

पंकज कपूर, अभिनेता

मैंने इस फिल्म में तरनेजा का किरदार अदा किया था. मुझे याद है कि एक बार कुंदन शाह ने मुझसे कहा कि फिल्म की लोकेशन के लिए रेकी करने जाना है.

मैंने सोचा कि कुंदन कार लेकर आएंगे तो उसमें हम रेकी करने जाएंगे. लेकिन वो मुझे महाराष्ट्र ट्रांसपोर्ट की बस में ले गए. हम धक्के खाते वहां पहुंचे.

फिर तीन-चार घंटे रेकी करने के बाद जब कुंदन ने मुझे कोल्ड ड्रिंक पिलाया तो मैंने मन ही मन कहा कि मेरे तो भाग्य खुल गए. कोल्ड ड्रिंक नसीब हो गया.

Image caption जाने भी दो यारो पहली बार अगस्त, 1983 में रिलीज़ हुई थी. इसका निर्माण एनएफडीसी ने किया था.

मैं जब कुंदन से अपना रोल डिस्कस करना चाहता तो वो बेचारे कॉपी पेन लेकर हिसाब किताब ही देखते रहते. हमें बिलकुल यकीन नहीं था कि ये फिल्म आगे जाकर कल्ट स्टेटस हासिल कर लेगी. अगर हमें पता होता तो शायद ये फिल्म इतनी बेहतरीन ना बन पाती.

फिल्म का मशहूर 'महाभारत' सीन रंजीत कपूर और सतीश कौशिक ने मिलकर लिखा और इसकी एडिटिंग भी कमाल की गई थी.

मुझे लगता है कि इस दौर में फिल्म को पहले से ज़्यादा कामयाबी मिलेगी, क्योंकि उस वक्त तो हममें से ज़्यादातर कलाकारों को लोग जानते भी नहीं थे और उस ज़माने में इस तरह की अलग फिल्मों को हाथों हाथ नहीं लिया जाता था. अब तो प्रयोगधर्मी सिनेमा के लिए काफी जगह है.

मेरा बेटा शाहिद कपूर अक्सर कहता है कि इस दौर में 'जाने भी दो यारो' जैसी फिल्में क्यों नहीं बनते. ये सुनकर मुझे यक़ीन होता है कि युवा वर्ग को भी ये फिल्म ज़रूर पसंद आएगी.

सतीश शाह, अभिनेता

मैं इस फिल्म के दोबारा रिलीज होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा हूं.

मुझे याद है कि इस फिल्म के लिए मुझे पांच हज़ार रुपए मिले थे. फिल्म के लिए सबसे ज़्यादा 15 हज़ार रुपए नसीरुद्दीन शाह को मिले थे क्योंकि वो उस वक्त तक अपना खासा नाम कमा चुके थे.

देखिए, हम सारे लोग फिल्म में काम करने को इसलिए तैयार हो गए क्योंकि ज़्यादातर कलाकार उस वक्त नए थे. उनमें से किसी के पास ज़्यादा काम नहीं होता था. वो अंग्रेज़ी में कहावत है ना "बैगर्स कान्ट बी चूसर्स."

लेकिन हमें अंदाज़ा नहीं था कि एक महान फिल्म बनने जा रही है.

आज के दौर में ऐसी फिल्म बनना लगभग नामुमकिन है. अब कहां इतने सारे कलाकार इतने दिनों तक शूटिंग के लिए अपना वक्त निकाल पाएंगे. फिल्म की कथा,पटकथा, निर्देशन सभी कमाल का था.

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