दिलीप कुमार: अंगीठी की गर्मी और बचपन की कहानियाँ

पाकिस्तान में पेशावर की एक मशहूर गली है किस्सा ख्वानी जहाँ कभी हिंदी सिनेमा के प्रिय सितारे दिलीप कुमार का घर था. आज से 90 साल पहले 1922 में यहीं पर दिलीप कुमार का जन्म हुआ था.

आज जब दिलीप कुमार अपनी 90वें सालगिरह मना रहे हैं, तो भारत की तरह पाकिस्तान में भी दिलीप कुमार के लिए विशेष कार्यक्रम हुए.

पेशावर में दिलीप कुमार के प्रशंसकों ने न सिर्फ केक काटा बल्कि ख़ुद दिलीप कुमार साहब और सायरा बानो ने फोन लाइन के ज़रिए जश्न में शिरकत की. भारत से इस सालगिरह का हिस्सा हम भी बने. जब ये कार्यक्रम हो रहा था कि हम भी दिल्ली से फोन लाइन पर मौजूद थे.

इस कार्यक्रम में सैकड़ों लोग पहुंचे और कइयों को निराश लौटना पड़ा क्योंकि प्रेस क्लब में जगह कम पड़ गई-सब आए थे दलीप कुमार के लिए. जी हाँ पेशावर में दिलीप नहीं दलीप कुमार चलता है.

दिलीप कुमार 80 के दशक में पेशावर आए थे. तब उनके साथ रहने वाले और उनका इंटरव्यू करने वाले यूनिस कियासी ने बीबीसी को याद करते बताया, "जब दलीप साहब आए थे तो वो अपना पुराना मकान देखने गए. एक पुरानी दालान की तरफ इशारा किया कि यहीं पर नानी-दादी हमें कहानियाँ सुनाया करती थी..संदली लगाकर ( अंगीठी पर चादर डालकर). कहानियाँ सुनते सुनते हम सो जाते थे. जब वो पेशावर आए थे तो अफगानिस्तान में सोवियत संघ के सैनिक आ चुके थे. उन्होंने गवर्नर हाउस में पत्रकारों से कहा था कि पाकिस्तान, हिंदुस्तान और अफगानिस्तान को एक होकर रहना चाहिए."

पेशावर में कार्यक्रम आयोजित करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले शकील वहीदुल्ला कहते हैं कि पेशावर के लोग दिलीप कुमार से बेपनाह प्यार करते हैं और सालगिरह मनाकर लोगों ने उन पर अपना हक जताया है.

शकील वहीदुल्ला ने बताया, पाकिस्तान में दिलीप कुमार के जितने प्रशंसक हैं उनकी गिनती करना मुश्किल है.

यादें रह जाती हैं

सुबह से ही पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर दिलीप कुमार छाए हुए हैं. दिलीप कुमार के फिल्मी सफर और उनके जीवन का जायज़ा लेते खास कार्यक्रम लगातार टीवी पर दिखाए जा रहे हैं.

इस साल फरवरी में पाकिस्तान ने ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर को औपचारिक रुप से राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया था.

इस घोषणा के बाद दिलीप कुमार ने पुराने दिनों को याद करते हुए अपने ब्लॉग में लिखा था, “मेरे मने में क़ि्स्सा ख्वानी बाज़ार की सुंदर यादें हैं. शाम को जब बाज़ार बंद हो जाता था तो एक आदमी बीच चौराहे बैठकर हमें किस्से सुनाया करता था- बहादुरी के, जीत के, धोखे की...मैं पूरा ध्यान लगाकर इन कहानियों को सुना करता था. यही किस्सागोई में मेरा पहला सबक था, बाद में फिल्मों के लिए कहानियाँ चुनने में ये अनुभव बहुत काम आए.”

शकील कहते हैं कि चाहे वो दिलीप कुमार हो, राज कपूर हो, अमजद खान या विनोद खन्ना पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले सारे कलाकारों को लोग बेहद प्यार करते हैं. राज कपूर की सालगिरह पर भी ऐसा ही कार्यक्रम करने की योजना है.

50 के दशक की तिकड़ी में से राज कपूर के साथ दिलीप कुमार के बहुत नज़दीकी संबंध थे. दोनों ही पाकिस्तान के पेशावर शहर में एक ही मोहल्ले, एक ही सड़क के रहने वाले थे. बिलकुल भाइयों जैसा रिश्ता था उनका. दिलीप कुमार को निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया जा चुका है.

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