क्यों रविशंकर को कहा था 'गॉडफादर ऑफ म्यूज़िक'

बीटल्स के जॉर्ज हैरिसन ने कभी पंडित रवि शंकर को गॉडफादर ऑफ वर्ल्ड म्यूज़िक कहा था. भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिमी संगीत से जोड़ने का काम पंडित रवि शंकर के ज़रिए हुआ. भारत में कुछ चुनिंदा फिल्मों में भी उन्होंने काम किया- खासकर सत्यजीत रे की अपू फिल्मों में. उनके निधन के बाद उनके साथ काम कर चुके कलाकार और अन्य वर्गों के लोग उन्हें अलग-अलग तरह से याद कर रहे हैं.

श्याम बेनेगल, निर्देशक

पंडित रवि शंकर शायद भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक राजदूत थे और शायद भारत के सबसे बेहतरीन सितार वादक. 92 साल की उम्र तक वे सितार वादन करते रहे.

वे उम्दा संगीतकार थे, संगीतज्ञ थे, परफॉर्मर थे. वे पश्चिमी जगत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय शांस्त्रीय संगीत को लेकर गए. उनका योगदान बड़ा और वृहद था. उनके जाने का दुख तो है लेकिन मैं ये कहूंगा कि हमें उनके जीवन का जश्न भी मनाना चाहिए. उनका 92 साल लंबा उपलब्धियों से पूर्ण जीवन रहा है.

दुनिया आज भारतीय शास्त्रीय संगीत को अगर जानती है तो इसका श्रेय पंडितजी को जाता है क्योंकि 50 के दशक में उन्होंने और अली अकबर खान ने मिलकर विदेशों में प्रस्तुति देनी शुरू की. वे दुनिया भर में परफ़ॉर्म करते थे. बाद में 60 और 70 के दशक में बिटल्स ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में रूचि दिखानी शुरु की. फिर तो रॉक से लेकर तमाम अन्य विधाओं के लोग भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़ने लगे- रवि शंकर के ज़रिए.

एक अदभुत घटना 1971 में हुई थी जब करैनिगी हॉल में बांग्लादेश के लिए कॉन्सर्ट हुई थी. उसके बाद से बहुत कुछ होने लगा है - बॉब गैन्डॉल्फ नेअफ्रीका के लिए कॉन्सर्ट किया. लेकिन इसकी शुरुआत रविशंकर ने की थी. वे पिछले महीने तक प्रस्तुति दे रहे थे. उनमें कुछ अलग ही बात थी.

पंडित बिरजू महाराज, कथक नर्तक

रवि शंकर जी मेरे चाचा पंडित लच्छू महाराज और पंडित शंभू महाराज के दोस्त थे. उन्होंने बचपन से ही मेरा करियर देखा है. मैं जब भी किसी कॉन्सर्ट में जाता था तो वो मिल ही जाते थे. मैं तो उन्हें हमेशा भइया कहता था. वे गुणी व्यक्तित्व के मालिक थे और रूप भी बेहद मनमोहक था.

दरअसल सितार और पंडितजी दोनों एक हो गए थे. दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता था.

उनका राग, ताल, स्वर.....सब ऐसे घुलमिल जाते थे कि लगता था कि पंडितजी और सितार को अलग कैसे करें. संगीत के स्वरों को वे बड़ी आसानी से अपना लेते थे और दूसरों को भी आसानी से समझा देते थे. ये काम कोई ज्ञानी व्यक्ति ही कर सकता था.

उनकी तकनीक और सितार बजाने का ढंग इतना मनमोहक था कि विदेशों में भी सितार बिकने लगा, उसकी मरम्मत की सुविधा विदेशों में मिलने लगी.

मैं जब भी उनके पैर छूता था तो हमेशा मुझसे कहते थे कि तुम तो खलीफा हो घर के...

अभी कुछ दिन पहले मैं लॉस एंजेलेस गया था. वो भी तब अमरीका में ही थे. मुझे मन तो था कि मैं पंडित रवि शंकर जी को मिलूँ लेकिन उन्होंने कहा कि तबीयत खराब है इसलिए रहने दो. केवल फोन पर बात हुई थी. तब भी उन्होंने मुझे आशीर्वाद ही दिया.

मुझे याद है कि 60 के दशक में जब वो फिरोज़शाह रोड पर दिल्ली में रहा करते थे. उनके घर पर तबला और सितार वादन हुआ करता था, मैं भी जाता था. उनका रूप और सितार वादन दोनों दिल को छू जाता था.

अशोक वाजपेयी, लेखक और आलोचक

पंडित रवि शंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में बिना कोई समझौता किए उसे अपने प्रामाणिक रूप में पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत किया. इसीलिए उनकी लोकप्रियात केवल संगीतविदों के बीच नहीं बल्कि संगीत प्रेमियों के बीच हुई. उन्होंने इस बात को समझा कि ये भले ही प्राचीन संगीत है लेकिन आधुनिकता से इसका रिश्ता जुड़ सकता है. ये बात किसी और संगीतकार को नहीं सूझी. इसने बहुत आकर्षण और सम्मान पैदा किया.

रविशंकरजी का सितार वादन पश्चिम में कई वजहों से प्रसिद्ध हुआ. एक तरफ तो उसमें धीर मंद गति थी जिसमें चिंतन था, मेडिटेटिव पुट था यानी ऐसा संगीत जो चिंतन मनन करता है. खासकर पश्चिम में उस समय चिंतन गायब हो चुका था. रविशंकर के संगीत के ज़रिए पश्चिमी संगीत में इस चिंतन का पुनर्वास हो गया.

दूसरा आकर्षण ये था कि रविशंकर में ऐसी गतिशीलता थी कि लोकप्रिय संगीत से भी उसका मेल बैठ गया. इसने पश्चिम को बहुत विस्मित किया.

उनकी सफलता के कारण भारत में भी बहुत सारे लोगों में सितार को लेकर उत्सुकता जागी. भारत से सितार का निर्यात होने लगा.संगीत पर वे हमेशा गंभीरता से सोचते थे. शास्त्रीय संगीत एक तरफ आध्यात्मिक है और एक तरफ ऐंद्रीय है. इस तथ्य की पकड़ उनमें बहुत अच्छी थी.

फ्यूज़िन को लेकर मेरी राय बहुत अच्छी नहीं है लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूँगा कि पूरब और पश्चिम को साथ लाने का प्रयास अहम है. हालांकि पंडितजी ने खुद भी इस चलन को बहुत आगे नहीं बढ़ाया. लेकिन आज जो हो रहा है वो इसी की देन है.

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