क्या लद रहे हैं थ्रीडी फिल्मों के दिन?

 बुधवार, 26 दिसंबर, 2012 को 14:56 IST तक के समाचार
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अवतार फ़िल्म में थ्री डी की नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया था

जेम्स कैमरून की 'अवतार' को रिलीज हुए तीन बरस हो गये हैं. दुनिया भर के लोगों ने इसे सराहा और यह बहुत तेजी से अपने समय की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई. इसकी कामयाबी की एक वजह थ्रीडी तकनीक भी थी.

लेकिन पीछे मुड़कर देखें तो 'अवतार' थ्रीडी तकनीक की सबसे बड़ी कामयाब फिल्म बनी हुई है और इसकी उपलब्धि चुनौती की तरह ही लगती है. वर्ष 2009 से तीन बरस गुजर जाने के बाद यह सवाल रह जाता है कि क्या थ्रीडी तकनीक को लेकर सिने प्रेमियों का रुझान बरकरार है?

निक नोलैंड ब्रिटेन में पिछले 30 बरस से फोटोग्राफ़ी के नामचीन निर्देशकों में रहे हैं. उन्होंने सिनेमा के कई उतार-चढ़ाव को देखा है. थ्रीडी तकनीक को लेकर इतना कम उत्साह उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था.

निक कहते हैं कि सिनेमैटोग्राफर के नजरिये से देखें तो कुछ खास तरह की फिल्मों के निर्माण में थ्रीडी तकनीक इसके पैमाने को तो जरूर बड़ा करती है. लेकिन ज्यादातर फिल्मों में दर्शकों के देखने के अनुभव को यह भटकाती और असहज करती है. वह कहते हैं कि मैं किसी ऐसे फोटोग्राफर से नहीं मिला जो इस तकनीक को लेकर वास्तव में उत्साहित रहा हो.

'थ्री डी तकनीक विरोधाभासी'

"थ्रीडी की तकनीक अधिक मायावी है. एक ही समय में हम इस पर भरोसा भी करते हैं और इसे संदेह की नज़र से भी देखते हैं. मुझे लगता है कि यह हमें बचपन के दिनों में देखी गई शुरुआती फिल्मों की याद दिलाता है."

आंग ली, लाइफ ऑफ पाई के निर्देशक

निक के विचारों का एक दूसरे ब्रितानी सिनेमैटोग्राफर ओलिवर स्टैपलेटोन भी समर्थन करते हैं. ओलिवर हॉलीवुड की 'द साइडर हाउस रूल्स' और 'द प्रोपोजल' जैसी फिल्मों का छायांकन कर चुके हैं.

ओलिवर कहते हैं कि कहानी कहने के लिहाज से थ्रीडी तकनीक विरोधाभासी है. उन हालात में जब कि किरदार की गहराईयों में उतरना आपका उद्देश्य हो, यह तकनीक बार बार यह एहसास दिलाती है कि आप कोई फिल्म देख रहे हैं. थ्रीडी तकनीक दर्शकों को फिल्म से भावनात्मक रूप से जुड़ने से रोकती है.

वह कहते हैं कि टूडी की तकनीक सिनेमा की मायावी दुनिया को उस तरह से नहीं दिखाती है. बेशक यह होता है क्यूँकि हमें इसकी आदत पड़ चुकी है लेकिन यह हमारी आँखों के साथ कोई खेल भी नहीं खेलती.

हालांकि थ्री डी तकनीक को संदेह की नज़र से देखने वाले लोग आंग ली की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'लाइफ ऑफ पाई' पर शायद चुप हो जाएं. आलोचकों ने आंग की कल्पनाशीलता और थ्रीडी तकनीक के बेहतरीन इस्तेमाल के लिये उनकी बहुत सराहना की है. समंदर की लहरों पर बहते हीरो और डरे हुए बाघ का फिल्मांकन यथार्थ के बेहद करीब था.

प्राकृतिक स्तर

लाइफ ऑफ पाई

लाइफ ऑफ पाई अपनी कहानी की वजह से ज़्यादा चर्चित हुई है

लेकिन क्या थ्रीडी तकनीक को लेकर आंग को कभी कोई संदेह रहा? वह स्वीकार करते हैं, "यह हमेशा ही रहा है. टूडी तकनीक से हमारा पुराना रिश्ता रहा है. कहानी कहने का इसने हमें एक अच्छा जरिया दिया है. हम इससे शिद्दत से जुड़े रहे हैं."

आंग कहते हैं, "थ्रीडी की तकनीक अधिक मायावी है. एक ही समय में हम इस पर भरोसा भी करते हैं और इसे संदेह की नज़र से भी देखते हैं. मुझे लगता है कि यह हमें बचपन के दिनों में देखी गई शुरुआती फिल्मों की याद दिलाता है."

वह कहते हैं कि जब कोई नया माध्यम आता है तो लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते क्योंकि हम इस तकनीक को अच्छी फिल्म निर्माण से नहीं जोड़ते. इसका इस्तेमाल कार्टून, एक्शन फिल्मों और सस्ते किस्म की भुतहा फिल्मों के निर्माण में किया जाता है.

वे कहते हैं, "हालांकि माध्यम अपने आप में तटस्थ है और यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल किस तरह से करते हैं. हम अभी तक थ्रीडी तकनीक की भाषा को स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं."

थ्रीडी का बाज़ार

टॉर्सटन हॉफमैन जर्मन हैं और हाल ही में उन्होंने थ्रीडी कंटेंट ब्लॉग ऑस्ट्रेलिया में शुरू किया है.

दुनिया के थ्रीडी बाज़ार पर नजर रखने वाले टॉर्सटन कहते हैं कि एशिया खासकर चीन और दक्षिण कोरिया के बाजार में इसका विस्तार हो रहा है.

वह कहते हैं कि चीन के पास अकेले थ्रीडी तकनीक वाले 10 हज़ार स्क्रीन हैं. यह दुनिया भर के देशों की कुल क्षमता का एक चौथाई है. चीन के दर्शकों को जब भी देखने के लिये कोई फिल्म थ्रीडी या टूडी तकनीक से बनी फिल्मों में चुनने का विकल्प दिया गया है, उन्होंने बहुत उत्साह से थ्रीडी तकनीक को पसंद किया है.

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