समीक्षकों और दर्शकों की पसंद में फर्क क्यों ?

राऊडी राठौर

फिल्म: राऊडी राठौर, मुख्य कलाकार: अक्षय कुमार, समीक्षकों की राय: बकवास फिल्म, बॉक्स ऑफिस रिज़ल्ट: 100 करोड़ से ज़्यादा का कारोबार.

फिल्म: स्पेशल 26, मुख्य कलाकार: अक्षय कुमार, समीक्षकों की राय: बढ़िया फिल्म, बॉक्स ऑफिस रिज़ल्ट: राउडी राठौर से काफी कम.

ये बड़ी दिलचस्प सी बात लगती है. दो फिल्में, दोनों ही में अक्षय कुमार जैसा बड़ा सितारा. लेकिन जिस फिल्म को समीक्षकों ने सिरे से नकारा उसने बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़े और जिस फिल्म को समीक्षकों ने सराहा वो फिल्म पीछे रह गई.

ये सच है कि 'स्पेशल 26' ने कमाई अच्छी की लेकिन वो राऊडी राठौर जैसी छप्पर फाड़ कमाई ना कर सकी. फिल्मों का यही पहलू किसी की समझ में नहीं आ रहा.

बीते कुछ सालों की सबसे बड़ी हिट फिल्मों पर नज़र डालें तो किसी को भी समीक्षकों का प्यार नहीं मिल पाया.

रेडी, बॉडीगार्ड, दबंग 2, हाउसफुल, एक था टाइगर..इन सभी फिल्मों ने 100 करोड़ से ज़्यादा का कारोबार किया. इन सभी फिल्मों को ज़्यादातर फिल्म समीक्षकों ने लताड़ा और बाद में दर्शकों ने इन्हें सिर आंखों पर बिठाया.

दूसरी तरफ ऐसी फिल्मों की भी कमी नहीं है जिन्हें समीक्षकों का बड़ा दुलार मिला, लेकिन दर्शकों ने उनसे आंखें फेर लीं. जैसे शंघाई, लव शव ते चिकन खुराना, फरारी की सवारी और हालिया रिलीज़ मटरु की बिजली का मंडोला.

सिर्फ कमाई ही पैमाना नहीं

भला ये फर्क क्यों? क्यों समीक्षक दर्शकों का दिमाग पढ़ने में नाकामयाब हो जाते हैं? जवाब देती हैं फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी.

"समीक्षकों की ये ड्यूटी नहीं है कि वो दर्शकों का दिमाग पढ़े. वो सिनेमा को उसकी गुणवत्ता के आधार पर आंकते हैं. दर्शक उनसे सहमत हों या ना हों, ये बिलकुल ही अलग मुद्दा है."

Image caption शंघाई को ज़्यादातर समीक्षकों ने सराहा लेकिन फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया.

'राउडी राठौर' और 'स्पेशल 26' की कमाई के अंतर को समझाते हुए इसके मुख्य कलाकार अक्षय कुमार कहते हैं, "दोनों फिल्मों का स्केल अलग-अलग है. हमें पता था कि 'स्पेशल 26' की पहुंच एक सीमा तक ही हो सकती है. इसलिए हमने इसे कम प्रिंट्स के साथ रिलीज़ किया जबकि राऊडी को तीन हज़ार प्रिंट्स से भी ज़्यादा के साथ रिलीज़ किया था."

'100 करोड़ क्लब' की बात चलने पर अक्षय कहते हैं, "किसी फिल्म की कामयाबी का पैमाना सिर्फ 100 करोड़ नहीं हो सकता. अगर किसी फिल्म ने ये आंकड़ा नहीं छुआ तो क्या आप सिरे से कह दोगे कि वो नाकाम रही."

अभिनेता अनुपम खेर भी '100 करोड़ क्लब' की धारणा से इत्तेफाक़ नहीं रखते.

वो कहते हैं, "जब कोई कलाकार मरेगा तो उसकी उन फिल्मों का ज़िक्र नहीं होगा जिन्होंने 100 करोड़ कमाए बल्कि उन फिल्मों की बात होगी जिन्होंने लोगों को झकझोर दिया. भले ही उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा ना कमाई की हो."

400 करोड़ का आंकड़ा भी होगा पार ?

'बॉडीगार्ड', 'एक था टाइगर' और 'दबंग 2' जैसी रिकॉर्डतोड़ कमाई करने वाली फिल्मों के कलाकार सलमान खान भी मानते हैं कि फिल्मों की कमाई को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए.

वो मानते हैं कि फिल्म में बड़ा कलाकार हो और उसे हज़ारों प्रिंट्स के साथ रिलीज़ किया जाए तो भला उसके ज़्यादा कमाई करने में कौन सी बड़ी बात है.

सलमान कहते हैं, "हमारे और आपके रहते-रहते वो ज़माना भी आएगा कि फिल्में 400 करोड़ की कमाई तक छूने लगेंगी."

वहीं नम्रता जोशी कहती हैं कि दर्शकों और समीक्षकों की पसंद में अंतर होना कोई नई बात नहीं है. हमेशा से ऐसा होता आया है.

अपनी बात खत्म करते हुए वो कहती हैं, "अगर दर्शकों को हमारे साथ ही चलना होता तो पिछले साल रिलीज़ हुई 'अन्हे घोड़े दा दान' सबसे बड़ी हिट साबित होती. लेकिन सच्चाई ये है कि ज़्यादातर लोगों ने तो इसका नाम भी नहीं सुना."

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