कैसे बना पाई का शेर, कहां से आया समुद्र?

Image caption लाइफ़ ऑफ़ पाई के कंप्यूटर ग्राफ़िक्स का काफ़ी काम हैदाराबाद, मुंबई में भी हुआ है

क्या आप जानते हैं इस साल चार ऑस्कर जीतने वाली फ़िल्म लाइफ़ ऑफ़ पाई की शूटिंग किस समुद्र में हुई है? क्या आप जानते हैं कि फ़िल्म के मुख्य किरदार शेर का नाम क्या है और वह कहां से आया है ?

नहीं तो हम बता दें कि वो समुद्र है स्विमिंग पूल. और शेर आया है कंप्यूटर ग्राफ़िक्स से.

यही वजह है कि लाइफ़ ऑफ़ पाई को मिले चार ऑस्कर पुरस्कारों में से एक विज़ुअल इफ़ेक्ट्स के लिए भी है.

लॉस एंजिलिस में जब फिल्म के विज़ुअल इफ़ेक्ट्स डायरेक्टर बिल वेस्टनहॉफ़र ऑस्कर पुरस्कार ले रहे थे तो भारत में भी जश्न मनाया जा रहा था.

मुंबई, हैदराबाद में जश्न

फ़िल्म के ग्राफ़िक्स का अधिकतर काम ‘रिदम एंड ह्यूज़’ कंपनी के हैदराबाद और मुंबई स्टूडियोज़ में भारतीय कलाकारों और विशेषज्ञों ने किया है.

ऑस्कर जीतने वाला काम करने वाली टीम के एक सदस्य गौरव माथुर ने कहा, "फ़िल्म में आप कहीं समुद्र की लहरों का रंग अलग देखेंगे, कहीं बुलबुले, कहीं कफ़ और कहीं थोड़ी सी धुंध. यह सब कुछ कंप्यूटर पर बनाया गया है. यही सब मिलकर स्विमिंग पूल को असली समुद्र में बदल देती हैं."

दल की एक और सदस्य किरण कहती हैं, "फ़िल्म का मुख्य पात्र शेर दरअसल एक थ्री डायमेंशनल इमेज है, जो असली शेर को सामने रख कर तैयार किया गया. इसी तरह समुद्र की मछलियाँ, ज़ेबरा जैसे दूसरे जानवर भी कंप्यूटर पर ही तैयार किए गए".

छह शहर, 7 महीने, 700 लोग

फ़िल्म की ग्राफ़िक्स टीम में सात सौ से भी ज्यादा लोग थे. इन्होंने हैदराबाद, मुंबई, कुआलालम्पुर और जकार्ता सहित छह अलग अलग शहरों में लगातार सात महीने तक काम किया.

इनमें चित्र बनाने वाले कलाकार, कंप्यूटर ग्राफिक्स के कलाकार, सॉफ्टवेर और हार्डवेयर इंजीनियर, प्रोग्रामर्स, लाइटिंग और सिनेमेटोग्राफी विभाग के लोग थे.

किरण कहती हैं, "यह भगवान के काम की नक़ल जैसा था, जिसमें आर्ट और साइंस दोनों शामिल थे. टेक्नोलॉजी और आठ अलग विभागों के टीम वर्क ने इसे संभव बनाया".

Image caption खौफ़नाक लगने वाली लहरें कंप्यूटर से पैदा हुईं

लेकिन सवाल ये है कि इस तरह की फिल्मों को एनिमेशन और कंप्यूटर ग्राफिक्स का सहारा लेना क्यों पड़ता है?

विज़ुअल इफ़ेक्ट्स पर काम करने वाली टीम की एक और सदस्य पूनम कहती हैं, "हर दृश्य में पानी का अपना कुछ आभास था, कुछ भावना थी. अगर ऐसे दृश्य असल में घटित हों भी तो उन्हें शूट कैसे किया जा सकता है?"

वो ये भी कहती हैं, “हो सकता है कि फिल्म बनाने वालों को लगा होगा कि कंप्यूटर पर रचे गए दृश्य ही बेहतर होंगे क्योंकि उसे आप निर्देशित कर सकते हैं कि कौन सा दृश्य कैसा होना चाहिए".

भारतीय प्रतिभा की पहचान

इस फिल्म की सफलता के बाद रिथिम एंड ह्यूज़ कंपनी का नाम सबकी जुबान पर है. कंपनी की एशिया की मैनेजिंग डायरेक्टर सरस्वती बलगम ने बीबीसी से कहा, “कंपनी पहले भी ‘बेब’ और ‘गोल्डन कंपास’ फिल्मों में विज़ुअल इफ़ेक्ट के लिए ऑस्कर जीत चुकी है लेकिन लाइफ़ ऑफ़ पाई एक अनूठा काम रहा है.”

वो बताती हैं, "इस फिल्म ने हमारे लिए विज़ुअल इफ़ेक्ट की सीमाओं को कई तरह से आगे बढ़ा दिया. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा हमारा ही था. छह अलग अलग स्थानों पर 80 प्रतिशत विज़ुअल इफ़ेक्ट का काम करना एक बड़ी चुनौती था".

आज हॉलीवुड की यह कंपनी कई और बड़ी फिल्मों के लिए काम कर रही है. इनमें रेस्टिंग इन पीस, डिपार्टमेंट, पर्सी जेक्सन 2, और सेवंथ सन शामिल हैं.

विज़ुअल इफ़ेक्ट और एनिमेशन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है की लाइफ़ आफ पाई की सफलता ने भारतीय प्रतिभा और शक्ति के लिए विश्व भर में आदर और सम्मान और बढ़ा दिया है.

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