कौन है जो बॉन्ड के लिए हिंदी संवाद बोलता है?

  • 3 अप्रैल 2013
जुरासिक पार्क

आप में से कई लोग उस समय स्कूल या कॉलेज में होंगे जब 1993 में 'जुरासिक पार्क' भारत में रिलीज़ हुई थी.

इस हफ्ते एक बार फिर यह फ़िल्म 3डी में रिलीज़ हो रही है, लेकिन 1993 में आपने इसे किस भाषा में देखा था? अंग्रेजी या फिर हिंदी में. अगर आपने हिंदी में यह फिल्म देखी थी तो आप भी इतिहास का हिस्सा हैं. क्योंकि हिंदी में डब होने वाली ये पहली हॉलीवुड फिल्म थी.

इस बात को अब 20 साल हो चुके हैं. इन सालों में भारत की डबिंग इंडस्ट्री में भी बहुत बदलाव आए हैं. अब तो कई बड़ी हॉलीवुड फिल्में हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होती हैं. जेम्स बॉन्ड से लेकर बड़ी एक्शन फिल्मों का हिंदी संस्करण रिलीज़ होती है. पिछले 20 सालों में डबिंग इंडस्ट्री में क्या कुछ बदला है, आइए जानते हैं उन्हीं लोगों से जो पिछले 20 साल से इस काम को अंजाम देते आ रहे हैं.

इनमें सबसे पहला नाम है शक्ति फिल्म्स के अशिम सामंत का. अशिम मशहूर फिल्मकार शक्ति सामंत के बेटे हैं.

अशिम के स्टूडियो में ही 'जुरासिक पार्क' की हिंदी में डबिंग हुई थी. तब से लेकर अब तक इनके स्टूडियो में 'द लॉस्ट वर्ल्ड', 'द वर्ल्ड इज नॉट इनफ', 'गोल्डन आई', 'मिशन इम्पॉसिबल', 'जीआईजो' और 'आयरन मैन' जैसी फिल्मों की डबिंग हो चुकी है.

कैसे मिला मौका?

पहली बार कैसे मिला डबिंग का मौका? इस सवाल के जवाब में अशिम कहते हैं, ''हमारे एक दोस्त लंदन स्थित बीबीसी में किसी काम से गए थे. वहां उनकी मुलाक़ात 'यूनाइटेड इंटरनेशनल पिक्चर्स (यूआईपी)' के एक अधिकारी से हुई. बातों-बातों में जब उन्होंने उनसे पूछा कि भारत में कौन है जो हॉलीवुड फिल्मों की डबिंग कर सकता है, तो उन्होंने हमारा ज़िक्र किया. इस तरह यूआईपी ने हमसे संपर्क साधा और हमें 'जुरासिक पार्क' को हिंदी में डब करने का काम मिल गया.''

चूंकि यह पहली फिल्म थी, जो डब हो रही थी, इसलिए यूआईपी ने कुछ शर्तें भी थी लगाई थीं, जैसे कि साउंड मिक्सिंग 'डॉल्बी' में होना चाहिए. इसके लिए खासतौर पर अशिम ने अपने स्टूडियो को डॉल्बी स्टूडियो में बदलवाया.

अशिम कहते हैं कि 'जुरासिक पार्क' के हिंदी रूपांतरण का काम उन्होंने हिंदी टीवी नाटकों के मशहूर लेखक मीर मुनीर को सौंपा.

मीर मुनीर ने बीबीसी को बताया कि जब अशिम ने उन्हें पहली बार इस काम के लिए कहा तो उन्होंने उनसे फिल्म की स्क्रिप्ट मांगी. स्क्रिप्ट पढ़कर उन्हें लगा कि यह तो बहुत मुश्किल विषय है. फिर उन्होंने फिल्म भी देखी. इसके बाद भी उन्हें लगा कि यह काम शायद वे न कर पाएं.

लेकिन अशिम के कहने पर उन्होंने इस काम को हाथ में लिया. सबसे पहले उन्होंने फिल्म की अंग्रेजी स्क्रिप्ट छह-सात बार पढ़ी और तीन-चार बार फिल्म भी देखी.

मीर कहते हैं, "इतना सब करने के बाद उन्हें कुछ-कुछ समझ आने लगा कि फिल्म कैसे लिखी जा सकती है. इसके बाद हमने फिल्म का पहला ड्राफ्ट लिखा. डबिंग में तो 'लिप सिंक' सबसे ज़रूरी होता है. लेकिन हमने सोचा कि एक बार खाका तैयार हो जाए, 'लिप सिंक' के बारे में फिर सोच लेंगे.''

उन्होंने बताया,'' खाका तैयार होने के बाद हम बस टीवी के आगे बैठ कर बार-बार फिल्म देखते थे, बीच-बीच में रोकते रहते थे, देखते थे कि किसने क्या बोला है और जो हमने लिखा है वह उससे मिलता भी है या नहीं.''

डबिंग हुई मुश्किल

इसके बाद आई असली डबिंग की बारी. मीर मुनीर कहते हैं,''जब डबिंग शुरू हुई तो हमें लगा कि इतनी मेहनत करने के बाद भी चीज़ें मैच नहीं कर रही हैं. कहीं-कहीं अंग्रेजी संवाद बहुत छोटे थे और हमारे हिंदी संवाद लंबे हो रहे थे. कहीं इसका उल्टा हो रहा था. फिर हमने संवादों में बदलाव भी किए.''

जितनी मुश्किल मीर मुनीर को संवाद लिखने में आई उतनी ही मुश्किल डबिंग आर्टिस्ट शक्ति सिंह को भी हुई. शक्ति सिंह आज 'जेम्स बांड' के हीरो डेनियल क्रैग से लेकर 'जीआईजो' के ब्रूस विलिस तक की आवाज़ हैं. लेकिन बीस साल पहले 'जुरासिक पार्क' को डब करते हुए तो बात ज़रूर अलग रही होगी.

शक्ति सिंह कहते हैं,''इन 20 सालों में बहुत कुछ बदला है. तकनीक तो बहुत ही बदल गई है. उस समय 'लूप कटिंग सिस्टम' होता था. तब 'लिप सिंक' भी बहुत कठिन होता था. लेकिन अब तकनीक इतना आगे पहुंच गई है कि अगर आप 'आउट सिंक' भी हैं तो मशीन सब 'सिंक' कर देती है.''

हॉलीवुड की एक बड़ी फिल्म जब हिंदी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में रिलीज़ होती है तो ऐसे में फिल्म में एक डबिंग आर्टिस्ट की आवाज़ की क्या भूमिका होती है?

इसके जवाब में शक्ति सिंह कहते हैं, ''डबिंग आर्टिस्ट की आवाज़ की भूमिका एक कलाकार की ही तरह होती है.इसके बाद भी भारत में डबिंग आर्टिस्ट को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता जितना कि हॉलीवुड में समझा जाता है. यहां तो प्रोडूसर डबिंग आर्टिस्ट पर पैसे खर्च करने को भी तैयार नहीं होते हैं.''

भले ही डबिंग आर्टिस्ट को पैसे कम मिलते हों लेकिन भारत में डब फिल्मों का भविष्य सुनहरा दिखता है. खासतौर पर हॉलीवुड की एक्शन फिल्में तो भारतीय दर्शकों में काफी लोकप्रिय हैं.

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