क्या दादा साहेब फाल्के भारत रत्न के हक़दार हैं?

“मैंने ऐसी एक चिट्ठी पढ़ी थी जो मेरे दादाजी यानी दादा साहेब फाल्के ने अपने बड़े बेटे को लिखी थी. उसमें फाल्केजी ने लिखा था कि बेटा थोड़े पैसे भेज दो, अभी ज़हर खाने को भी हमारे पास पैसे नहीं है. ये पत्र पढ़कर मेरा मन बहुत दुखी हुआ था. अंतिम दिनों में दादा साहेब की ये स्थिति हो गई थी. सिनेमा के सौ साल पूरा होने पर उनका उचित सम्मान यही होगा कि दादा साहेब को भारत रत्न दिया जाए.”

दादा साहेब की कुछ दुलर्भ तस्वीरें

ये दर्द और शिकायत है दादा साहेब फाल्के के पोते किरण फाल्के की. आज भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरा होने पर जश्न मनाया जा रहा है. उनके नाम पर रखा गया दादा साहेब सम्मान तीन मई को प्राण को दिया गया. लेकिन इतना भर करना क्या काफी है?

तीन मई 1913 में धुंडीराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र नाम की पहली भारतीय फीचर फिल्म रिलीज़ कर इतिहास रचा था.

भारतीय सिनेमा के सौ साल पर बीबीसी विशेष

लेकिन ख़ुद दादा साहेब फाल्के ने अपने अंतिम दिन बहुत बुरे हालात में गुज़ारे. अभी कुछ दिन पहले 30 अप्रैल को उनका जन्मदिन था लेकिन मीडिया की सुर्खियों से वे ग़ायब ही रहे जबकि आमिर खान के 25 साल पूरे होने पर दिन भर 29 अप्रैल को खलबली मचती रही.

दादा साहेब फाल्के के परिवार की केवल एक सदस्य ऐसी बची हैं जो फाल्के के साथ रह चुकी हैं- उनकी बेटी की बेटी यानी नातिन उषा पाटनकर.

पूर्व में हुई और कुछ दिन पहले हुई बातचीत में उषा ने पुरानी यादों को टटोलते हुए बताया, “अपने अंतिम दिनों में दादा साहेब काफी बीमार थे और बूढ़े हो गए थे, उनकी याददाश्त करीब-करीब जा चुकी थी. लेकिन जब मैं उन्हें दवा देने आती तो वे मुझसे सिनेमा की ही बातें करते, बताते कि वे कौन सी फिल्म बनाना चाहते हैं. पूरे हाव-भाव से बताते कि उनकी फिल्म का सीन कैसे फ़िल्माया जाए कि वो अच्छा लगे. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन दादा साहेब के दिमाग़ में सिनेमा, प्रोजेक्टर की बातें चलती थीं.”

उषा ने बातचीत के दौरान बताया कि दादा साहेब की मौत के बाद सब परिवारजनों के मन में बहुत कड़वाहट थी कि अंतिम दिनों में किसी ने भी साथ नहीं दिया और परिवारवालों को तो सिनेमा से नफरत सी हो गई थी.

पैसों की गड्डियाँ बैलगाड़ी में आती थीं

दादा साहेब फाल्के ने जब फिल्में बनानी शुरु की थीं तो बहुत अच्छे दिन भी देखे. ऊषा पाटनकर बताती हैं, “दादा साहेब की पत्नी यानी मेरी नानी बताया करती थीं कि फिल्मों से इतनी कमाई होती थी कि पैसे की गड्डियाँ बैलगाड़ी में भर-भर के लाई जाती थीं. जब हालत ख़राब हुई तो नानी अपने गहने बर्तन सब बेच डालती."

हिंदी सिनेमा की 'माँ' और 'मौसी'

दादा साहेब फाल्के ने लंका दहन, मोहिनी भस्मासुर जैसी पौराणिक फिल्में बनाई. कहा जाता है कि उस समय उपलब्ध तकनीक की सीमाओं के बावजूद उन्होंने कई नायाब प्रयोग किए और भारतीय सिनेमा को नया आधार दिया.

लेकिन फिल्मों में जैसे-जैसे ध्वनि और पैसे का बोलबाला बढ़ने लगा, दादा साहेब फाल्के का दबदबा घटने लगा.

'बच्चों को फिल्मों से नफ़रत हो गई'

फाल्केजी के पोते किरण बताते हैं कि नासिक में दादा साहेब के बंगले को सहेजने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की गई. वो बहुत जर्जर हालत में था और बाद में उस ढहाकर नई इमारत खड़ी कर दी गई. हालांकि बंगले से कई बेशकीमती चीज़ें मिली.

Image caption दादा साहेब फाल्के का मोम का पुतला बनाया गया है

पोते किरण फाल्के बताते हैं, “दादा साहेब फाल्के की मौत के बाद उनके बेटों की आर्थिक हालत बहुत दयनीय थी. किसी तरह उन्होंने गुज़ारा किया. इसिलए दादा साहेब की चीज़ों को सहेजकर रखने के बारे में भी उनके बेटे बहुत कुछ नहीं कर पाए और हम बच्चों से सिनेमा वगैरह की बात नहीं करते थे. दादा साहेब की कुछ फिल्में तो इतनी ख़राब हो चुकी थी कि मेरे सामने ही पिताजी ने उन्हें जला दिया था.”

उनके कैमरे वगैरह का क्या हुआ कभी पता नहीं चला लेकिन उनकी कार बरसों बाद नासिक के पुराने बाज़ार में मिली जिसे अब रिस्टोर किया जा रहा है.

ऊषा पाटनकर कहती हैं कि उनके नाना यानी दादा साहेब फाल्के दूरदृष्टा थे और जानते थे कि वो जिस उद्योग को खड़ा कर रहे हैं वो आगे जाकर बहुत फलने फूलने वाला है. इतना ही नहीं वे बहुत अच्छा खाना भी बनाते थे. लेकिन ऊषा ये स्वीकार करने से भी नहीं हिचकिचाती कि दादा साहेब विरोधाभासी हस्ती थे जिनमें बहुत सी खा़मियाँ भी थीं.

करीब दो साल पहले हुई बातचीत में ऊषा ने दिल की बात कुछ यूँ रखी थी, “बड़ी हस्तियों और उनके उनके बच्चों के साथ कई बार ऐसा होता है- चाहे वो गांधीजी हों या तिलक. परिवार की ओर दादा साहेब का कोई ध्यान नहीं रह पाता था, सिनेमा ही सब कुछ था. अपने बच्चों से वो सर्वश्रेष्ठ की ही उम्मीद करते थे. मेरे सबसे छोटे मामा तो पढ़ लिख भी नहीं पाए थे, आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब थी. यही वजह है कि फ़िल्मों के प्रति फाल्के परिवार के सदस्यों की रुचि नहीं हुई. दादा साहेब बेहतरीन फिल्मकार थे पर उनमें बिज़नेस सेंस नहीं थी जिस वजह से फिल्म कारोबार में उनकी ये हालत हुई.”

भारत रत्न की माँग

किरण फाल्के ने बताया कि दादा साहेब की पत्नी सरस्वती बाई का भी अहम योगदान था. वे उनकी फिल्मों का संपादन करती थीं, फिल्म को दीए के प्रकाश में धोना, सब कलाकारों के लिए खाना बनाना ..सब काम वही किया करती थीं. फाल्के की बड़ी बेटी मंदाकिनी को पहली बालिका कलाकार माना जाता है जिन्होंने कालिया मर्दान में काम किया था.

दादा साहेब की पहली फिल्म बनाने के संघर्ष पर कुछ साल पहले मराठी में फिल्म बनी थी हरीशचंद्राची फैक्ट्री जिसे भारत ने ऑस्कर के लिए भी नामांकित किया था.

फिल्म के निर्देशक परेश मोकाशी ने दादा साहेब पर काफी अध्ययन किया था. वे कहते हैं, “फाल्केजी विचित्र मिश्रण वाले इंसान थे. उस एक व्यक्ति में बहुत बड़ा शास्त्री भी छिपा है, कलाकार भी है लेकिन वे बहुत इसेंट्रिक भी थे. वो जानते थे कि अगर फिल्मों को उद्योग का दर्जा मिलता है तो ये कितना क्रांतिकारी कदम होगा.”

आज दादा साहेब फाल्के के परिवारवालों की बस इतनी सी ख़्वाहिश है कि जब सिनेमा के 100 साल का जश्न मनाया जा रहा है तो उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा जाए.

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