'थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब'

दबंग

हिंदी सिनेमा के 100 यादगार डायलॉग्स की तीन कड़ियों में आपने 75 डायलॉग पढ़ चुके हैं. पेश है इसका आखिरी हिस्सा जिसमें आप 25 और ऐसे ही दमदार डायलॉग पढ़ेंगे. बीबीसी के पाठकों के लिए इन डायलॉग्स का संकलन वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने किया.

76. श्री 420 (1954): निर्देशक- राज कपूर

संदर्भ- छोटे शहर का ईमानदार नायक गरीबी से तंग आकर भ्रष्ट हो गया है. वह बढ़िया सूट पहनकर खड़ा है लेकिन आइने में उसकी छवि में वो फटे पुराने कपड़े पहना है. जापानी जूता,रुसी टोपी,छवि के चेहरे पर व्यंग्य की मुस्कान है.

सुनिए राज कपूर को

शीशे में राज की छवि कहती है- वाह राज क्या ठाठ है. तुम्हारे ये शानदार सूट, मंहगी टाई, क्या चमकदार जूते हैं. वाह! भाई तुमने सच ही कहा था कि एक दिन बम्बई पर राज करोगे.

राज असलियत में - मेरा दम घुट रहा है.

77. मिस्टर एंड मिसेज़ 55 (1955) : निर्देशक- गुरूदत्त

ललिता पवार अपने बेटी के लिए एक किराए का पति चुनना चाहती है जो बाद में उसे तलाक दे दे. गुरुदत्त ग़रीब आदमी है ललिता पवार - तुम्हारी बातों से लगता है कि तुम कम्युनिस्ट हो गुरुदत्त - जी नहीं मैं कम्यूनिस्ट नहीं...कार्टूनिस्ट हूं मुझसे क्या डरना .

78. शोले (1975): निर्देशक- रमेश सिप्पी

बसंती (हेमा मालिनी) तांगा चलाता हुए जय और वीरू को कई बार अपना नाम बता चुकी है. उसके बाद भी जब वो कहती है कि "तुमने ये नहीं पूछा कि हमारा नाम क्या है?" तब जय (अमिताभ बच्चन) : तुम्हारा नाम क्या है बसंती.

चरित्र कलाकारों पर विशेष

79. कालीचरण (1976): निर्देशक- सुभाष घई

अजीत: सारा शहर मुझे लायन के नाम से जानता है.

80. अमर अक़बर एंथोनी (1977): निर्देशक- मनमोहन देसाई

शराबी एंथनी गुंडों से पिटकर आया है. आईने के सामने खड़े होकर अपने प्रतिबिंब से बात कर रहा है. एंथनी (अमिताभ बच्चन): ए. जाके देख तेरे को कितना मारा है. आइने में अपना थोबड़ा देख. अख्खा इडियट लग रहा है. तेरे को अपुन कितनी बार बोला दारू नई पीने का. दारू बहुत खराब चीज़ है. पन, तुम अपना सुनतईच्च किधर है.

81. सत्ते पे सत्ता (1981)

अमिताभ बच्चन - दारु नहीं पीने का. दारू बहुत खराब चीज़ है. दारू पीने से लीवर ख़राब हो जाता है. अपुन पीता नहीं है. वो एक दिन दोस्त की शादी में गया तो खाली चार बाटली पी लिया.

भारतीय सिनेमा के शतक पर विशेष

82. राम तेरी गंगा मैली (1985): निर्देशक- राज कपूर

पहाड़ की मासूम लड़की शहरी गुंडो से भागती हुई शमशान घाट पहुंचती है. पीछे शव जल रहा है. चौकीदार कहता है: बेटी तुम्हें मुर्दों से डर नहीं लगता? नायिका (मंदाकिनी): डर तो ज़िंदा लोगों से लगता है, उनकी हवस से लगता है. बेचारे मुर्दों से क्या डरना...

83. राम तेरी गंगा मैली (1985): निर्देशक- राज कपूर

नेताजी बनारस से गाने वाली गंगा नामक लड़की ले आए और मालूम पड़ने पर कि यह उनके होने वाले दामाद की प्रेमिका रही है, लड़की को लाने वाले सईद जाफरी से कहते हैं - गंगा को कलकत्ता से आज रात ही वापस बनारस ले जाना. सईद जाफरी - गंगा कभी कलकत्ता से बनारस की ओर नहीं बहती, वो बनारस से कलकत्ता ही आती है.

84. मैंने प्यार किया (1989): निर्देशक- सूरज बड़जात्या

मोहनीश बहल: एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते.

85. अग्निपथ (1990): निर्देशक- मुकुल एस आनंद

अमिताभ बच्चन: विजय दीनानाथ चौहान. पूरा नाम. बाप का नाम दीनानाथ चौहान. मां का नाम सुहासिनी चौहान. गांव मांडवा. उमर 36 बरस नौ महीने तीन दिन और ये सोलहवां घंटा चल रहा है.

बॉम्बे टॉकीज का रिव्यू

86. सौदागर (1991): निर्देशक- सुभाष घई

राजकुमार: जानी. हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे. लेकिन उस वक्त बंदूक भी हमारी होगी. गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा.

87. तिरंगा (1993): निर्देशक- मेहुल कुमार

संदर्भ: एक ईमानदार पुलिस अफसर की हत्या हो जाती है. उसे शासकीय सम्मान से विदाई दी जाती है. इस अवसर पर दिल्ली से नेता आए हैं. नेताजी: एक ईमानदार साहसी अफसर मारा गया है, दिल्ली से जांच के लिए टीम आएगी. नाना पाटेकर - दिल्ली सिर्फ देखती रहती है, इमारतें ढह जाती है , लोग मारे जाते हैं दिल्ली ख़ामोश देखती रहती है.

88. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1996): निर्देशक- आदित्य चोपड़ा

राज (शाहरुख खान): बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें तो होती रहती हैं सैन्योरीटा.

89. यशवंत (1997)

नाना पाटेकर - साला एक मच्छर, बस एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है. एक मच्छर काटा कि खेल खत्म.

90. दिल तो पागल है (1997): निर्देशक- यश चोपड़ा

करिश्मा कपूर: मैंने दोस्ती को प्यार समझने की भूल की तुम प्यार को दोस्ती समझने की भूल कर रही हो.

एक फिल्म के बाद डब्बा गुल

91. मृत्युदंड (1997): निर्देशक- प्रकाश झा

माधुरी दीक्षित अपने पति (अयूब खान) से: पति हैं, पति ही बने रहिए. परमेश्वर बनने की कोशिश मत कीजिए.

92. रंग दे बसंती(2006): निर्देशक- राकेश ओमप्रकाश मेहरा

सिद्धार्थ: कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता. उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है.

93. चक दे इंडिया (2007): निर्देशक- शिमित अमीन

कबीर खान (शाहरुख खान): हर टीम में सिर्फ एक ही गुंडा होता है. और इस टीम का गुंडा मैं हूं.

94. गुरू (2007): निर्देशक- मणिरत्नम

सिनेमा और सेंसर

संदर्भ: जब गुरू (अभिषेक बच्चन) को अपने पर लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की सफाई के लिए पांच मिनट दिए जाते हैं.

अभिषेक बच्चन: आपने मुझे पांच मिनट दिए थे ना. मैंने साढ़े चार मिनट में सब खत्म कर दिया. तीस सेकंड का मुनाफा हुआ. यही होता है बिजनेस. अब अगर आप इसके लिए भी मुझे सज़ा देना चाहें तो दे दीजिए. गुरूकांत देसाई सज़ा से नहीं डरता.

95. ओम शांति ओम (2007): निर्देशक- फराह खान

दीपिका पादुकोण: एक चुटकी सिंदूर की क़ीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू.

96. 3 इडियट्स (2009): निर्देशक- राजकुमार हीरानी

टीम '3 इडियट्स' की वापसी

आमिर खान: बच्चा क़ाबिल बनो क़ाबिल. कामयाबी झक मारकर तुम्हारे पीछे आएगी.

97. माइ नेम इज़ खान (2010): निर्देशक- करण जौहर

शाहरुख खान: माइ नेम इज़ ख़ान एंड आइ एम नॉट ए टेरोरिस्ट.

98. दबंग (2010): निर्देशक- अभिनव कश्यप

सोनाक्षी सिन्हा - थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है.

99. द डर्टी पिक्चर (2011): निर्देशक- मिलन लूथरिया

निर्माता नई नायिका का समर्थन करते हुए: पब्लिक सामान देखती है, दुकान नहीं

100. द डर्टी पिक्चर(2011): निर्देशक- मिलन लूथरिया

विद्या बालन: फिल्म सिर्फ तीन वजहों से चलती है. इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट

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