चुनाव के बाद बदल सकती है पाकिस्तान की भारत नीति?

भारत और पाकिस्तान रिश्ते
Image caption पाकिस्तानी पार्टियां भारत से अच्छे रिश्ते चाहती हैं

पाकिस्तान में होने वाले आम चुनावों पर भारत की नजरें भी टिकी हुई हैं. हालांकि इस बार के चुनाव प्रचार में ऐसी कोई बात नहीं दिखती जिसे भारत विरोधी कहा जा सकता है.

सभी मुख्य पार्टियां भारत से रिश्तों को बेहतर बनाने के हक में हैं.

कश्मीर मुद्दे का जिक्र तीनों ही अहम पार्टियों पीएमएल (एन), पीपीपी और तहरीक-ए-इंसाफ के घोषणा पत्र में दिखाई देता है.

लेकिन इसे दोतरफा रिश्तों में बाधा के तौर पर नहीं पेश किया जा रहा है.

बीबीसी ने पाकिस्तान में राजनीतिक विश्लेषक मारियाना बाबर और भारत में पूर्व केद्रीय मंत्री व पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके मणिशंकर अय्यर से बात की.

और तीनों पार्टियो के बारे में जानना चाहा कि अगर वो सत्ता में आती हैं तो भारत के प्रति उनका नजरिया किस तरह का हो सकता है.

पीएमएल (एन)

मरियाना बाबर: भारत, अफगानिस्तान और अमरीका के साथ पाकिस्तान की क्या नीति रहेगी, इसका फैसला पाकिस्तान सेना मुख्यालय में होता है.

Image caption नवाज शरीफ भारत से अच्छे रिश्तों के पैरोकार हैं

लेकिन इसके बावजूद जब नवाज शरीफ दो बार प्रधानमंत्री रहे तो उन्होंने भारत से रिश्ते सुधारने की कोशिश की.

आजकल जो माहौल है उसमें ये कहना सेना की मजबूरी बन गई है कि दुश्मन भारत नहीं है, बल्कि दुश्मन देश के अंदर हैं यानी तालिबान और अल कायदा.

नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने तो पूरी कोशिश करेंगे कि भारत से रिश्ते बेहतर हों. लेकिन ये भी देखना होगा कि क्या भारत की सरकार भी उनकी तरफ हाथ बढा़एगी.

नवाज शरीफ को सेना के साथ मिल कर ये भी तय करना है कि क्या पड़ोसी देश में मुंबई जैसे हमलों को वो रोक पाएंगे या नहीं.

रिश्तों की बेहतरी के लिए कारोबारी संबंध भी मजबूत करने होंगे.

खास कर भारत को अभी पाकिस्तान ने व्यापार के लिए प्राथमिकता वाले देश का दर्जा नहीं दिया है.

रही बात कश्मीर की तो शरीफ खुद भी कश्मीरी हैं लेकिन वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे इस मुद्दे को लेकर रिश्ते खराब हों.

मणिशंकर अय्यर: नवाज शरीफ: पाकिस्तान के आम चुनावों में जो आवाजें भारत के साथ बेहतरी रिश्तों की बात करती हैं, उनमें नवाज शरीफ सबसे बुलंद आवाज हैं.

उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे.

हालांकि नवाज शरीफ के विदेश मंत्री सरताज अजीज की आत्मकथा से अब हमें ये पता चलता है कि परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ के मंत्रिमंडल को भरोसा दिलाया था कि वो एक हफ्ते में श्रीनगर को हासिल कर लेंगे और इस पर नवाज शरीफ ने उन्हें आगे बढ़ने को कहा था.

इसी के बाद कारिगल युद्ध हुआ.

लेकिन अब नवाज शरीफ जानते हैं कि कश्मीर का मसला जंग से नहीं सुलझ सकता है.

बातचीत के जरिए ही इसे हल किया जा सकता है.

खास कर नवाज शरीफ ने कहा है कि 26/11 को जो हुआ, दोनों देशों को मिल कर इस बात की जांच करानी चाहिए कि पाकिस्तान में ऐसे कौन से लोग थे जिन्होंने इस हमले में मदद की.

पाकिस्तान तहरीके इंसाफ

मरियाना बाबर: सबसे पहली बात, अमरीका के खिलाफ तहरीके इंसाफ के प्रमुख इमरान खान की तेजतर्रार बातें सिर्फ चुनावी बयानबाजी है.

Image caption बतौर क्रिकेटर इमरान के बहुत से प्रशंसक भारत में भी हैं

अगर वो प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें अलग तरह से बात करनी होगी. हां, वो जरूर चाहेंगे कि पाकिस्तान विदेशी और खास कर अमरीकी मदद पर कम से कम निर्भर हो.

भारत के सिलसिले में उन्होंने बेहतर रिश्तों की वकालत की है. व्यापार को भी वो बढ़ाना चाहेंगे. कश्मीर का भी उन्होंने जिक्र किया है.

मेरा ख्याल है कि अगर वो प्रधानमंत्री बने तो पीपल्स पार्टी और नवाज शरीफ की तरह नहीं होंगे.

वो जो सोचते हैं, उस पर कदम उठाएंगे. हालांकि जितनी बातें वो अभी कह रहे हैं, उनमें से कुछ पर उन्हें समझौता करना होगा. सेना से भी समझौते करने होंगे.

ये सही बात है कि इमरान खान सत्ता के लिए नए होंगे. लेकिन हर कोई इस बात के लिए भी उनकी तारीफ करता है कि वो उनके दामन पर भ्रष्टाचार के दाग नहीं हैं.

मणिशंकर अय्यर: भले ही इमरान खान ने अफगान तालिबान के समर्थन में बयान दिए हो लेकिन वो जानते हैं कि जंग का रास्ता अब बचा नहीं है.

इसी सिलसिले में अगर कश्मीर की बात करें तो ये बात सौ फीसदी पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती है कि वो वहां कभी किसी परिस्थिति में जिहाद का समर्थन नहीं करेंगे.

लेकिन 99 फीसदी भरोसे के साथ ये बात कही जा सकती है. पाकिस्तानी जनता नहीं चाहेगी कि उसे किसी और जंग में छोंका जाए.

इसलिए इमरान अगर सत्ता में आते हैं तो उनसे किसी तरह का डर भारत को नहीं है.

अफगान समस्या को सुलझाने में भी वो मददगार हो सकते हैं क्योंकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वहां तालिबान हैं.

इसलिए उनके साथ बातचीत के जरिए समस्या को सुलझाया जा सकता है.

पीपीपी

मारियाना बाबर: पीपीपी की सरकार के दौरान मुंबई हमलों ने रिश्तों को बहुत खराब कर दिया. पीपल्स पार्टी अगर फिर सत्ता में आई तो वो रिश्तों की बेहतरी ही चाहेंगे.

Image caption जरदारी कश्मीर को रिश्तों में बाधा न बनने देने के हक में हैं

लेकिन पीपल्स पार्टी में एक हताशा है कि इसके लिए थोड़ा सा तो भारत भी हाथ बढ़ाए. दोनों देशों के बीच कोई भी घटना होती है तो रिश्ते एकदम खराब हो जाते हैं.

रिश्ते ऐसे होने चाहिए कि अगर कोई ऊंच नीच होती है तो उससे कोई असर न पड़े. दोनों ही मुल्कों में ऐसे लोग हैं जो नहीं चाहते कि रिश्ते अच्छे हों.

खासकर पिछली सरकार के दौरान हिना रब्बानी खर ने विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया था कि भारत से भले ही कोई बयान आए, उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलना है.

उन्होंने बहुत कोशिश की. कश्मीर के मुद्दे पर राष्ट्रपति जरदारी कह चुके हैं कि कश्मीर को हम भूल तो नहीं सकते हैं.

लेकिन ऐसा माहौल तो जरूर बना सकते हैं कि छोटी छोटी बातों को मुद्दा न बनाएं.

उन्होंने यहां तक कहा कि हो सकता है, हम से ये मुद्दा हल न हो लेकिन परिस्थितियां जरूर बनाई जाएं कि आने वाली पीढ़ियां इसे सुलझा सकें.

इस कश्मीरी और उनसे सहानुभूति रखने वाले बहुत नाराज हुए. लेकिन सच यही है.

मणिशंकर अय्यरः पाकिस्तान पीपल्स पार्टी जब 2008 में सत्ता में आई थी. तब उसने तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को चंद महीनों के भीतर तीन भारत भेजा.

बदकिस्मती की बात ये है कि जब वो तीसरे दौरे पर दिल्ली में थे तभी मुंबई पर हमला हो गया.

बाद में हिना रब्बानी खर पाकिस्तान की विदेश मंत्री बनीं.

उनकी इस बात से मैं बहुत प्रभावित हुआ कि दोनों देशों के बीच बातचीत कभी नहीं रुकनी चाहिए.

दोनों देशों के रिश्ते सांप सीढ़ी जैसे खेल का शिकार है. हम 100 पर पहुंचने वाले ही होते हैं कि सांप हमें काट जाता है और हम वापस शून्य पर आ जाते हैं.

मैंने भी अपनी एक किताब में इस बात को कहा है कि बातचीत का सिलसिला कभी नहीं रुकना चाहिए, हालांकि भारत ने अभी इस पर अमल नहीं किया है.

जब भी कुछ हो जाता है, भारत में आवाज बुलंद होती है कि बातचीत बंद करो. बातचीत रोकना सबसे आसान है, लेकिन इससे चरमपंथी ताकतें ही मजबूत होती हैं.

संबंधित समाचार