फिल्म रिव्यू: कैसी है ज़ॉम्बीज़ पर बनी 'गो गोआ गॉन'

  • 10 मई 2013
गो गोआ गॉन

इरॉस इंटरनेशनल और इल्युमिनाती फिल्म्स की 'गो गोआ गॉन' एक कॉमेडी फिल्म है जो जॉम्बीज़ पर बनी है.

हार्दिक (कुणाल खेमू), लव (वीर दास) और बनी (आनंद तिवारी) रेव पार्टी मनाने के लिए एक द्वीप में जाते हैं.

यहां लव की मुलाक़ात लूना (पूजा गुप्ता) से होती है. पूजा भी अपने दोस्तों के साथ पार्टी मनाने यहां आई हुई है.

वहां पर एक खास किस्म की ड्रग्स खाकर कई लोग मर जाते हैं और जॉम्बी बन जाते हैं. दरअसल ज़ॉम्बीज़ वो लोग होते हैं जिनके दिमाग़ का एक छोटा सा हिस्सा मरने के बाद भी काम करता रहता है, जिसकी वजह से ये लोग चहलकदमी करते नज़र आते हैं.

हार्दिक, लव और बनी ड्रग नहीं लेते और ज़िंदा बच जाते हैं. ज़ॉम्बीज़ उनका पीछा करते हैं. लूना के भी दोस्त जॉम्बी बन चुके हैं.

वो चारों किसी तरह से जॉम्बीज़ से बचना चाहते हैं, क्योंकि अगर किसी जॉम्बी ने उनमें से किसी एक को भी काट लिया तो वो भी जॉम्बी बन जाएगा.

उनके लिए सहारा बनकर आता है बोरिस (सैफ अली ख़ान) और उसका एक दोस्त जिन्हें मालूम है कि ज़ॉम्बी को कैसे मारा जाता है.

क्या चारों ज़ॉम्बीज़ के कहर से बच पाते हैं. बोरिस और उसका साथी कहां चले जाते हैं.

कहानी

राज, कृष्णा डीके और सीता मेनन की कहानी काफी अलग किस्म की है.

फिल्म की कहानी हॉरर है लेकिन इसमें कॉमेडी भी साथ-साथ चलती रहती है. ये पहली ऐसी मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्म है जिसमें जॉम्बीज़ की अवधारणा बताई गई है.

फिल्म का स्क्रीनप्ले एक हद तक दिलचस्प है लेकिन बाद में इसमें बड़ा दोहराव लगने लगता है.

फिल्म में जॉम्बीज़, बोरिस (सैफ अली खान) का पीछा ज़्यादा क्यों नहीं करते, ये नहीं बताया गया.

हार्दिक, लव, बनी और बोरिस एक दूसरे के साथ जो जोक्स शेयर करते हैं वो मज़ेदार ज़रूर हैं लेकिन इतना प्रभावशाली नहीं कि लोग हंसते-हंसते बेहाल हो जाएं.

कुछ-कुछ जोक्स तो ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ बड़े शहर के युवा ही समझ पाएंगे. फिल्म में थोड़ा रोमांच ज़रूर है लेकिन फिल्म का क्लाईमेक्स बड़ा बचकाना है.

अभिनय

सैफ अली ख़ान के प्रशंसकों को निराशा होगी क्योंकि फिल्म में वो जॉम्बीज़ को मारने के अलावा कुछ भी नहीं करते.

हां फिल्म के डायलॉग ज़रूर अच्छे हैं. जो कुणाल खेमू और सीता मेनन ने लिखे हैं. डायलॉग बिलकुल फिल्म के मूड के हिसाब से ही हैं.

कुणाल खेमू ने अच्छा अभिनय किया है. उन्होंने अपने रोल के साथ पूरी तरह से न्याय किया है. उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है.

Image caption पूजा गुप्ता ग्लैमरस भी लगी हैं और उन्होंने अभिनय भी ठीक किया है.

वीर दास ने भी अच्छी कॉमेडी की है. अपने भावशून्य चेहरे के साथ उन्होंने अच्छा हास्य पैदा किया है.

आनंद तिवारी का अभिनय भी अच्छा है. पूजा गुप्ता भी ग्लैमरस लगी हैं और अपना रोल ठीक से निभा गई हैं.

सैफ अली खान भी फिल्म में ठीक रहे हैं. कई जगह उन्होंने अच्छी कॉमेडी की है लेकिन फिल्म के ज़्यादातर हिस्से में उन्होंने ज़ाम्बीज़ को मारने के अलावा कुछ नहीं किया है.

निर्देशन

राज और कृष्णा डीके का निर्देशन अच्छा है. लेकिन उनकी कहानी शहरी युवाओं को ही भा पाएगी.

सचिन जिगर का संगीत अच्छा है. फिल्म का ‘स्लोली-स्लोली’ गाना पहले ही हिट हो चुका है. बाकी गाने भी अच्छे हैं.

कुल मिलाकर गो गोआ गॉन अपने किस्म की पहली फिल्म है. जो बात इसके पक्ष में जाती है.

लेकिन ये बेहद सीमित दर्शक वर्ग को लुभा पाएगी. कहानी में रोमांच है, लेकिन एक सीमा तक.

बड़े शहरों में शायद ये अच्छी चल जाए लेकिन इसकी लागत वसूल करने के लिए ये काफी नहीं है.

छोटे शहरों में इस फिल्म से कोई ख़ास उम्मीद नहीं हैं.,

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