कान फिल्म समारोह: द ग्रेट तमाशा

  • 27 मई 2013

बारह दिनों तक दुनिया भर की फ़िल्मी हलचल बटोरने के बाद कान फिल्म समारोह समाप्त हुआ.

हर साल इस समारोह में अपनी हाजरी दर्ज कराना अब बॉलीवुड में एक चलन बन गया है. कुछ लोग तो ये सोच कर भी इस समारोह में जाते हैं कि इससे भारतीय सिनेमा को एक ग्लोबल प्लेटफार्म मिलेगा.

कहने को कान फिल्म समारोह में भारत की मौजूदगी बड़े ही जोर शोर से जताई जाती है. कोई बड़ी पार्टी हो या फिर रेड कारपेट भारतीय सितारे कोई मौका अपने हाथ से जाने नहीं देते.

जैसे ही कान फिल्म समारोह शुरू होता है आपको ऐसे ऐसे फिल्मकार देखने को मिल जाते हैं जिनका नाम आपने पहले कभी सुना भी नहीं होता. शर्लिन चोपड़ा, अमीषा पटेल और पूजा गुप्ता जैसे अभिनेत्रियों को ही देख लीजिए जिनके लिए कान समारोह के रेड कारपेट पर होना या फिर किसी बड़ी फिल्म के प्रीमियर को अटेंड करना ही अपने आप में एक उपलब्धि है.

ऐश्वर्या राय और सोनम कपूर एक कॉस्मेटिक कंपनी से जुड़े होने की वजह से इस समारोह में हिस्सा लेती आईं हैं. और हां मल्लिका शेरावत को हम कैसे भूल सकते हैं. रेड कारपेट पर उनके कपड़े हों या फिर अदाएं लगता है जैसे वो पैदा ही सिर्फ पोस करने के लिए हुई हैं. कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि समारोह के दौरान वो कुछ फोटोग्राफर नियुक्त करती हैं जो हर वक़्त बस उनके पीछे घूमते हैं. ऐसा करने से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उनका मान बढ़ता है, कम से कम वो तो ऐसा ही सोचती होंगी.

फिल्मों का बड़ा बाज़ार - कान

Image caption ऐश्वर्या राय पिछले कई सालों से इस समारोह में आ रही हैं.

कान फिल्म समारोह में शोबाज़ी करने वालों की सूची तो बहुत लम्बी है. लेकिन अगर नज़र दूसरी ओर फेरें तो भारतीय सिनेमा से जुड़े लोग इस समारोह में इसलिए भी आते हैं क्योंकि कान फिल्मों का एक बहुत बड़ा बाज़ार है.

भारत के बड़े बड़े फिल्मकार इस समारोह में इसलिए आते हैं ताकि वो अपनी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों को दिखा सकें और बेच सकें. आज की तारीख़ में तो हालत ये हो गए है कि अगर कोई फिल्मकार अपनी पांच मिनट की फिल्म भी यहां लाता है तो गा-गा कर दुनिया को बताता है. ऐसा लगता है मानो भारतीय सिनेमा दुनिया से अपील कर रहा हो कि कोई तो उसे गंभीरता से ले ले.

इस समारोह में भारतीय सिनेमा की उपलब्धियों की बात करें तो शर्मीला टैगोर, नंदिता दास और विद्या बालन समारोह की जूरी का हिस्सा रह चुकी हैं.

सालों हो गए इस बात को जब किसी भारतीय फिल्म को कान फिल्म समारोह के प्रतियोगिता वर्ग में हिस्सा लेने का मौका मिला हो. 1994 में शाजी की ‘स्वाहम’ प्रतियोगिता का हिस्सा बनी थी. इसके अलावा मनीष झा की फिल्म 'अ वैरी वैरी साइलेंट फिल्म', मुरली नायर की 'अरिमपारा', विनोद गणात्रा की 'हेडा होडा' और गीतांजलि राव की एनीमेशन फिल्म 'प्रिंटेड रेनबो' को इस समरोह में इनाम तो नहीं मिला लेकिन हां सराहना ज़रूर मिली.

हाल फिलहाल में इनाम जीतने वाली फिल्मों में मुरली नायर की 'मराना सिंहासनम' और मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' शामिल हैं. समय के पहिए को अगर थोड़ा अतीत की दिशा में ले जाएं तो 1946 में चेतन आनंद की फिल्म 'नीचा नगर' ने इस समारोह में ग्रॉं प्री पुरस्कार जीता था. इस पुरस्कार के दस साल बाद सत्यजीत रे की फिल्म 'पाथेर पंचाली' को सर्वश्रेष्ठ ह्यूमन डोक्युमेंट पुरस्कार मिला.

भारतीय सिनेमा ने 100 साल

Image caption शर्मीला टैगोर कान जूरी का हिस्सा रह चुकी हैं.

इसी साल भारतीय सिनेमा ने 100 साल पुरे किए हैं. इन 100 सालों का जश्न कान फिल्म समारोह में भी मनाया गया लेकिन 'नीचा नगर' की बात किसी ने नहीं की. इस फिल्म में अभिनय करने वाली कामिनी कौशल माने बैठी थी कि समारोह से उन्हें निमंत्रण आएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ज़ाहिर है इस बात से वो खासी निराश थी.

समारोह में फिल्मों का चयन करने वाले एक सिलेक्टर को ये कहते हुए भी सुना गया कि जो फिल्में भारत से आती हैं वो अपने विषय और अपनी तकनीक में 30 साल पुरानी होती हैं. इतना ही नहीं उसके मुताबिक बॉलीवुड की फिल्में हॉलीवुड की नक़ल होती हैं इसलिए विदेशी दर्शकों को लुभाने में असफल रहती हैं.

क्रॉस-ओवर सिनेमा के नाम पर भारत में भले ही कितना हो-हल्ला क्यों न मचा लिया जाए सच तो ये है कि बॉलीवुड अभी भी ऐसी फिल्में नहीं बना पा रहा है जो विदेशों में बसे एनआरआई दर्शकों के अलावा किसी और को लुभा पाएं. बावजूद इन सब बातों के भारतीय फिल्में चाहती हैं कि वो ओस्कर जीतें या फिर कान प्रतियोगिता में हिस्सा लें.

कहने का मतलब ये कि चाहे बॉलीवुड के सितारे इस समारोह में कितना ही नाच गा लें, कितनी ही बार रेड कारपेट पर पोस कर लें. इस बात की ख़ुशी मना लें कि उन्होंने कुछ अंतर्राष्ट्रीय लोगों से पहचान बना ली है जिसका फायदा उनको बिज़नेस में होगा लेकिन सच तो ये है कि अब भी दिल्ली बहुत दूर है.

हां मैं ये ज़रूर मानती हूं कि कान में दिखाई जाने वाली भारतीय फिल्मों की संख्या में इजाफा हुआ है. इस साल अमित कुमार की 'मॉनसून शूटआउट' प्रतियोगिता वर्ग के बाहर दिखाई गई. 'बॉम्बे टाकीज़' की स्पेशल स्क्रीनिंग हुई. अनुराग कश्यप की 'अगली' डायरेक्टर्स फोर्टनाइट सेक्शन में दिखाई गई और 'द लंचबॉक्स' को इंटरनेशनल क्रिटिक्स वीक में दिखाया गया.

भारतीय बाज़ार की तलाश

Image caption मल्लिका शेरावत भी अब अकसर इस समरोह में नज़र आने लगी हैं.

हो सकता है कान फिल्म समारोह में दिखाई जाने वाली फिल्मों को कुछ अंतर्राष्ट्रीय खरीदार मिल जाएं. लेकिन सिक्के का एक पहलू ये भी है कि विदेशी खरीददार भी अपनी फिल्मों के लिए भारतीय बाज़ार तलाश रहे हैं. ये भी हो सकता है कि वो कुछ अच्छे भारतीय कलाकारों में दिलचस्पी रखते हों.

लेकिन जहां तक इस समारोह की बात है विदेशी खरीदारों की दिलचस्पी सिर्फ अच्छी फिल्मों में होती है और दुर्भाग्यवश भारत से आने वाली ऐसी फिल्मों की गिनती बहुत कम है. भारतीय फिल्मकार अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को लुभाने की कितनी ही कोशिश क्यों न कर लें सच तो यही है कि वो ऐसा कर नहीं पा रहे हैं.

ये समारोह एक बहुत ही महंगी छुट्टी साबित हो सकता है या फिर लोगों से संपर्क बनाने का एक मौका. लेकिन असल मज़ा तो तब आएगा जब कोई भारतीय फिल्म इस समारोह के प्रतियोगिता वर्ग में जगह बनाने में कामयाब होगी. तब रेड कारपेट पर खड़े होकर दुनिया को ये बताने में मज़ा आएगा की भारतीय फिल्मों में भी दम है. लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो सब तमाशा ही है.

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