नूतन के बेटे क्यों नहीं देखते उनकी फिल्में

  • 4 जून 2013
Image caption बीबीसी स्टूडियो में अपनी छोटी बहन तनूजा के साथ नूतन

सुजाता, पेइंग गेस्ट, सीमा, बंदिनी, सरस्वती चंद्र, मिलन और मैं तुलसी तेरे आंगन की जैसी फिल्मों में बेहतरीन अभिनय करने वाली अभिनेत्री नूतन की आज 77वीं जयंती है.

1991 में 54 साल की उम्र में कैंसर की वजह से उनका निधन हो गया.

(बीबीसी के खज़ाने से: नूतन से ख़ास मुलाक़ात)

बीबीसी ने बात की नूतन के बेटे अभिनेता मोहनीश बहल से, जिन्होंने उनके बारे में कई दिलचस्प बातें बताईं. पढ़िए.

मोहनीश बहल, अभिनेता और नूतन के बेटे

हमारा परिवार बिलकुल आम परिवारों की तरह था. मेरे दोस्तों के घर से मेरा घर बस इस मायने में अलग होता था कि हमारे यहां मां की जीती हुई तमाम ट्रॉफियां रखी होती थीं.

Image caption नूतन के बेटे मोहनीश बहल ने अपनी मां से जुड़ी कई बातें बीबीसी के साथ साझा कीं.

मुझे बचपन का एक मज़ेदार किस्सा याद आता है. एक बार मैं दोस्तों से मिल जुलकर लौट रहा था तो देखा की मां की कार हमारे घर के पास वाली लॉन्ड्री में खड़ी है. मैं वहां गया, तो पता चला कि मां तो वहां है ही नहीं.

मैं घर भागा तो मां वहां थीं. मैंने पूछा आप लॉन्ड्री गईं थीं, उन्होंने कहा हां. लेकिन अब तो आ गई हूं ना.

मैंने पूछा, तो आपकी कार वहां क्या कर रही है. उन्होंने आश्चर्य से कहा "क्या. मैं कार लेकर गई थी वहां. सॉरी, मैं भूल ही गई." मैं हैरान रह गया कि कोई कार लेकर जाए उसे कैसे भूल कर वापस पैदल आ सकता है.

फिल्में

मैं उनकी फिल्में ज़्यादा नहीं देखता. क्योंकि जितना मैं देखूंगा उतना ही उन्हें मिस करूंगा. और उन्होंने काफी गंभीर फिल्में भी की हैं.

जिससे मैं ज़्यादा आइडेंटीफ़ाइ नहीं कर पाता. मैं उन्हें पर्दे पर ही सही, लेकिन तकलीफ सहते हुए नहीं देख सकता.

मेरी मां एक प्रशिक्षित क्लासिकल डांसर थीं. मैं उनके तमाम शोज़ पर जाता था.

कई बार कश्मीर जैसी जगहों पर आउटडोर शूटिंग होती थी तब भी मैं उनके साथ जाता था.

मुझे देव साहब, राज अंकल और सुनील दत्त साहब के साथ उनकी जोड़ी अच्छी लगती है.

कैंसर से सामना

वो बेहद बहादुर और आध्यातिमक थीं. कैंसर जैसी बीमारी का उन्होंने बहादुरी से सामना किया.

जब उन्हें कैंसर का पता चला तो वो मायूस नहीं हुईं. उन्होंने कैंसर से पहली जंग जीत भी ली थी.

लेकिन उसके बाद कैंसर ने उनके लिवर पर आक्रमण किया. हमने जब दोबारा डॉक्टर से जांच कराई तब तक वो काफी फैल चुका था. और वो बच ना पाईं.

बीमारी के दौरान भी वो हमें हौसला देती रहीं. उनके जीवित रहते मेरा फिल्मी करियर शुरू हो चुका था लेकिन परवान नहीं चढ़ा था.

उन्होंने मेरी फिल्में 'मैंने प्यार किया' और 'बाग़ी' देखीं. उन्हें मेरा काम पसंद आया.

हालांकि मेरा फिल्मी करियर इससे कई साल पहले से शुरू हो चुका था. लेकिन बीच में दो ढाई साल मेरे पास काम नहीं था.

तब भी वो मेरी हिम्मत बढ़ाती रहती थीं. रात के डेढ़-दो बजे तक हम मां-बेटे साथ में बैठे रहते.

उन्होंने मुझे एक ही शिक्षा दी थी कि कैमरे के सामने हमेशा ईमानदार रहना और हमेशा जो दिल में हो वही करना.

मैं भी अपने बच्चों को यही सलाह देता हूं.

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