क्या वाकई में 'क्रूर' है बॉलीवुड?

  • 8 जून 2013
जिया ख़ान

जिया ख़ान की मौत का सच अभी तक सामने नहीं आया है लेकिन उनके जाने से बॉलीवुड के कई अंतहीन संघर्षों की कहानियां चर्चा का विषय बन गई है.

(जिया ख़ान का अंतिम संस्कार)

फिल्म 'निशब्द' में जिया को पहला ब्रेक देने वाले रामगोपाल वर्मा ने एक अख़बार में लिखा, "मैं बेफकूफ था कि तुम्हे धैर्य रखने को कहता रहा, उसे जो पिछले छह सालों से सिर्फ और सिर्फ इंतज़ार कर रही थी, काम मिलने का इंतज़ार."

(अभिनेत्रियां जो जल्द ही कह गईं अलविदा)

ग्लैमर और ख़ासतौर पर बॉलीवुड की दुनिया के लिए कहा जाता है कि छह क्या कई सालों के इंतज़ार के बाद भी काम मिलना आसान नहीं होता.

लेकिन क्या बॉलीवुड वाकई में इतना 'क्रूर' है कि महज़ पच्चीस साल की उम्र में हार मान ली जाए और ग्लैमर की दुनिया में असफलताका डर केवल अभिनेत्रियों को ही खाए जाता है?

15 सेंकड का रोल

Image caption नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने बेहद ही छोटे रोल से अपने करियर की शुरुआत की थी

आज के दौर के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में से एक नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी चालीस साल के होने वाले हैं और उन्हें अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने में दस साल से भी ज़्यादा लग गए.

आमिर खान की फिल्म 'सरफरोश' में नवाज़ ने हवालात में बंद एक अपराधी का रोल निभाया था जो तीस सेंकड से भी कम का था.

'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में सुनील दत्त की जेब काटने वाले शख़्स का रोल नवाज़ ने निभाया था जो तीस सेंकड से थोड़ा सा बड़ा था, दो मिनट का था.

(जिया का करियर)

15 सेंकड से 3 घंटे के रोल तक आने में नवाज़ को काफी साल लग गए लेकिन इतना धैर्य रखना क्या सबके बस की बात है ?

फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा कहते हैं, "नौजवान लोग जब यहां आते हैं तो तैयार नहीं होते रिजेक्शन के लिए. उनको सपनों की दुनिया दिखती है जहां बहुत पैसा है, ख़्वाब बहुत होते हैं और उसे संभालना बड़ा मुश्किल होता हैं. कई बार अकेलापन होता है एक अलग शहर का और अगर सही राय ना मिलें तो ये सब मुश्किलें तो आती हैं."

Image caption जूही चावला बहुत जल्द गुलाब गैंग में मुख्य रोल में नज़र आएंगी

सुधीर के मुताबिक, "बॉलीवुड में क्या, ग्लैमर की पूरी दुनिया में लोगों को कोई समझाने वाला नहीं होता कि अपने दोस्तों के इर्द-गिर्द रहिए, अपना बैकअप प्लान बनाकर चलिए, अपने हुनर पर ध्यान लगाओ, परेशान मत हो, ऐसे में आप भावनात्मक तरीके से संभले ना हो तो बात बिगड़ती है."

अपने-अपने संघर्ष

इंडस्ट्री में अपने शुरुआती दिनों के बारे में अभिनेत्री जूही चावला कहती हैं, "मैं अपने संघर्षों की बात सबके सामने नहीं लाती हूं. मैं कुछ ऐसे दर्दनाक हादसों से गुज़री हूं कि शायद मैं हिम्मत हार जाती लेकिन ख़ैर मैं इस बारे में बात ही नहीं करना चाहती."

वहीं 'रॉक ऑन' और 'फिराक़' जैसी फिल्मों में अपने सहज अभिनय के लिए पहचानी जाने वाली अभिनेत्री शहाना गोस्वामी के मुताबिक सिर्फ फिल्मों को क्यों दोष दिया जाए, ऐसी दिक्कतें तो हर क्षेत्र में है.

शहाना कहती हैं, "देखिए ये एक क्रिएटिव काम है, कुछ कॉरपोरेट जैसा तो है नहीं कि एक सीढ़ी के बाद दूसरी सीढ़ी चढ़नी होगा. यहां तो आप अपनी पसंद से आते हैं और सब कुछ आपके निर्णय पर निर्भर करता है. आपको सोचना है कि इस मोड़ पर मुझे इस किस्म का काम मिल रहा है, ये मुझे करना है या नहीं."

Image caption शहाना ने रॉक ऑन में अभिनय के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता है

लेकिन अगर बात इतनी ही आसान है तो क्यों पैंतालीस पार कर चुके सलमान और शाहरुख़ अभी भी बॉक्स ऑफिस पर राज कर रहे हैं.

वहीं उनके बाद आई ऐश्वर्याऔर रानी मुखर्जी अपने करियर के ढलान पर है?

अभिनय नहीं खूबसूरती

कहते हैं कि जब हीरोइन तीस पार कर लेती है तो उसके अभिनय से ज़्यादा उसकी झुर्रियों की चर्चा ज़्यादा की जाती है.

सुधीर कहते हैं, "लड़कियों को ग्लैमर के रुप में ज़्यादा देखा जाता है. जब एक्टर की तरफ देखते हैं तो कहते हैं कि क्या एक्टिंग करता है लेकिन लड़की की तरफ देखेंगे तो उसके अभिनय की नहीं, उसकी खूबसूरती की बात ज़्यादा करते हैं. ये तो होता है, जैसा समाज है, वैसी ही इंडस्ट्री है."

फिल्मों में खबूसूरती कितनी अहमियत रखती है इसका अंदाज़ा शबाना आज़मी की इस बात से लगा लीजिए जो उन्होंने बीबीसी को बताई थी.

Image caption सुधीर के मुताबिक बॉलीवुड में शुक्रवार को सब तय होता है.

शबाना ने बताया ''मेरे दांत थोड़े उभरे हुए हैं, तो जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की उस वक़्त जो फ़िल्मी पत्रिकाएं आती थी उनमें मेरे दांतों का बड़ा मज़ाक उड़ाया जाता था. मैं अपने दांतों को लेकर, अपनी हंसी को लेकर बहुत ही झिझकने लगी थी.''

(शबाना ने कैसे सीखा मुस्कुराना)

शहाना के मुताबिक "अब वक्त बदल रहा है, पहले जैसा हाल नहीं है. हां, ये हो सकता है कि उम्र के बाद काम अलग किस्म का मिलने लगे लेकिन देखिए ना गुलाब गैंग जैसी फिल्म भी बन रही है जहां अपने वक्त की दो बड़ी हीरोइन जूही और माधूरी काम कर रही हैं. हमारे पास चित्रांगदा और पूर्णा जगन्नाथ भी है जो कि एक मां है."

असल ज़िंदगी हो या फिल्में, हीरो हो या हीरोईन, दो मिनट के रोल का संघर्ष हो या फिर शीर्ष का सितारा बने रहने की जद्दोजहद, शिखर पर वही पहुंचा है जो मुश्किलों से उसी तरह निपटता है जिस तरह फिल्म का हीरो गुंडों को पीटता है.

सुधीर मिश्रा की माने तो अगर बॉलीवुड एक क्रूर इंडस्ट्री है तो यही वो जगह है जहां लोगों को जल्दी माफ भी कर दिया जाता है. यहां शुक्रवार को सब तय होता है. जो यहां गिरते हैं वो संभलते भी हैं.

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