फ़िल्म उद्योग में मंदी का ख़तरा: स्पीलबर्ग

  • 16 जून 2013
स्पीलबर्ग
Image caption स्पीलबर्ग हॉलीवुड के सबसे सफल निर्देशकों में से एक हैं.

हॉलीवुड के जाने माने निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग और जॉर्ज लुकास ने आशंका जताई है कि फ़िल्म उद्योग पर मंदी के बादल मंडराने का ख़तरा है.

उनका कहना है कि हॉलीवुड अब ज़्यादातर बड़े बजट वाली फ़िल्मों पर निर्भर करने लगा है जिसके कारण आने वाले दिनों में छोटे बजट की फ़िल्मों को थियेटर तक पहुंचाने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना होगा.

एक कार्यक्रम में स्पीलबर्ग ने कहा कि फ़िल्म 'लिंकन' को टीवी नेटवर्क एचबीओ के लिए बनाया गया था क्योंकि सिनेमाघरों में इसे रिलीज़ करने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था.

स्पीलबर्ग का कहना था, ''थियेटर में फ़िल्में रिलीज़ करने का रास्ता दिन ब दिन तंग होता जा रहा है.''

'बदलाव की जरूरत'

जॉर्ज लुकास ने कहा कि वो सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों के टिकट का दाम निर्धारित करने वाले एक मॉडल के बारे में विचार कर रहे हैं जहां कम फ़िल्में रिलीज़ की गई और वो लगभग एक साल तक सिनेमाघरों में लगीं रहीं और फिर फ़िल्म के आधार पर उनके टिकट के दाम बढ़ाए गए.

ब्रिटेन में हॉलीवुड फ़िल्म वितरण संगठन 'फ़िल्म डिस्ट्रिब्यूटर्स एसोसिएशन' के अध्यक्ष लॉर्ड डेविड पुटनैम ने न्यूज़बीट से एक इंटरव्यू में कहा कि इसमें बदलाव की ज़रूरत है.

उनका कहना था, ''हर फ़िल्म की मार्केटिंग की अपनी चुनौती है और ये सोचना कि एक ही नियम सब पर लागू है, सच्चाई से बिल्कुल परे है.''

लॉर्ड पुटनैम का कहना है, ''फ़िल्म उद्योग को फ़िल्म और उसके दर्शकों के बीच बनावटी बाधा नहीं खड़ी करनी चाहिए. फ़िलहाल जो तरीक़े अपनाए जा रहे हैं वे लंबे समय तक चलने वाले नहीं हैं.''

फ़िल्म की आमदनी

लॉर्ड पुटनैम के अनुसार फ़िल्म उद्योग को ऐसे नियम नहीं बनाने चाहिए जिससे किसी फ़िल्म को नुक़सान हो.

Image caption जॉर्ज लुकास भी हॉलीवुड के बड़े निर्दशकों में से एक हैं.

उनका कहना है कि हर फ़िल्म का आकलन उसकी योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए.

लॉर्ड पुटमैन आगे कहते हैं, ''असल बिंदु ये है कि किसी फ़िल्म की आमदनी कैसे बढ़ाई जाए. किसी दूसरी फ़िल्म को इसलिए नुक़सान सहना चाहिए क्योंकि कोई और दूसरी फ़िल्म अच्छा कर रही है, इस तरह की सोच का कोई औचित्य नहीं है.''

लॉर्ड पुटनैम के अनुसार उनका काम ग्राहकों को ख़ुश रखना है और इसके लिए सबसे अहम बात ये है कि फ़िल्म के दर्शकों को ये अधिकार होना चाहिए कि वो जो फ़िल्म जहां देखना चाहें, वहां देख सकें.

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