'फुकरे'- पैसा वसूल या फिर एकदम फिज़ूल

फुकरे
Image caption फुकरे का निर्देशन किया है मृगदीप सिंह लंबा ने.

'फुकरे' कहानी है चार जवान लड़कों की जो जल्दी से जल्दी पैसा कमाना चाहते हैं. हनी (पुलकित सम्राट) और चूचा (वरुण शर्मा) बारहवीं क्लास में पड़ते हैं और चाहते हैं कि स्कूल पास करने के बाद वो किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला लें.

किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला लेने के पीछे उनका मकसद पढ़ाई करना नहीं बल्कि लड़कियों के साथ इश्क फरमाना है. दोनों पढ़ाई में बहुत ही बुरे हैं.

दोनों दोस्तों में से एक दोस्त, चूचा, अजीबो-गरीब सपने देखता है और दूसरा दोस्त, हनी, इन सपनों में से एक लकी नंबर ढूढ़ निकालता है. फिर ये दोनों मिलकर इस नंबर की एक लॉटरी खरीदते हैं और सौभाग्यवश ये लॉटरी हमेशा ही लग जाती है.

छोटी लॉटरियां जीतते जीतते अब ये दोनों चाहते हैं कि एक बड़ी रकम जीतें. इस रकम से ये बारहवीं कक्षा का पेपर खरीदना चाहते हैं ताकि इनके नंबर अच्छे आएं और ये अच्छे कॉलेज में जाने का अपना सपना पूरा कर सकें.

Image caption फिल्म में राम संपत का संगीत सराहनीय है.

जल्द ही हनी और चूचा लाली (मनजोत सिंह) और ज़फर (अली फज़ल) से दोस्ती कर लेते हैं. लाली और जफ़र को भी पैसों की ज़रूरत है. ज़फर को अपने बीमार पिता के इलाज के लिए पैसा चाहिए. लाली को पैसा चाहिए ताकि वो उसी कॉलेज में जा सके जिसमें उसकी पूर्व प्रेमिका पढ़ती है.

हनी, चूचा, ज़फर और लाली पंडित जी से मिलते हैं. पंडित जी (पंकज त्रिपाठी) उस कॉलेज में गार्ड हैं जहां लाली की पूर्व प्रेमिका पढ़ती है.

पंडित जी इन चारों लड़कों की मुलाक़ात भोली पंजाबन (ऋचा चढ्ढा) से करवाते हैं. भोली पंजाबन एक खतरनाक औरत है जो एक वैश्यालय चलाती है. भोली पंजाबन इन चार लड़कों के प्लान में अपना पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाती है. चारों लड़के लॉटरी में पैसा लगा तो देते हैं लेकिन मुसीबत तब खड़ी होती है जब जीतने कि बजाए ये लॉटरी हार जाते हैं.

कहानी में आगे क्या होता है. क्या भोली पंजाबन इन चारों को छोड़ देती है. क्या हनी, चूचा, ज़फर और लाली के सपने पूरे होते हैं. यही है फिल्म 'फुकरे' की कहानी.

विपुल विग की कहानी थोड़ी अजीबो-गरीब है पर मनोरंजन से भरपूर है. विपुल और निर्देशक मृगदीप सिंह लंबा का स्क्रीनप्ले बहुत ही मज़ेदार और मज़ाकिया है. ये कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म में जो कॉमेडी है वो इतनी असरदार है कि फिल्म शुरू होने से लेकर ख़त्म होने तक दर्शकों को हंसाती रहती है. विपुल ने फिल्म के डायलॉग भी बहुत अच्छे लिखे हैं. हो सकता है कि एक वर्ग को ये फिल्म थोड़ी भड़काऊ लगे लेकिन युवा इसे ज़रूर पसंद करेंगे.

साथ ही मैं ये भी कहना चाहूंगा कि इस कॉमेडी का असर इतना नहीं होता अगर फिल्म के कलाकारों का काम अच्छा न होता. फिल्म में चाहे पुलकित हों, वरुण, मनजोत सिंह या फिर अली फज़ल सभी का काम काबिले तारीफ है. भोली पंजाबन के रोल में तो ऋचा चढ्ढा ने कमाल ही कर दिया है.

मृगदीप लंबा का निर्देशन भी सराहनीय है. उन्होंने एक बेहद मनोरंजक फिल्म बनाई है और अपने कलाकारों से बेहतरीन काम करवाया है. मृगदीप की तारीफ इसलिए भी करनी होगी क्योंकि वो कभी भी फिल्म की गति को धीमा नहीं होने देते. बस अगर फिल्म में कोई कमी है तो वो ये कि फिल्म में जो ड्रामा है वो एक ही दिशा में चला जाता है.

Image caption फिल्म के निर्माता हैं फरहान अख़्तर और रितेश सिधवानी.

फिल्म के संगीत की अगर बात करें तो राम संपत का काम अच्छा है. 'अंबर्सरिया', 'रब्बा', 'कर ले जुगाड़', 'बेड़ा पार' और 'फुकरे' अच्छे गीत हैं. इन गीतों में मुन्ना धीमन, विपुल विग और म्रिग्दीप के बोल बहुत अच्छे हैं. फिल्म में फिरोज़ खान, बोस्को-सीज़र और राजीव सुरती की कोरियोग्राफी औसत है. राम संपत का बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत अच्छा है. केयू मोहन की सिनेमेटोग्राफी भी बहुत अच्छी है. परवेज़-फिरोज़ का एक्शन ठीक हैं. मुकुंद गुप्ता के सेट अच्छे हैं. आनंद सुबया की एडिटिंग बहुत सटीक है.

'फुकरे' एक बहुत ही मनोरंजक फिल्म है जो खासतौर पर युवाओं को पसंद आएगी. फिल्म ने अपनी शुरुआत भले ही धीमे की हो लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि जैसे जैसे लोग इस फिल्म की तारीफ करेंगे वैसे वैसे इस फिल्म का कारोबार बढ़ेगा.

ये फिल्म महानगरों और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में अच्छा करेगी. मैं यहां ये भी कहना चाहूंगा कि फिल्म के निर्माताओं ने फिल्म में 20 करोड़ रूपए से ज़्यादा का निवेश किया है. वो भी तब जब फिल्म में कोई जाना माना या बड़ा नाम नहीं है. फिल्म को ठंडी शुरुआत मिलने की एक वजह ये भी है कि बहुत सारे लोगों को फिल्म के शीर्षक ‘फुकरे’ का मतलब ही पता नहीं है.

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