फ़िल्मों ने मुझे असंवेदनशील बना दिया: शाहरुख़

शाहरुख़ ख़ान

करीब बीस साल पहले अपनी पहली फ़िल्म 'दीवाना' से बॉलीवुड में दस्तक देने वाले शाहरुख़ ख़ान अब अपनी नई फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' के साथ एक बार फिर बॉक्स ऑफिस पर अपना भाग्य आज़माएंगे.

बीबीसी संवाददाता सायमा इक़बाल से बातचीत में शाहरुख़ ख़ान ने अपने सुपरसितारा हैसियत और अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में बात की.

पढ़िए शाहरुख़ के दिल की बात उन्हीं के शब्दों में :

Image caption शाहरुख़ मानते हैं कि क्रिकेट टीम के मालिक और निर्माता होने के बावजूद अभिनय ही उनका पहला प्यार है.

मेरी ज़िंदगी फ़िल्मों में पूरी तरह रच बस गई है. मैं ऐसे तो कई काम करता हूं निर्माता हूं, मेरी वीएफएक्स की कंपनी है, क्रिकेट की टीम है लेकिन मुझे सिर्फ फ़िल्मों में काम करना आता है. फ़िल्म बनने की पूरी प्रक्रिया मुझे बहुत रोमांचित करती है.

हालांकि ये भी होता है कि 22 साल से इस तरह की ज़िंदगी जीने के बाद आप थोड़े से अंसवेदनशील हो जाते हैं.

हर सुबह जब आप उठते हैं और किसी और का रोल निभा रहे होते हैं, कोई आपसे कहे कि हंसो तो हंसो, डांस करने का मन नहीं है तो तब भी करो.

ऐसे में आप ज़िंदगी की असलियत से थोड़ा दूर हो जाते हैं.

सुनिए शाहरुख़ ख़ान से बातचीत

सितारा होना एक वरदान

एक सितारे के लिए ये एक वरदान है कि आपको लोग पहचानते हैं लेकिन ये एक श्राप भी है कि आपको भीतर से कोई नहीं जान पाता.

मैं ज़्यादा तनाव नहीं लेता. मेरी नानी कहती थी सोने की थाली में खाना ज़्यादा स्वाद नहीं लगता इसलिए मेरी कोई ख़ास इच्छाएं नहीं है.

हां अब जो कुछ भी करता हूं पैसों के लिए नहीं सफलता पाने कि लिए करता हूं और जब वो नहीं मिलती तो दुख भी होता है.

हालांकि ये बात सही है कि ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते ही है और शायद लोग कहें कि मैं सफलता की सीढ़ी पार कर चुका हूं इसलिए ऐसी बातें बोल रहा हूं.

मेरे मां बाप दोनों का देहांत हो गया था और मैं सब छोड़ छाड़ कर आ गया था. कई बार दिल किया था कि यार ये कैसी जिंदगी है लेकिन फिर एक जुनून ढूंढ लिया.

जिनके मां बाप है उन्हें तो और भी ऐसा सोचना चाहिए क्योंकि कम से कम उनके पास अपने परिवार के प्यार का सहारा है, भले ही पैसे का ना हो. इसलिए ज़िंदगी से ज़्यादा प्यार करो.

देखिए चेन्नई एक्सप्रेस की तस्वीरें

बच्चों के लिए ख़ास हूं

मेरे बच्चे मेरा आदर करते हैं एक पिता की हैसियत से. वो मेरे काम के बारे में कोई बात नहीं करते. वो मेरी फ़िल्में देख लेते हैं कभी-कभी.

मेरी बेटी को मेरी वो फ़िल्में पसंद नहीं आती थी जिसमें मैं मर जाता था लेकिन अब वो बातें समझने लगे हैं. मैं उनके लिए ख़ास हूं इसलिए नहीं की मैं एक्टर हूं बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उनका पिता हूं.

मेरे ज़्यादा दोस्त नहीं है. ऐसा नहीं है कि ये एक बुरी जगह है लेकिन वक्त कहां है. ये एक अलग जगह है जिसके कुछ फ़ायदे है और कुछ नुकसान.

Image caption शाहरुख की नई फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस है जिसमें उनके साथ दीपिका पादुकोण है.

जैसे मैं चौपाटी पर खड़े होकर चाट नहीं खा सकता लेकिन फिर ये कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए मुझे दुखी होना चाहिए. ये तो अच्छी बात है कि मैं चौपाटी पर चाट नहीं खा सकता.

फीस नहीं मांगता

मैं अपनी फ़िल्म के लिए पैसे नहीं मांगता हूं. साल में डेढ़-दो फ़िल्म ही तो करता हूं. पिछले 15-20 फ़िल्मों से मैं साइनिंग के पैसे ही नहीं लेता हूं.

वैसे तो सभी मेरे दोस्त हैं इसलिए निर्माता-निर्देशक जो दिल से आकर दे देता है, वही मैं रख लेता हूं.

मैने आज तक अपनी फ़िल्म के लिए फीस नहीं मांगी.

जहां तक मेरे द्वारा निर्मित फ़िल्मों का सवाल है तो वहां तो बात ही अलग हो जाती है. जैसे रा.वन के लिए मुझे अभी तक फीस नहीं मिली क्योंकि फ़िल्म ने मुनाफा ही नहीं कमाया है.

जहां तक किरदार को रचने की बात है तो मैं अपने अनुभव औऱ किताबों के ज़रिए अपने रोल पर काम करता हूं.

'चेन्नई एक्सप्रेस' के लिए मैंने ज़्यादा रिसर्च नहीं की लेकिन 'माय नेम इज़ ख़ान' के लिए मैंने काफी शोध किया था. कई ऑटिस्टिक बच्चों से भी मिला था.

'चक दे' के लिए मैंने अपने कुछ टीचर्स को ध्यान में रखा था और थोड़ा बहुत तो काम शायद मुझे आता ही होगा, इतने साल से इंडस्ट्री में जो हूं.

ओछी है सौ करोड़ की बात

Image caption शाहरुख़ मानते हैं कि फिल्मों को सौ करोड़ से तोलना अच्छी बात नहीं है

मुझे पता है कि ये सौ करोड़ की शुरुआत किसने की है. वो मेरे दोस्त हैं और मैंने एक रात उन्हें बहुत डांटा भी.

इस सौ करोड़ ने सफलता को इतना ओछा कर दिया है कि अच्छी फ़िल्म की तुलना भी पैसे के मापदंड पर होती है.

क्या फायदा है कि आपने बहुत खूबसूरत फ़िल्म बनाई और लोग कहते हैं कि क्या यार बस ढाई करोड़ ही बनाए और बहुत घटिया बनाकर उसने दो सौ करोड़ कमाए हैं.

मैं तो कहता हूं कि अगर नंबर गेम में ही आना है तो फिर सौ क्यों दो सौ करोड़ या हज़ार करोड़ क्यों नहीं. बाप ने सिखाया था कि अगर चांद के लिए छलांग मारोगे तो तारों तक तो पहुंच ही जाओगे.

सौ करोड़ तो हर फ़िल्म कर रही है, मेरी पिछली तीन फ़िल्मों ने सौ करोड़ कमा लिए थे इसलिए अगर सोचना ही है तो कुछ रुहानी ही हो जाए. क्यों ना मेरी फ़िल्म कुछ डेढ़ लाख करोड़ कमा ले, सोच क्यों छोटी की जाए.

बीबीसी संवाददाता सायमा इक़बाल से बातचीत पर आधारित .

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