फ़िल्म रिव्यू: भाग मिल्खा भाग

भाग मिल्खा भाग
Image caption मिल्खा सिंह कहते हैं कि वो ये फ़िल्म देख कर रो पड़े

धावक मिल्खा सिंह के जीवन को पर्दे पर जीवंत किया गया है हिंदी फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' में.

मिल्खा सिंह (फ़रहान अख़्तर) का बचपन दर्द और वेदना से भरा रहा. साल 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता की हत्या हो जाती है. मिल्खा अपनी शादी-शुदा बहन (दिव्या दत्ता) के साथ रहने लगते हैं. लेकिन छोटे से मिल्खा से ये नहीं देखा जाता कि कैसे उसकी बहन का पति उसे प्रताड़ित करता है. एक दिन ऐसा आता है जब मिल्खा को उसका जीजा घर से बाहर निकाल देता है.

मिल्खा बड़े होने के बाद भारतीय सेना में भर्ती हो जाते है. जल्द ही वो फ़ौज में एक धावक के रूप में मशहूर भी हो जाते है. फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे अपने लक्ष्य को पाने के लिए मिल्खा रात दिन एक कर देता है.

तस्वीरों में भाग मिल्खा भाग

फ़िल्म की कहानी मिल्खा के भूत और वर्तमान के बीच झूलती रहती है. 'भाग मिल्खा भाग' मिल्खा सिंह के फ्लाइंग सिख बनने तक की कहानी है. कहानी में मिल्खा सिंह अगर एक ओर छोटे से बच्चे हैं तो वहीं दूसरी ओर वो इश्क फरमाते हुए एक नौजवान हैं. तो वहीं वो नए कीर्तिमान बनाते हुए फ्लाइंग सिख भी हैं.

फ़िल्म की कहानी के लिए लेखक प्रसून जोशी ने बहुत अच्छा शोध किया है. फ़िल्म तीन घंटे में मिल्खा सिंह के पूरे जीवन को बख़ूबी बड़े पर्दे पर उकेरती है. फ़िल्म की कहानी लिखने के साथ-साथ पटकथा भी प्रसून ने ही लिखी है. फ़िल्म में दर्द, ड्रामा, हास्य, ख़ुशी, गम, हार, जीत और प्यार सभी तरह के भाव हैं. लेकिन फ़िल्म में कई बार दर्शकों को ये महसूस हो सकता है कि मिल्खा का दर्द ज़रूरत से ज़्यादा दिखाया जा रहा है.

Image caption फ़िल्म में दिव्या दत्ता और छोटे मिल्खा के बीच कुछ भावनात्मक दृश्य हैं.

निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा चाहते तो इस ड्रामा को थोड़ा कम कर सकते थे. एक समय के बाद फ़िल्म की कहानी खिचती हुई सी लगती है. लेकिन फिर भी मुझे पूरा यकीन है कि एक खास तरह के दर्शकों को ये फ़िल्म बहुत पसंद आएगी.

फ़िल्म में कई अच्छी बातें हैं. भले ही मिल्खा के बचपन के दृश्य हों या फिर आर्मी सेंटर के दृश्य, इन दृश्यों में हास्य का अच्छा पुट है. फ़िल्म में कुछ बेहद संवेदनशील दृश्य भी हैं जो दर्शकों की आंखों को नम कर देते हैं. मेरे हिसाब से तो फ़िल्म का अंत भी ज़बरदस्त है.

ये कहना पड़ेगा कि फ़िल्म का पहले हिस्से में कई मनोरंजक तत्व हैं. खासतौर पर मिल्खा के बचपन के हिस्से बहुत अच्छे हैं. लेकिन ये भी सच है कि पहले हिस्से में कई जगह फ़िल्म खीची गई है. हालांकि इंटरवल के बाद फ़िल्म तेज़ी पकड़ती है. प्रसून जोशी ने फ़िल्म के संवाद बखूबी लिखे हैं.

सुनिए फ़रहान अख़्तर को

जहां तक बात है अभिनेता फ़रहान अख़्तर कि तो उन्होंने मिल्खा सिंह के किरदार को बहुत ही अच्छी तरह से अदा किया है. फरहान ने इस किरदार के लिए जितनी मेहनत की है वो साफ़ नज़र आ रही है. सोनम कपूर का फ़िल्म में छोटा-सा रोल है लेकिन उन्होंने अच्छा काम किया है. मिल्खा के गुरु के रोल में पवन मल्होत्रा हों या फिर नेशनल कोच के रोल में योगराज सिंह सभी ने अपने अपने किरदारों में जान डाली है.

Image caption फ़िल्म में मिल्खा के कोच बने हैं अभिनेता पवन मलहोत्रा.

जहां तक राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन की बात करें तो उनका काम बेहतरीन है. मैं ये ज़रूर मानता हूं कि राकेश ने फ़िल्म के कुछ दृश्य बहुत ही लम्बे शूट किए हैं लेकिन इसके बावजूद भी वो मनोरंजक हैं. फ़िल्म का संगीत (शंकर-एहसान-लॉय) भी बहुत अच्छा है. फ़िल्म के मूड के लिए एक दम सटीक.

फ़िल्म के गीतों में प्रसून जोशी के शब्दों ने जान डाली है. बिनोद प्रधान की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. फ़िल्म में एलन अमीन ने एक्शन दृश्यों को बढ़िया तरीके से फ़िल्माया है. पीएस भारती की एडिटिंग भी अच्छी है.

फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' के सिनेमाघरों में अच्छा करने की उम्मीद है. मगर हो सकता है की फ़िल्म की लम्बाई इसके बिज़नस पर असर डाले. बड़े शहरों और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में फ़िल्म के अच्छा बिज़नस करने की उम्मीद है.

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