प्राण: वो सुपरविलेन जिसकी फ़ीस हीरो से भी ज़्यादा थी

"मेरे प्रिय दोस्त प्राण को मुझसे फ़ोन पर बात करना पसंद था. हम जब मिलते थे तो पंजाबी चुटकुलों पर ख़ूब हँसा करते थे. मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे ख़राब मौसम के बावजूद शादी में शिरकत करने के लिए श्रीनगर से बंबई पहुँचे थे. उन्होंने श्रीनगर से दिल्ली और फिर बंबई की फ्लाइट ली ताकि मेरे निकाह से पहले मुझे गले लगा सकें."

अपने दोस्त और सह अभिनेता प्राण के लिए ये शब्द दिलीप कुमार ने उनकी मौत के बाद ट्विटर पर लिखे हैं. ये वही प्राण हैं जिनकी फ़िल्मी पर्दे पर दिलीप कुमार ने कई बार पिटाई की होगी. लेकिन दिलीप कुमार के ये स्नेह भरे शब्द दर्शाते हैं कि क्यों प्राण साहब फ़िल्मी दुनिया के इतने दुलारे थे.

प्राण का अंतिम संस्कार

प्राण साहब ने 40 के दशक के अशोक कुमार से लेकर 90 के दशक के सलमान ख़ान तक की ज़िंदगी फ़िल्मी पर्दे पर दुश्वार की है यानी इन हीरो के साथ विलेन का रोल किया है.

कहने को तो प्राण हिंदी फ़िल्मों के खलनायक थेपर कहते हैं कि कई फ़िल्मों में प्राण साहब की फ़ीस हीरो जितनी और कई बार हीरो से भी ज़्यादा होती थी. फ़िल्में जितनी हीरो के नाम पर बिकती थीं, उतनी ही प्राण के नाम पर वितरकों में बिक जाया करती थी.

पान की दुकान से फ़िल्मी स्टूडियो

प्राण फ़िल्मों में आने को इत्तेफाक़ कहते थे. हुआ दरअसल यूँ कि वो लाहौर के अनारकली बाज़ार में पान खाते हुए पानवाले से बड़े ही मज़ेदार लहजे में बात कर रहे थे जो वहाँ बैठे फ़िल्म यूनिट के सदस्य को भा गया. बस वहीं से फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ जो भारत में जारी रहा और ज़बरदस्त हिट रहा.

वैसे कहने को तो प्राण मुख्यतः खलनायक का रोल निभाते थे लेकिन उनकी शख्सियत, ड्रेसिंग स्टाइल, संवाद अदायगी, सिगरेट पकड़ने का जुदा अंदाज़ ऐसा था कि वो बड़े-बड़े हीरो को टक्कर दे देते थे- फिर वो देवानंद हो, राजकपूर या फिर दिलीप कुमार. अपने समय की इस मशहूर त्रिमूर्ति के साथ प्राण ने मधुमति, राम और श्याम जैसी कई हिट फ़िल्में कीं. ये तीनों भले ही अपने ज़माने के सुपर सितारे थे लेकिन प्राण साहब को ये सब बहुत मानते थे.

बतौर चरित्र अभिनेता मशहूर होने के बहुत साल पहले ही राज कपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'आह' में पैरेलल लीड रोल दिया था.

एक पुराना क़िस्सा याद करते हुए वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने बताया, "एक दिन अचानक प्राण साहब ने मुझे बुलाया और पूछा कि क्या तुम राज कपूर के तीनों बेटों- ऋषि, रणधीर और राजीव को मेरे घर लेकर आ सकते हो क्योंकि मैं उनके साथ एक शाम बिताना चाहता हूँ. मैने ऐसा ही किया. बाद में प्राणजी ने मुझे बताया कि दरअसल फ़िल्म बॉबी की शूटिंग के दौरान उनका राज कपूर से कुछ झगड़ा हो गया था जिसके लिए उन्हें मलाल था. उसी की भरपाई के लिए प्राणजी ने राज कपूर के बच्चों को बुलाया और उनके साथ समय बिताया. ये भी उनकी शख्सियत का एक पहलू था."

कपिल देव की मदद

खलनायकी और चरित्र भूमिकाओं के साथ-साथ प्राण ने कॉमेडी में भी हाथ आज़माया. 'विक्टोरिया नंबर 203' जैसी फिल्में इसकी मिसाल हैं. इसमें प्राण और अशोक कुमार ने बेहतरीन जुगलबंदी करते हुए लोगों को ख़ूब हँसाया था.

प्राण फ़िल्मों के बाहर ऊर्दू शायरी, खाने-पीने और खेल के शौक़ीन थे. कपिल देव को उनकी मदद का क़िस्सा भी शायद कम लोग जानते हैं.

जयप्रकाश चौकसे ने प्राण के एक और अनछूए पहलू के बारे में बताया. वे बताते हैं, "प्राण साहब खेलों के बेहद शौक़ीन थे. एक बार उन्हें पता चला कि भारतीय क्रिकेटर कपिल देव को चोट लगी है और इलाज के लिए उन्हें विदेश जाना पड़ेगा. तब कपिल नए नए थे. क्रिकेट बोर्ड का रुतबा अब जैसा नहीं था. तब प्राण साहब आगे आए और कहा कि अगर बोर्ड के पास पैसे नहीं है तो वे कपिल देव का इलाज कराएँगे."

फ़िल्म इंडस्ट्री के जूनियर कलाकारों की मदद करने के लिए भी वे जाने जाते हैं. अदाकारी को काम न समझकर उसे कहीं आगे तक ले जाना उनकी ख़ासियत मानी जाती थी. कहते हैं कि वो कभी किसी सेट पर देर से नहीं पहुँचे- हमेशा शूटिंग शुरू होने से आधा घंटा पहले तैयार होकर बैठे रहते थे. शायद यही बातें थीं जो उन्हें सबसे से जुदा बनाती थी.

अफ़सोस

क़रीब तीन-चार साल पहले लंदन की एक शाम थी जब उनके बेटे से बात हुई और तय हुआ कि प्राण साहब से फ़ोन पर इंटरव्यू किया जाएगा. मैं इसे लेकर काफ़ी उत्साहित थी. काफ़ी तैयारी की- कई सारे सवाल लिखकर रखे, आख़िर प्राण जी का इंटरव्यू करना था.

लेकिन ऐन मौक़े पर मुझे अचानक भारत आना पड़ा और इंटरव्यू नहीं हो पाया जिसका अफ़सोस मुझे आज तक है.

प्राण साहब के लिए तैयार किए गए सवाल आज भी संभाल कर रखें हैं...सवालों के नीचे जवाब की जगह अब हमेशा ख़ाली ही रहेगी.

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