क्या दर्शकों को बांध पाएगी 'ज़ंजीर' ?

  • 6 सितंबर 2013
ज़ंजीर

रेटिंग: *1/2

रिलायंस इंटरटेनमेंट, प्रकाश मेहरा प्रोडक्शंस, फ़्लाइंग टर्टल फ़िल्म्स और रैंपेज मोशन पिक्चर्स की 'ज़ंजीर' 1973 की अमिताभ बच्चन अभिनीत 'ज़ंजीर' का स्क्रीन अडैप्टेशन है.

विजय खन्ना (राम चरन तेजा)एक ईमानदार और सिद्धांतवादी पुलिस अफ़सर है. लेकिन कई बार अपनी ईमानदारी की वजह से वो भ्रष्ट तंत्र में मुश्किल में पड़ जाते हैं.

उनका कई बार तबादला कर दिया जाता है. और एक बार ट्रांस्फ़र करके उन्हें मुंबई भेज दिया जाता है जहां एक हत्या की तफ़्तीश में लगाया जाता है.

इस हत्याकांड की चश्मदीद गवाह माला (प्रियंका चोपड़ा) हैं. उनकी आंखों के सामने एक शख़्स को ज़िंदा जला दिया जाता है.

जांच के दौरान उनकी मुलाक़ात एक ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से काम कर रहे कार डीलर शेर ख़ान (संजय दत्त) और बिज़नेस मैन की आड़ में रह रहे अपराधी रुद्र प्रताप तेजा (प्रकाश राज) से होती है.

इस बीच विजय, माला को पुलिस की मदद करने के लिए तैयार कर लेते हैं और दोनों एक दूसरे के बेहद क़रीब भी आ जाते हैं.

हत्या की जांच से धीरे-धीरे विजय को पता चलता है कि जिस शख़्स की हत्या हुई वो ग़ैर-क़ानूनी तेल माफ़िया का राज़ फ़ाश करना चाहता था और इस वजह से उसकी हत्या कर दी जाती है.

इस सारे कांड के पीछे है रुद्र प्रताप तेजा. विजय खन्ना के साथ भी बचपन में कुछ ऐसा ही होता है. जब वो आठ साल का होता है तब उसके मां-बाप की हत्या कर दी जाती है.

विजय कई सालों बाद तक इस हत्याकांड की ख़ौफ़नाक यादों से उबर नहीं पाता.

इस बीच विजय खन्ना की बहादुरी और ईमानदारी से प्रभावित होकर शेर ख़ान अपने बुरे धंधे छोड़ देता है और उनकी मदद करने का फ़ैसला करता है.

क्या शेर ख़ान और विजय मिलकर रुद्र प्रताप तेजा के काले साम्राज्य का अंत कर पाते हैं. यही फ़िल्म की कहानी है.

कहानी

अपूर्व लाखिया और सुरेश नायर ने 1973 की 'ज़ंजीर' के स्क्रीनप्ले को नए अंदाज़ में पिरोने की कोशिश की है. लेकिन नई 'ज़ंजीर' पुरानी 'ज़ंजीर' के आस-पास भी नहीं है.

कहानी में कुछ नयापन और मौलिकता है ही नहीं. जैसे-जैसे फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है और जो दर्शक देखते हैं वो सैकड़ों बार पहले भी देखे जा चुके हैं.

कई बातों को फ़िल्म में स्पष्ट करने की ज़हमत ही नहीं उठाई गई है. शेर ख़ान (संजय दत्त) एक क़व्वाली में विजय खन्ना (रामचरन तेजा) के लिए अपनी दोस्ती की क़समें खाता है (पुरानी ज़ंजीर के यारी है ईमान मेरा गाने से प्रभावित).

लेकिन फ़िल्म में ये कहीं दिखाया नहीं गया कि भला शेर ख़ान के दिल में, विजय के प्रति दोस्ती की इतनी प्रबल भावना कैसे पैदा हो गई. इसलिए शेर ख़ान का विजय खन्ना के लिए बड़ी-बड़ी बातें करना मूर्खतापूर्ण लगता है.

कई सीन और ट्विस्ट बिलकुल 70 और 80 के दशक की फ़िल्मों जैसे हैं इसलिए एकदम बासी और नीरस लगते हैं क्योंकि आप उन्हें हज़ारों दफ़ा देख चुके हैं.

फ़िल्म के संवाद कुछ हद तक ठीक हैं.

अभिनय

राम चरन तेजा ने बॉलीवुड में एक प्रभावी शुरूआत की है. उनका शारीरिक गठन अच्छा है और वो पर्दे पर एंग्री यंग मैन के रूप में जमे हैं. वो अच्छा डांस कर लेते हैं और एक्शन दृश्यों में जमे हैं.

प्रियंका चोपड़ा भी अच्छी रही हैं और एक-दो कॉमिक सीन में उन्होंने बढ़िया अभिनय किया है. प्रकाश राज खलनायक के रूप में बेहतरीन लगे हैं लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा क्योंकि वो तेज़ी से टाइपकास्ट होने की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं.

संजय दत्त के अभिनय को देखकर लगता है कि उन्हें जल्दी से जल्दी ये फ़िल्म करनी थी और इस वजह से वो बिलकुल असरदार नहीं रहे हैं.

अपूर्व लाखिया के निर्देशन में कुछ भी नया नहीं है. स्क्रिप्ट में दर्शकों को लुभाने लायक़ कुछ भी नहीं है. हां, एक्शन दृश्य ज़रूर अच्छे हैं और शायद सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को पसंद आएं.

फ़िल्म का संगीत (मीत ब्रदर्स, अनजान, चितरंजन भट्ट और आनंद राज आनंद) साधारण है. पिंकी गाना लोगों को पसंद आ सकता है लेकिन ये ज़्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं है.

चिंटू सिंह की एडीटिंग और शार्प हो सकती थी. कुल मिलाकर 'ज़ंजीर' बेहद ठंडी फ़िल्म है. एक्शन दृश्यों को छोड़कर फ़िल्म में कुछ भी नहीं है.

बॉक्स ऑफ़िस पर इसके चलने की ज़्यादा संभावना नहीं है. हां फ़िल्म का तेलुगू संस्करण कुछ बेहतर कर सकता है क्योंकि रामचरन तेजा तेलुगू के बहुत बड़े स्टार हैं.

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