फ़िल्म रिव्यू: जॉन डे

  • 13 सितंबर 2013
जॉन डे
Image caption 'जॉन डे' एक सस्पेंस थ्रिलर है.

रेटिंग: *1/2

चैनल एफ़ एंटरटेनमेंट और अंजुम रिज़वी फ़िल्म कंपनी की 'जॉन डे' एक हिंसाप्रधान थ्रिलर है.

जॉन डे (नसीरुद्दीन शाह) एक बेहद ईमानदार और सिध्दांतवादी बैंक मैनेजर है. उनकी बेटी पर्ल (अरिका सिलायचिया) अपने ब्वॉयफ़्रेंड कनिष्क (पवल गुलाटी) के साथ घूमने जाती है तो एक दुर्घटना में उसकी मौत हो जाती है.

दो साल बाद जॉन डे के बैंक में लूट हो जाती है और बैंक लुटेरों के हमले में उनकी पत्नी मारिया (शेरनाज़ पटेल) घायल होकर कोमा में चली जाती है.

Image caption रणदीप हुडा और नसीरुद्दीन शाह ने अच्छा अभिनय किया है.

गौतम (रणदीप हुडा) एक पुलिस अफ़सर है जिसके अंडरवर्ल्ड डॉन सिकंदर हयात ख़ान (शरत सक्सेना) से बेहद नज़दीकी संबंध हैं.

वो उस डॉन की गैंग का मोहरा है. लेकिन वो अब अपनी गर्लफ्रेंड तबस्सुम हबीबी (एलेना कज़ान) के साथ इन सबसे दूर भागकर शांति की ज़िंदगी बिताना चाहता है लेकिन ऐसा कर नहीं पाता.

उधर जॉन डे को अपनी बेटी की मौत और पत्नी पर हुए हमले में कुछ अजीब सी साज़िश की बू आती है और वो इस मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है.

(फ़िल्म रिव्यू: शुद्ध देसी रोमांस)

इसी सिलसिले में उसे आगे पता चलता है कि उसकी बेटी की मौत के पीछे की वजह एक ज़मीन घोटाला है जिससे हयात ख़ान का गैंग जुड़ा है.

इस बीच परिस्थितियां कुछ ऐसी बन जाती हैं कि वो जॉन डे और गौतम को आमने-सामने ला खड़ा करती हैं. आगे क्या होता है? क्या जॉन डे अपने मक़सद में कामयाब हो पाता है? यही फ़िल्म की कहानी है.

उलझा स्क्रीनप्ले

Image caption फ़िल्म का स्क्रीनप्ले और किरदार उलझे हुए हैं.

अहीशोर सोलोमन की लिखी कहानी बेहद दिलचस्प है और इसमें काफी घुमाव है. लेकिन फ़िल्म का स्क्रीनप्ले कुछ ऐसा है जो दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेता है.

फ़िल्म में सस्पेंस बना रहे इसके लिए उन्होंने स्क्रीनप्ले को कुछ इस तरह से लिखा है कि दर्शकों को कहानी का अंदाज़ा ज़्यादा न लग पाए. लेकिन यहीं वो मात खा गए. दर्शक कहानी में उलझ के रह जाते हैं और इस वजह से उनकी दिलचस्पी ख़त्म हो जाती है.

(फ़िल्म रिव्यू: मद्रास कैफ़े)

फ़िल्म का ड्रामा जितना दिलचस्प होना चाहिए था वो हो नहीं पाया. कई बार दर्शकों को समझ में ही नहीं आता कि फ़लां किरदार ऐसा क्यों कर रहा है? इस वजह से उन्हें खीझ होती है.

दर्शकों के मन में चल रहे कई सवालों के जवाब उन्हें मिल नहीं पाते.

जटिल किरदार

जॉन डे का किरदार भी ख़ासा उलझा हुआ है. फ़िल्म में तो उन्हें ख़ासा सिद्धांतवादी और ईमानदार बताया गया है लेकिन कहानी में अपनी सहूलियत के हिसाब से वो अपने सिद्धांतो से समझौता करते हुए भी नज़र आता है.

फ़िल्म के कई दृश्य इतने हिंसात्मक और वीभत्स हैं कि परिवार के साथ बैठकर आप उन्हें देख ही नहीं सकते. कई दर्शकों को इन दृश्यों को देखकर उबकाई भी आ सकती है.

पूरी फ़िल्म की कहानी बेहद गंभीर और तनावयुक्त है. फ़िल्म में कहीं भी हल्के फुल्के दृश्य नहीं आते. अहीशोर सोलोमन के संवाद स्वाभाविक हैं.

अभिनय

Image caption एलेना कज़ान ने अच्छा अभिनय किया है.

नसीरुद्दीन शाह ने अपने रोल को बेहतरीन तरीके से निभाया है. रणदीप हुडा ने भी अपने किरदार को अच्छे से निभाया है.

शरत सक्सेना ने भी अच्छा अभिनय किया है लेकिन उन्हें बहुत सीमित मौके मिले हैं.

शेरनाज़ पटेल ख़ासी स्वाभाविक लगी हैं. रणदीप हुडा की गर्लफ्रेंड के रोल में एलेना कज़ान भी अच्छी रही हैं.

अहीशोर सोलोमन का निर्देशन अच्छा है. उन्होंने कलाकारों से अच्छा काम लिया है. फ़िल्म का प्रस्तुतिकरण अच्छा है लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले उलझा हुआ है.

संदीप चौथा का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है. प्रकाश कुट्टी की सिनेमोटोग्राफ़ी अच्छी है. आइनो शेख के एक्शन दृश्य बेहद वीभत्स बन पड़े हैं.

कुल मिलाकर जॉन डे एक उबाऊ और उलझी हुई फ़िल्म है. बॉक्स ऑफ़िस पर इसके चलने की गुंजाइश नहीं है. फ़िल्म की शुरुआत भी ख़ासी कमज़ोर हुई है.

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