कहां गए दिलो-दिमाग़ पर छाने वाले वो डायलॉग?

  • 16 सितंबर 2013
'शोले'
Image caption फ़िल्म 'शोले' के संवाद ख़ासे हिट रहे.

'जानी, ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं, हाथ कट जाए तो ख़ून निकल आता है'. 'मेरे पास मां है'. 'ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं है'.

ऐसे तमाम डायलॉग हैं जो हिंदी फ़िल्म प्रेमियों के ज़ेहन में सालों से बसे हुए हैं.

50, 60 और 70 के दशक में कई ऐसी फ़िल्में बनीं जिनकी जान उनके डायलॉग हुआ करते थे.

(बॉलीवुड के मशहूर डायलॉग: पहला हिस्सा)

कई फ़िल्में तो सिर्फ़ डायलॉग्स यानी संवादों के बलबूते ही लोगों के दिलो-दिमाग में छा गईं.

Image caption फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में दिलीप कुमार और पृथ्वीराज कपूर के बीच के डायलॉग बेहद लोकप्रिय साबित हुए.

सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर, राजकुमार, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार जैसे कलाकार अपने डायलॉग डिलीवरी के लिए ख़ासे मशहूर हुए.

अभिनेता राजकुमार तो अपनी संवाद अदायगी के लिए ही ताउम्र जाने गए और उनके लिए फ़िल्मों में विशेष तौर से डायलॉग लिखे जाते थे.

उस दौर की फ़िल्मों में दो कद्दावर अभिनेताओं के बीच 'डायलॉगबाज़ी' की जंग आम थी जिसका दर्शक भरपूर लुत्फ़ उठाते थे.

फ़िल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच के संवाद हों या 'ज़ंजीर' में अमिताभ बच्चन और प्राण के बीच डायलॉग, 'मुग़ल-ए-आज़म' जैसी फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार जैसे दो दिग्गजों के बीच के संवाद भला कौन भूल सकता है.

इसी तरह से 90 के दशक में आई फ़िल्म 'सौदागर' में निर्देशक सुभाष घई ने दिलीप कुमार और राज कुमार जैसे ताकतकवर अभिनेताओं की संवाद अदायगी के ख़ास अंदाज़ को खूब भुनाया.

(बॉलीवुड के मशहूर डायलॉग: दूसरा हिस्सा)

लेकिन मौजूदा दौर की फ़िल्मों में ये 'डायलॉगबाज़ी' कम ही देखने को मिलती है.

अब फ़िल्मों में सशक्त संवाद सुनने को नहीं मिलते. तो क्या ऐसे डायलॉग्स का ज़माना चला गया जिन्हें लोग बरसों तक याद रख सकें ?

Image caption लेखक सलीम ख़ान मानते हैं कि मौजूदा दौर में अच्छे लेखकों की कमी की वजह से मज़बूत डायलॉग नहीं आ पा रहे हैं.

क्या वैसे लेखक नहीं रहे या दमदार शैली में डायलॉग बोलने वाले कलाकार नहीं रहे या कोई और वजह है ?

'अच्छे लेखकों की कमी'

'ज़ंजीर', 'शोले', 'दीवार' और 'डॉन' जैसी कई फ़िल्मों के स्क्रिप्ट राइटर सलीम-जावेद जोड़ी के सलीम ख़ान ने बीबीसी से बात करते हुए मौजूदा दौर की फ़िल्मों में दमदार डायलॉग न होने के लिए अच्छे लेखकों की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया.

(बॉलीवुड के मशहूर डायलॉग: तीसरा हिस्सा)

वो कहते हैं, "पहले के लेखक बहुत पढ़ते थे. हर वक़्त उनके हाथ में कोई न कोई किताब होती थी. अब के लेखकों के हाथ में डीवीडी होती है. मेहनत की जगह कामचोरी ने ले ली है. सब आसान काम करना चाहते हैं."

सलीम ख़ान ने बताया कि बीते दौर में महबूब ख़ान, बी आर चोपड़ा और रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकारों का अलग से लेखन विभाग होता था जिसमें कई लेखक काम करते थे, अब वो बात नहीं है.

सलीम कहते हैं, "पहले की फ़िल्मों में संवाद सिचुएशन से उठता था. इस वजह से वो दमदार लगता था. अब जैसे दीवार का मशहूर डायलॉग है, मेरे पास मां है. ये दो भाइयों के बीच वाक युद्ध हो रहा है जिसमें दोनों अपने आपको दूसरे से बेहतर स्थिति में बताने के दावे करते हैं."

"जब एक भाई अपने धन-दौलत और ऐश्वर्य का बखान करता है तब दूसरा भाई कहता है कि मेरे पास मां है. इस सिचुएशन की वजह से ये डायलॉग इतना दमदार लगता है. अगर आप मेरे पास मां है जैसा डायलॉग आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट बोलो तो वो बेजान लगेगा."

बकौल सलीम आजकल की फ़िल्मों में अगर लेखक को कोई दमदार डायलॉग सूझ गया तो वो उसके बाद उसके इर्द-गिर्द सिचुएशन रचता है.

Image caption फ़िल्म दीवार का 'मेरे पास मां है' वाला संवाद बेहद लोकप्रिय साबित हुआ.

ऐसी स्थिति में सारा पंच निकल जाता है और वो बात नहीं बन पाती.

'दमदार आवाज़ों की कमी'

मशहूर अभिनेता रज़ा मुराद अच्छे लेखकों की कमी के अलावा ये भी मानते हैं कि मौजूदा दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री में दमदार आवाज़ों की कमी है.

वो कहते हैं, "अच्छे डायलॉग भी तभी चलते हैं जब उन्हें बोलने वाली आवाज़ें दमदार हों. अब वो बैरीटोन, वो मज़बूत आवाज़ें कहां रह गई हैं. पिछले 30 सालों में मुझे बता दीजिए कोई ऐसा अभिनेता आया हो जिसकी आवाज़ में दम हो."

(बॉलीवुड के मशहूर डायलॉग: चौथा हिस्सा)

रज़ा मुराद के मुताबिक़ सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं की आवाज़ में दम होने के साथ-साथ इनकी एक विशिष्ट शैली हुआ करती थी. जिसकी वजह से उनकी संवाद शैली ख़ासी लोकप्रिय हुई.

'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' जैसी नई दौर की फ़िल्में लिखने वाले लेखक ज़ीशान क़ादरी भी मानते हैं कि डायलॉग के हिट होने में कलाकार की अहम भूमिका होती है.

Image caption 90 के दशक में आई फ़िल्म 'सौदागर' तो दिलीप कुमार और राजकुमार के बीच हुई 'डायलॉगबाज़ी' पर ही केंद्रित थी.

उनके मुताबिक़ संवाद तभी चलते हैं जब अभिनेता उन्हें बेहतर तरीके से बोले.

ज़ीशान क़ादरी कहते हैं, "फ़िल्म द डर्टी पिक्चर का डायलॉग था- फ़िल्में सिर्फ़ तीन वजहों से चलती हैं, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट. अब इसे विद्या बालन ने जिस अदा से कहा उसकी वजह से ये हिट हो गया. वर्ना ये डायलॉग अच्छा होते हुए भी किसी को याद नहीं रहता."

चला गया तमाशेबाज़ी का दौर

लेकिन फ़िल्म समीक्षक अर्णब बनर्जी की राय थोड़ा अलग है. वो मानते हैं कि पहले की फ़िल्मों में पारसी थिएटरों का प्रभाव होता था.

सिनेमा अपने शुरुआती दौर में था. तो लोगों का ख़ास अंदाज़ में बोले जाने वाले ख़ास किस्म के डायलॉग बड़े पसंद आते थे. वो तमाशेबाज़ी का दौर था.

राजकुमार, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कलाकार अपनी विशिष्ट संवाद शैली की वजह से ही मशहूर हुए.

अर्णब कहते हैं, "पहले की फ़िल्में थोड़ा-सा असलियत से दूर होती थीं. फ़िल्म में कलाकारों के बीच इंटरएक्शन होने के बजाय डायलॉगबाज़ी का ज़ोर था. कलाकार उस तरह से बातें नहीं करते थे जैसे आम लोग बात करते हैं."

"लेकिन अब ज़माना बदल गया है. लोग वही देखना और सुनना चाहते हैं जिससे रिलेट कर सकें. लोग वास्तविक डायलॉग और बातचीत फ़िल्मों में भी देखना चाहते हैं. इसलिए आजकल की फ़िल्मों में डायलॉगबाज़ी ज़रा कम ही देखने को मिलती है."

वैसे अर्णब ये भी मानते हैं कि भले ही आजकल के कलाकार पहले की तुलना में ज़्यादा मेहनत करते हैं लेकिन अमिताभ बच्चन या बलराज साहनी जैसे स्तर के कलाकार कम ही हैं जो अपने उच्चारण और डिलीवरी का इतना ख़्याल रखते हों.

Image caption फ़िल्म समीक्षक अर्णब बनर्जी के मुताबिक़ अब लोग फ़िल्मों में तमाशेबाज़ी वाले संवाद ना सुनकर असल ज़िंदगी से जुड़े संवाद सुनना चाहते हैं.

उधर ज़ीशान क़ादरी ये मानने को तैयार नहीं कि मौजूदा दौर में अच्छे लेखकों की कमी है और उस वजह से दमदार डायलॉग नहीं आ पा रहे हैं.

उनके मुताबिक़, "पहले की फ़िल्मों का गणित अलग था. तब फ़िल्में कई-कई हफ़्तों तक थिएटर में टिकी रहती थीं. लोगों को उनके बारे में बात करने का, चर्चा करना का ज़्यादा वक़्त मिलता था."

"अब फ़िल्मों का सारा गणित एक हफ़्ते पर सिमट आया है. फ़िल्मों की लाइफ़ कम हो गई है क्योंकि सिनेमा हॉल बढ़ गए हैं. इस वजह से डायलॉग अच्छे होने के बावजूद उतने नहीं चलते. लेखक अब भी अच्छे हैं."

आपको क्या लगता है? आप किसकी बात से सहमत हैं?

वैसे समीक्षकों के मुताबिक़ मौजूदा दौर में 'दबंग' और 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' जैसी फ़िल्में हैं जिनके संवाद ख़ासे लंबे समय तक लोगों को याद रहेंगे.

लेकिन बीते दौर के चाहने वालों की भी कमी नहीं है. तभी तो यूट्यूब पर 'मुग़ल-ए-आज़म' या 'शोले' के डायलॉग देखने वालों की कमी नहीं है.

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