फिल्म रिव्यू : कैसी है 'प्राग'

  • 27 सितंबर 2013

स्टार रेटिंग : 2.5

ग्लैमर स्ट्रक प्रोडक्शन्स और मैक्सवेल एंटरटेनमेंट की फिल्म 'प्राग' एक सॉयकोलॉजिकल थ्रिलर है. यह कहानी है चंदन (चंदन रॉय सान्याल), गुलशन (मयंक कुमार), आर्फी (आर्फी लाम्बा) नामक तीन दोस्तों की.

आर्फी की मौत हो चुकी है, उसकी महिला मित्र ने धोखा दिया था, चंदन भी अब तक अपनी जिंदगी में प्यार में असफल रहा है जबकि गुलशन उन लड़कियों को इम्प्रेस कर लेता है जिन्हें चंदन पसंद करता है.

कहानी

चंदन और गुलशन अपने काम के सिलसिले में प्राग आते हैं जहाँ उसकी मुलाकात एक कज़ाक लड़की एलीना से होती है. चंदन को एलीना से प्यार हो जाता है और वह उससे अपने प्यार का इज़हार करता है, एलीना भी चंदन से प्यार करने लगती है.

फिल्म रिव्यू : लंच बॉक्स

एक दिन, चंदन एलीना और गुलशन को एक साथ देख लेता है. इसके बाद वह निराश हो जाता है और एलीना से दूर रहना शुरु कर देता है.

चंदन अपने खास दोस्त आर्फी की मौत के लिए खुद को जिम्मेदार मानता है,जिसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो जाती है। गुलशन उसे समझाता है कि आर्फी के साथ उसकी बातचीत उसकी कोरी कल्पना है, आर्फी की मौत हो चुकी है. आर्फी चंदन को प्यार से बचने की चेतावनी देता रहता है.

फिल्म तब एक नाटकीय मोड़ लेती है जब चंदन गुस्से में आकर गुलशन को मार देता है. प्राग में चंदन औऱ गुलशन के अतीत से जुड़ी जो बातें उभर कर आती हैं, वह चौंकाने वाला होता है. क्या है चंदन औऱ गुलशन के अतीत से जुड़ा रहस्य ?

एलीना को जब यह पता चलता है कि चंदन उसमें दिलचस्पी नहीं ले रहा है. वह आत्महत्या करने का फैसला करती है. क्या वाकई एलीना अपनी जिंदगी खत्म कर लेती है? क्या चंदन आर्फी को लेकर अपनी कल्पनाओं से निजात पा जाता है? चंदन की जिंदगी में प्यार क्या रुख लेता है ?

निर्देशन

फ़िल्म रिव्यूः फटा पोस्टर निकला हीरो

रोहित खेतान द्वारा एक लड़के की जिंदगी में भ्रमों को लेकर बनायी गई यह फिल्म रोचक है लेकिन फिल्म में दिखाया गया नाटक आम दर्शकों को पूरी तरह समझ नहीं आयेगा.

निर्देशक आशीष आर शुक्ला ने इस कठिन विषय को संवेदनशीलता के साथ बनाया है लेकिन यह फिल्म फेस्टिवल और उच्च वर्ग के दर्शकों को ज्यादा अपील करती है.

फिल्म की शुरुआत वाकई बेहतरीन होती है. आशीष शुक्ला की लिखी कहानी रोचक है लेकिन खास वर्ग के दर्शकों को अपील भी करती है. सुमित सक्सेना, आशीष शुक्ला, अक्षेंद्र मिश्रा, विजय वर्मा और रोहित खेतान का पटकथा मजेदार है लेकिन आम दर्शकों को यह कई जगह भ्रमित करता है.

पटकथा दर्शकों को प्रभावित करती है, फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा को बढ़ाता है.

आर्फी की मौत और चंदन की जिंदगी को लेकर फिल्म में आये नाटकीय मोड़ और ट्विस्ट लुभावने हैं. डायलॉग उपयुक्त हैं, लेकिन कई सारे अनपयुक्त शब्दों को फिल्म से हटा दिया गया है, जो दर्शकों के लिये परेशानी पैदा करते हैं. संवादों में अंग्रेजी का भरपूर प्रयोग किया गया है, जो गैर अंग्रेजी भाषी दर्शकों के लिये दिक्कत पैदा करते हैं.

अभिनय

अभिनेता चंदन रॉय सान्याल ने कई एक भ्रमित इंसान के आलावा एक आम आदमी के अलग-अलग हावभाव को बेहतरीन तरीके से पेश किया है.

मयंक कुमार ने गुलशन के किरदार में अपनी उपस्थिति फिल्म में बनायी रखी है. आर्फी लाम्बा प्राकृतिक रहे हैं. एलीना कजान बिना किसी प्रयास के सुंदर और ग्लैमरस दिखी हैं. फिल्म में बाकी सब ने भी ठीकठाक अभिनय किया है.

अधिकतर जगह फिल्म भीड़ को खींचने में कामयाब नहीं होगी. आतिफ अफजल और वरुण ग्रोवर का संगीत फिल्म के विषय के प्रासंगिक है. लेकिन लोकप्रिय गानों का अभाव है. बैकग्राउंड संगीत का अच्छा रहा है.

उदय सिंह की सिनेमैटेग्राफी अच्छी रही है. सिद्धार्थ माथवन और मृणाल दास के बनाये सैट ठीकठाक हैं. मेघना मनचंदा की एडिटिंग बेहतरीन है.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि 'प्राग' एक खास माइंडसेट वाले ऑडियंस की फिल्म है लेकिन ब़ॉक्सऑफिस पर इसका कामयाब होना मुश्किल है. किसी बड़े चेहरे और मास अपील का न होना फिल्म की बड़ी कमी है.

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