बॉलीवुड की भीड़ में खोना नहीं चाहता: रब्बी शेरगिल

रब्बी शेर गिल

ऐसा कम ही होता है जब आप रब्बी शेरगिल को किसी फ़िल्म के लिए गाते हुए सुनते हैं. वैसे हाल ही में उन्होंने 'रांझणा' के लिए 'तू मन शुदी' गाया है.

तो बॉलीवुड से इस दूरी की क्या कोई ख़ास वजह है. क्या रब्बी इस बात से डरते हैं कि कहीं वो बॉलीवुड की भीड़ में खो न जांए?

बीबीसी के इस सवाल का जवाब देते हुए रब्बी कहते हैं, ''हां बॉलीवुड की भीड़ में खो जाने का डर तो है ही साथ ही मुझे ये भी लगता है कि बॉलीवुड का जो संगीत है वो आर्ट से ज़्यादा क्राफ़्ट है.''

अपनी बात को पूरा करते हुए रब्बी कहते हैं, ''मुझे ये लगता है की बॉलीवुड में भी आर्ट हो सकती है लेकिन मैं ख़ुद को अपनी ही मिट्टी से उखाड़ कर बॉलीवुड में लागों ये बात मुझे बहुत विचित्र लगती है. बनावटी लगती है. मुंबई अपनी चाल से चलता है मैं अपनी चाल से चलता हूँ. फिर भी कभी कभी हमारी राहें मिल जाती हैं. लेकिन ज़्यादातर अलग ही रहती हैं.''

इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट की कमी

Image caption रब्बी बॉब डेलेन और स्ट्रिंग के संगीत से काफी प्रभावित हैं

भारत में इंडिपेंडन्ट आर्टिस्ट की कमी क्यों है? जब ये सवाल बीबीसी ने रब्बी से किया तो सवाल का जवाब देते हुए वो बोले, ''जी हां, ये बात दुखदायक है कि भारत में ऐसे लोग कम हैं जो ख़ुद ही अपना संगीत बनाते हैं. भारत एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जब उसके पास कहानियों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इन कहानियों को कहने वाले लोग नहीं हैं.''

अपनी बात को पूरा करते हुए वो आगे कहते हैं कि भारत की ज़मीन कहानियों और संगीत के लिए काफ़ी उपजाऊ है लेकिन बस दुख इस बात का है कि बिना झिझक अपनी बात कहने वाले कलाकार काफ़ी कम हो गए हैं.

लिहाफ़ बना सूफ़ी संगीत

रब्बी के संगीत में आपको जाने अनजाने सूफ़ी संगीत की झलक मिल ही जाती है. इस बारे में वह बताते हैं कि आज सूफ़ी एक कमर्शियल लिहाफ़ बनकर रह गया है, जिसे किसी भी चीज़ के ऊपर डाल दिया जाता है.

रब्बी फिलहाल पंजाबी के शायर लाल सिंह दिल की कविताओं को संगीत में उतारने पर काम कर रहे हैं. रब्बी बताते हैं कि इन कविताओं में थोड़ा सा ग़म है.

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