लद्दाख़ी शोले की बसंती जो सरकारी नौकर है.....

  • 8 अक्तूबर 2013

गब्बर, बसंती, जय, वीरू… बेहद कम फ़िल्म प्रेमी होंगे जो फ़िल्म शोले के इन किरदारों से वाक़िफ़ नहीं होंगे. लेकिन क्या आपने लद्दाख़ी भाषा में बनी शोले के बारे में सुना है.

या कहें कि लद्दाख़ के फ़िल्म उद्योग के बारे में सुना है? यहाँ 'भाग मिल्खा भाग' और 'थ्री इडियट्स' जैसी कई फ़िल्में शूट हुई हैं लेकिन मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि लद्दाख़ में भी फ़िल्म इंडस्ट्री है जो अपने आप में बेहद दिलचस्प और अनोखी है.

यू ट्यूब पर लद्दाख़ी शोले देखने के बाद मैंने लद्दाख़ के फ़िल्म उद्योग के लोगों से मिलने की ठानी. तलाश शुरू हुई लद्दाख़ी शोले की बसंती से.

नॉरज़ुम लद्दाख़ की सबसे मशहूर युवा अभिनेत्रियों में से एक है जो लेह से 26 किलोमीटर दूर माटो गाँव से हैं. मज़े की बात ये है कि नॉरज़ुम असल में सरकारी कर्मचारी हैं- वे लेह में लोक निर्माण विभाग में काम करती हैं.

लद्दाख़ में आपको ज़्यादातर हीरो, हीरोइन, फ़िल्मकार, कैमरामैन, एडिटर ऐसे ही मिलेंगे. वे आम दिनों में टैक्सी ड्राइवर हैं, टीचर हैं, दुकानदार हैं या गाइड हैं. लेकिन गर्मियों में जब फ़िल्म शूट होती है, यही लोग फ़िल्म क्रू के सदस्य बन जाते हैं.

लद्दाख़: ख़ूबसूरत नज़ारों के बीच चाँद के टुकड़ें की हक़ीकत

Image caption लद्दाखी फिल्म उद्योग में प्रशिक्षित फ़िल्म क्रू नहीं है. वहां लोग लाइटिंग, मेकअप के गुर अभी सीख रहे हैं.

नॉरज़ुम से मिलने और उन्हें मनाने के लिए ख़ासी मशक्क़त करनी पड़ी. आख़िरकार जब वो तैयार हुईं तो बताया गया कि वे इस समय अपने सरकारी दफ़्तर में ड्यूटी पर हैं.

लेह में उनके सरकारी दफ़्तर के पीछे कुछ देर पैदल चलने के बाद एक शांत सी जगह पर हम मिले. लद्दाख़ की सबसे बड़ी अभिनेत्री मेरे साथ पैदल चल रही थी और मुझे थोड़ी हैरत हो रही थी कि आस-पास के लोग सामान्य तरीक़े से अपना काम किए जा रहे थे.

सरकारी कर्मचारी होते हुए फ़िल्मों में काम? मेरे इस सवाल को भाँपते हुए नॉरज़ुम ने बताया, "मैं सामान्य तौर पर सरकारी दफ़्तर में काम करती हूँ. जब कोई शूटिंग होती है तो शनिवार- रविवार को शूटिंग कर लेती हूँ. जब आउटडोर शूटिंग होती है तो मैं अपने सीनियर को बताती हूँ कि मुझे शूटिंग के लिए छुट्टी चाहिए. वो अकसर मान जाते हैं और फिर कोई दिक्क़त नहीं होती. यहाँ आपसे कोई स्टार की तरह बर्ताव नहीं करता. हाँ गाँवों में जाओ तो लोगों में थोड़ी उत्सुकता रहती है."

दुकानदार भी, कैमरामैन भी

Image caption मोतुप लद्दाख के लोकप्रिय युवा हीरो हैं. म्यूज़िक वीडियो में हिट होने बाद वह हीरो बन गए

लद्दाख़ में हर साल चार-पाँच फ़िल्में बनती हैं, दो से पांच लाख के बजट की ये फ़िल्में गर्मियों में शूट होती हैं. लद्दाख़ का फ़िल्म उद्योग छोटा सही लेकिन लोग इनका भरपूर आनंद उठाते हैं. सर्दियों में कड़ी ठंड की वजह से यहाँ का जीवन काफ़ी कठिन रहता है, मनोरंजन के साधन कम है. तो लोग इन्हीं फ़िल्मों से अपना मनोरंजन करते हैं.

लेह में रहने वाले ताशी दावा मोबाइल एक्सेसरिज़ की दुकान चलाते है लेकिन वो लद्दाख़ी फ़िल्मों में बतौर कैमरामैन और एडिटर भी काम करते हैं. हाल में उनकी डॉक्यूमेंट्री को लद्दाख़ फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कार भी मिला.

दुकानदार और कैमरामैन के बीच के इस घालमेल के बारे में ताशी कहते हैं, "मैं फ़िल्मों के साथ जुड़ा हुआ हूँ. लेकिन सिर्फ़ फ़िल्म लाइन के पैसों से मेरा घर नहीं चल सकता.. बाक़ी समय मैं अपनी दुकान पर बैठता हूँ. जब मैं शूट कर रहा होता हूँ तो मेरी पत्नी दुकान चलाती है. पैसे कमाने के लिए मैं हर छोटा बड़ा काम करता हूँ. यहाँ आप ये नहीं सोच सकते कि फ़िल्म लाइन में हैं तो बहुत बड़े हो गए."

सबकी अमूमन यही कहानी है. मोतुप लद्दाख़ के लोकप्रिय युवा हीरो हैं. पिता की दुकान पर उनका मन नहीं लगता था. फिर एक दिन एक दोस्त के साथ मिलकर लेह में म्यूज़िक वीडियो शूट किया और अपनी दुकान के बाहर टीवी पर चला दिया. बस फिर क्या था बाज़ार में बेतहाशा भीड़ जुट गई और पुलिस को बीच बचाव करना पड़ा.

मोतुप बताते हैं कि उनके वीडियो की इतनी डिमांड हुई कि उन्होंने सोचा क्यों न वीडियो की जगह फ़िल्म का हीरो बना जाए. वे बताते हुए ख़ुद ही भूल जाते हैं कि वे हीरो, निर्देशक या कैमरामैन, या फिर सब कुछ हैं.

हिमाचल, नेपाल में भी लोकप्रिय

Image caption लद्दाखी फ़िल्में हिमाचल प्रदेश, नेपाल और मंगोलिया के कुछ हिस्सों में भी लोकप्रिय हैं.

स्थानीय लोग बताते हैं कि उन्हें मेलो़ड्रामा, रोमांस वाली पारिवारिक फ़िल्में पसंद हैं और नाच गाना होना तो ज़रूरी है- बॉलीवुड स्टाइल. हालांकि लेह भर में एक ऑडिटोरियम है जहाँ फ़िल्में दिखाई जाती है और वहाँ से गाँव-गाँव ले जाकर इन फ़िल्मों को दिखाया जाता है.

यहाँ पहली बार फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने वालों में वरिष्ठ फ़िल्मकार और अभिनेता चेतन का नाम आगे आता है.

वे बताते हैं, “1989 की बात है. मैंने एक नाटक के लिए कहानी लिखी. यहाँ थिएटर की परंपरा रही है. एक दिन यूँ ही मैंने बोल दिया कि इस पर फ़िल्म बनाएँगे. जब नाटक हिट हो गया तो सब कलाकार कहने लगे, 'क्यों न फ़िल्म बनाने की कोशिश करें, देखते हैं क्या होता है'. हालांकि हमें ठीक से अंदाज़ा नहीं था कि कैसे क्या करना है. कहीं से कैमरा मिला, फ़िल्म शूट हुई, गाँवों में हमने दिखाई. वहीं से शुरुआत हुई.”

तब से लद्दाख़ फ़िल्म इंडस्ट्री आगे बढ़ी है. लद्दाख़ फ़िल्म फ़ेस्विटल के निदेशक मेल्विन विलियम्स बताते हैं कि लद्दाख़ी फ़िल्में लद्दाख़ में ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश, नेपाल में भी लोकप्रिय हैं.

चेतन ने बताया कि एक बार दिल्ली हवाई अड्डे से आते वक़्त उनका सामान ज़्यादा हो गया तो किसी अजनबी सह यात्री ने उनका सामान अपने नाम पर करवाकर उनकी मदद की. बाद में उस यात्री ने चेतन को बताया कि वो हिमाचल में लद्दाख़ी फ़िल्में देखते हैं और बतौर अभिनेता चेतन की फ़िल्में देख चुके हैं और उन्हें पहचानते हैं.

बजट नहीं, तकनीक नहीं, तो क्या हुआ

अब कोशिश यही है कि इस पहचान को और आगे तक ले जाया जाए. लद्दाख़ को क़ुदरत ने ग़ज़ब की ख़ूबसूरती बख़्शी है, इसलिए शूटिंग लोकेशन की कोई कमी नहीं है. पर यहाँ अब भी प्रशिक्षित फ़िल्म क्रू नहीं है, लाइटिंग, मेकअप आदि के गुर अभी लोग सीख रहे हैं. पिछले कुछ सालों में राकेश मेहरा, श्याम बेनेगेल जैसे फ़िल्मकार लद्दाख़ से जुड़े हैं. जैसे जैसे बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ रहा है, लद्दाख़ी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट, तकनीक और सोच में विविधता आ रही है.

लद्दाख़ में इन फ़िल्मों की लोकप्रियता और माँग में कोई कमी नहीं है. बड़ा बजट न सही, तकनीक न सही, सिनेमाहॉल न सही लेकिन यहाँ इनके पास अपने अपने सलमान, शाहरुख़, करीना, कटरीना हैं.

तो कभी मौक़ा लगे तो आप भी लद्दाख़ी फ़िल्म का आनंद लीजिए. हाँ ये ज़रूर हो सकता है कि यही सितारे आपको लद्दाख़ के बाज़ार में दुकान पर, किसी स्कूल में, किसी सरकारी दफ़्तर में भी काम करते हुए मिल जाएँ. नॉरज़ुम की तरह जो बसंती और सरकारी कर्मचारी दोनों का किरदार बख़ूबी निभा लेती हैं.

(इस शृंखला की अगली पेशकश में हम आपके लिए लेकर आएँगे एक विशेष रिपोर्ट, जिसमें चर्चा होगी लद्दाख़ में उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर काम कर रहे लोगों की.)

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