भक्ति गीतों में भी बॉलीवुड की भेड़चाल

  • 11 अक्तूबर 2013
देवी गीत
Image caption बॉलीवुड धुनों पर बनने वाले देवी गीतों की भरमार हो रही है.

'काँटा लगा' बन गया 'मैया मेरी', 'सैयां दिल में आना रे' बन गया 'माँ के मंदिर आना रे' और ऐसे ही न जाने कई गानों से नवरात्रि के दिनों में धूम मच जाती है.

मंदिरों से लेकर घरों तक, गली से लेकर मोहल्ले तक बॉलीवुड गानों की धुनों पर बने ऐसे सैकड़ों गाने सुनने को मिल जाते हैं. कई लोग ये गाने गुनगुनाते हैं, कई लोग मुस्कुराते हैं और कई इन्हें एक 'गंदा मज़ाक़' समझते हैं.

(सुनिए: 'कांटा लगा' की धुन पर बना देवी गीत)

लेकिन गाने सुनते वक़्त एक सवाल ज़ेहन में हमेशा आता है कि आख़िर ये गाने लिखता कौन है? और क्या ऐसे गाने लिखते वक़्त उस के मन में ज़रा भी भक्ति भावना होती है?

बॉलीवुड की लोकप्रियता का इस्तेमाल

मुकेश पाण्डेय, ऐसे ही कई गानों को लिख चुके हैं और उनको संगीतबद्ध भी कर चुके हैं वो सोनू निगम, विनोद राठौड़, अनुराधा पौडवाल और बाबुल सुप्रियो जैसे गायकों को बॉलीवुड पैरोडी में भी गवा चुके हैं.

मुकेश कहते हैं कि ये उनके लिए बस काम है.

मुकेश कहते हैं, "अगर हमें मज़ाक़ ही करना है तो हम माता को लेकर तो मज़ाक़ नहीं करेंगे और भी बहुत सारी चीज़ें हैं मज़ाक़ करने के लिए. अब अगर कोई वैष्णो देवी जाता है तो उसमें उर्जा जगाने के लिए हम बॉलीवुड का कोई ऐसा गीत चुनते हैं जिसमें भरपूर उर्जा हो और लोग उसे गुनगुना भी पाएं. अब अगर हम भीमसेन जोशी के गीत पर पैरोडी बनाकर लोगों को चढ़ाई करवाएं तो वो थोड़ा मुमकिन सा नहीं लगेगा. तो बॉलीवुड के चर्चित गीत इंसान में जोश भर देते हैं."

(सुनिए: 'परदेसिया' की धुन पर बना देवी गीत)

मुकेश कहते हैं, "युवा पीढ़ी में भक्ति भावना जगाने का इससे अच्छा तरीक़ा और कोई हो ही नहीं सकता. युवा चर्चित बॉलीवुड गानों पर बनी पैरोडी को सुनते ही वो उसकी धुन को किसी बॉलीवुड गाने से मिलाने में लग जाता है और उस वक़्त वो इसी दुविधा में गाना सुन लेता है. बॉलीवुड के चर्चित गीत अपने आप में सम्मोहन लिए हुए रहते हैं जैसे की 'टिंकू जिया', अब इस गाने की धुन पर और कोई भी दूसरा गाना बनाया जाए तो वो यक़ीनन हिट हो जाएगा."

'टैलेंट की कमी'

Image caption मुकेश पांडेय बॉलीवुड धुनों पर बने कई गीतों को लिख और संगीतबद्ध कर चुके हैं.

चाहे बात युवा पीढ़ी की हो या श्रद्धालुओं की, ऐसे भक्ति गीत जो बॉलीवुड के चर्चित गानों पर बनते हैं जाने अनजाने में ही कई लोगों की भावनाओं को ठेस पुहंचा देते हैं. पर पैरोडी का ये चलन आख़िर शुरू कैसे हुआ और कब ये बदलते बदलते भक्ति गीतों पर आकर रुक गया.

पैरोडी का दौर शुरू हुआ 40 के दशक में और अगर उसके पीछे आपकी नीयत साफ़ है तो इस में कुछ ग़लत नहीं है, ऐसा मानना है संगीत समीक्षक पवन झा का.

वो कहते हैं, "शुरूआती पैरोडी की अगर बात करें को करन दीवान का गाना 'जब तुम ही चले परदेस' उस पर एक बहुत ही चर्चित पैरोडी बनी थी 'जब तुम ही चले इंग्लैंड बजा के बैंड' और फ़िल्म 'ख़ज़ांची' का गाना 'सावन के नज़ारे हैं' उस पर भी बहुत कमाल की पैरोडी बनी थी. तो बॉलीवुड में पैरोडी का दौर बहुत पहले से ही चल रहा है.’

पवन के मुताबिक़, "अगर पैरोडी अच्छी नीयत और नएपन से की जाए तो एक बहुत ही अच्छा मज़ेदार प्रयोग हो सकता है पर जहाँ तक भक्ति गीतों में पैरोडी का सवाल है उन्हें जब भी मैं सुनता हूँ तो मुझे बहुत दुख होता है. ऐसे गीतकारों के पास यक़ीनन टैलेंट की कमी है और वो कम वक़्त में ज़्यादा प्रसिद्धि पाना चाहते हैं."

'भद्दा मज़ाक़'

कई श्रद्धालु इस तरह के चलन को भद्दा मज़ाक़ मानते हैं.

दिल्ली की नैना कहती हैं, "धुनों पर माता के भजनों का बनना एक बहुत ही ग़लत बात है. माता जिन्हें हम पूजते हैं उनके लिए ऐसे गाने जब हम सुनते हैं तो हमें बहुत बुरा लगता है और उनमें शोर भी बहुत ज़्यादा होता है. श्रद्धा की बात करें तो उनमें पुराने भजन अच्छे हैं लेकिन फ़िल्मी धुनों पर जो भजन बनते हैं वो बहुत ग़लत बात है.’

वाराणसी से एक और श्रद्धालु रमाकांत त्रिपाठी का कहना है, "माता के ऊपर बॉलीवुड की धुनों से बने जो भक्ति गीत हैं उन्हें नहीं बनाना चाहिए. अभी हाल ही में बॉलीवुड के एक गाने 'तैनू मैं लव करदा' पर ऐसा ही एक भक्ति गीत बना है जो सुनने मैं बहुत ही गंदा लगता है. तो मैं तो इसके बिलकुल ही ख़िलाफ़ हूँ और ऐसे गाने न ही बनें तो बेहतर है."

(सुनिए: 'सैयां दिल में आना रे' की धुन पर बना देवी गीत)

लेकिन ऐसे गानों का बाज़ार दिन प्रति दिन बढ़ रहा है जिससे ये साफ़ है कि ऐसे गानों को पसंद करने वाले लोग भी कहीं न कहीं मौजूद हैं तभी हर एक धार्मिक त्यौहार या उत्सव में इन्हें बड़े ज़ोरों से बजाया जाता है और लोग इससे चाहकर भी नज़रंदाज़ नहीं कर सकते.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए