कौन तय करता है कला के मूल्य ?

ग्रेसन पेरी, आधुनिक कला

ग्रेसन पेरी ने "लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है" व्याख्यान में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण के तरीकों पर विचार किया है. उन्होंने वर्तमान समय में किसी कलाकृति में सर्वाधिक प्रभावशाली कारकों पर अपनी राय रखी है. जानिए उन्हीं के शब्दों में.

मैं कला के बारे में एक कलाकार के तौर पर बोल रहा हूँ. उन अनुभवों के आधार पर बोल रहा हूँ जो मुझे एक कलाकार के तौर पर हुए हैं.

अकादमिक तौर पर मैं कला विशेषज्ञ नहीं हूँ और इसीलिए मेरे द्वारा केवल अपने अनुभवों के साधारणीकरण के आधार पर कला के बारे में कहना अकादमिक जगत के लोगों को बुरा लग सकता है.

मेरा लेक्चर कला की दुनिया के बारे में है. कला आप जिसे दुनियाभर के संग्रहालयों, कला दीर्घाओं में देखते हैं या फिर गलियों में और साइबर वर्ल्ड या कहीं भी देखते हैं.

मैं इस लेक्चर में बताना चाहूँगा कि लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है'.

कला जगत में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, इसका निर्णय करने का आधार क्या होता है, इसका जवाब देना आसान नहीं है.

अच्छी कला क्या है

कला जगत में लोकप्रियता और कलात्मकता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं रहा है.

मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि मैं कला के मूल्य के बारे में बात करने जा रहा हूँ. बाज़ार मूल्य, लोकप्रियता, ऐतिहासिक महत्व, कलात्मक गुणवत्ता इत्यादि कला के मूल्य निर्धारण के आधार हो सकते हैं.

आप देख सकते हैं कि कला के मूल्य निर्धारण के कई प्रतिमान परस्पर विरोधी भी हो सकते हैं. कई बेहद लोकप्रिय कलाकृतियों को कला के लिए समर्पित लोगों ने वाहियात माना है.

1990 के आसपास दो रूसी कलाकारों ने कई देशों की लोकप्रिय कलाकृतियों का अध्ययन करवाया. उन्होंने पाया कि हर देश में लगभग एक तरह ही की कलाकृति पसंद आती है.

ऐसे चित्र मूलतः प्रकृति चित्र थे जिनमें नीले रंग का बहुतायत में इस्तेमाल किया गया था. इस नतीजे के बाद इन कलाकारों ने कहा था कि हम स्वतंत्रता की तलाश में निकले थे, लेकिन हमें ग़ुलामी मिली.

किसी कलाकृति के बारे में यह कहना कि यह सुंदर नहीं है, उसके मूल्य निर्धारण का ग़लत प्रतिमान होगा क्योंकि सुंदरता एक बहुत ही सापेक्षिक मूल्य है. यह मूलतः एक कंस्ट्रक्ट है.

ऐसे में सवाल उठता है कि अच्छी कला क्या है इसका निर्धारण कौन करता है?

बहुत सारी कलाकृतियां विलास की वस्तु हो चुकी हैं. कई सारे कला संग्रहकर्ताओं के लिए फेरारी कार ख़रीदने और कोई महँगी कलाकृति ख़रीदने में कोई अंतर नहीं है.

इसलिए इसे भी कला के मूल्य निर्धारण का आधार नहीं माना जा सकता. इसलिए मेरा मानना है कि किसी कलाकृति की गुणवत्ता के निर्धारण का कोई अनुभवसिद्ध तरीक़ा अगर है, तो वो बाज़ार है.

और शायद यही वजह है कि आज की दुनिया से कला लुप्त होती जा रही है.

'कला जगत के पोप'

कला आलोचक क्लीमेंट ग्रीनबे ने एक बार कहा था, "कला की नाभिनाल पैसे से जुड़ी है, अब वो चाहे निजी पूँजी हो या सरकारी."

ऐसे में सवाल उठता है कि किसी कलाकृति की क़ीमत कौन तय करता है, मीडिया, कला आलोचक कला संरक्षक, कला के ख़रीदकार या फिर आम दर्शक ?

मेरा मानना है कि कला जगत में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण में किसी की सर्वाधिक भूमिका होती है तो कला संरक्षक की है.

जर्मन कला आलोचक विली बॉनगार्ड ने एक बार कहा था, "कला संरक्षक कला जगत के पोप हैं".

मेरा मानना है कि ऐतिहासिक तौर पर कला जगत काफी हद तक अंतर्मुखी रहा है. कई ऐसे सफल कलाकार हुए हैं जिन्हें व्यापक जनता की ज़रूरत नहीं रही है.

यह कलाकारों, आर्ट डीलर, संग्रहकर्ताओं के बीच का मामला रहा है. व्यापक जनता तक की कला का पहुँचना बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखता है.

हालाँकि कोई भी व्यक्ति कला का आनंद उठा सकता है. यहाँ तक कि मैं भी.

(ग्रेसन पेरी पॉटर कलाकार हैं. उन्हें कला जगत का प्रतिष्ठित टर्नर प्राइज़ (2003) मिल चुका है. यह लेख उनके बीबीसी रेडियो-4 रीथ वार्षिक व्याख्यान शृंखला के तहत दिए जा रहे पहले व्याख्यान का संपादित अंश है. इस श्रंखला के तहत पेरी चार व्याख्यान देंगे. पेरी अपने दूसरे व्याख्यान में "कला क्या है" विषय पर बोलेंगे.)

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