'तुमने अच्छा काम किया, सुनने के लिए तरसता था'

मन्ना डे

भारत के मशहूर गायक मन्ना डे का गुरुवार को बैंगलोर के अस्पताल में निधन हो गया. वो 94 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे. साल 2000 में हमारी पूर्व सहयोगी सलमा ज़ैदी ने उनसे ख़ास बात की थी. उसी बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश यहां प्रस्तुत हैं.

ऑडियो इंटरव्यू सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

आज का श्रोता आपकी आवाज़ सुनने को तरस रहा है, आपने फ़िल्मों से संन्यास तो नहीं ले लिया है?

मेरे ख्याल से स्रोताओं को मेरे बारे में बहुत कुछ मालूम है. बंबई में मैं करीब पचास साल से काम कर रहा हूँ. अलग तो मैं हो नहीं गया हूँ. आप ये समझ लीजिए कि मेरी उम्र जितनी है ना, इस उम्र में मैं हीरो के लिए कैसे गाऊं? नहीं गाता हूँ मैं. मैं ये सोचता हूँ कि आवाज़ में जो भारीपन आ जाता है, वो भारीपन एक युवा व्यक्ति के लिए ठीक नहीं है.

आप उन हीरो की तरह नहीं है जिनके चेहरे से उम्र झलक रही है, लेकिन वे अभी भी गाना गाते हैं और नई-नई लड़कियों के साथ रोमांस करते हैं?

मुझे अच्छा नहीं लगता है इसका मतलब ये नहीं है कि मैं सबकुछ बदल दूं. जिन लोगों को अच्छा लगता है वे यह कर रहे हैं.

कुछ दिन पहले आपको सुना, आपकी आवाज़ में अब भी वही दम है.

मैंने फ़िल्मों में गाना जब शुरू किया था उससे पहले मैंने बहुत से अच्छे-अच्छे उस्तादों के पास सीखा. सीखने के बाद मुझे जितने गानों के लिए बुलाया गया, मैं अपनी शिक्षा उन गानों में हमेशा डालता रहा. ये बहुत अच्छी बात है कि लोगों को ये अच्छा लगा और उन्होंने मेरी गायिकी की बहुत तारीफ़ भी की.

आप किन गायकों से प्रभावित होकर फ़िल्मों में आए थे?

केसी डे साहब मेरे पिताजी के छोटे भाई थे. मैंने पढ़ाई ख़त्म की तब चचा ने बोला कि तुम गाना गाते हो और गाना चाहते हो तो अब सीखना शुरू कर दो. मैंने सीखना शुरू कर दिया.

शुरुआत जो है वो गुरू से ही होनी चाहिए. सही गुरू मिलने चाहिए. सही गुरु ही सुर क्या है, लय क्या है - ये सिखा सकते हैं. कोई अपने आप ये नहीं सीख सकता. चचा जी ने ये सब बताया मुझे.

उसके बाद चचा जी इत्तेफ़ाक से बंबई आ रहे थे फ़िल्मों में काम करने के लिए. चूंकि चचा जी आंखों से लाचार थे, इसलिए उनके साथ किसी को आना ही पड़ा. उन्होंने शादी भी नहीं की थी और मैं उनके बेटे जैसा था. तो मुझे ही उनके साथ बंबई आना पड़ा. मैं तब से बंबई में ही रह रहा हूँ.

बंबई में आने के बाद मैंने चचा जी से कहा कि मुझे शास्त्रीय संगीत सीखना है. चचा जी भी यही चाहते थे. वे मुझे उस्ताद अमन अली खाँ के पास ले गए. अमन अली खाँ के पास मैं कुछ दिन ही सीख पाया. वे गुरू तो बहुत जबरदस्त थे लेकिन उनका जल्द ही इंतकाल हो गया.

उसके बाद मैंने अब्दुर्रहमान खाँ साहब के पास सीखना शुरू किया. वे महान थे. एक गुरू के रूप में भी और एक संगीतकार के रूप में भी. मैं ये कहूँगा कि ऐसे गुरू बहुत कम मिलते हैं. मैंने उनके पास तीन चार साल सीखा और साथ ही साथ मैं कुछ संगीत निर्देशकों का सहायक भी रहा. जैसे अनिल विश्वास साहब, खेम चंद प्रकाश साहब बाद में एसडी बर्मन साहब का सहायक रहा.

शास्त्रीय संगीत में आपकी रूची थी. फ़िल्मों में आकर एक बंदिश-सी हो जाती है. क्या कभी आपको लगा कि यदि आप फ़िल्मों में न आते तो एक शास्त्रीय गायक के तौर पर और भी ज़्यादा नाम कमा सकते थे?

हाँ, इतना विश्वास तो मुझमें था, मैं ये कर सकता था, लेकिन उन दिनों शास्त्रीय गायन करनेवालों के लिए उतने मौके नहीं थे जितने आज के शास्त्रीय गाने गाने वालों के पास हैं. वो पहले भूखों मर रहे थे. फ़िल्म के ज़रिए हम जो कुछ भी कर रहे थे उससे बहुत खुश थे.

तो क्या आप अपने फ़िल्मी संगीत से संतुष्ट हैं?

निश्चित रूप से. ये मैं कहूँगा कि फ़िल्म के ज़रिए हम जो संगीत देते आए हैं और जितने बड़े-बड़े संगीत निर्देशकों के साथ मैंने काम किया है और उन्होंने देश के लाखों लोगों को संगीत के रूप में जो दिया है वह बड़ी देन है.

संगीत के क्षेत्र में एक बार पैर जमाने के बाद भी कितनी मेहनत, कितना रियाज़ ज़रूरी है?

फ़िल्मी गानों के लिए इतना रियाज़ और इतनी मेहनत नहीं चाहिए. सुर क्या चीज़ है, लय क्या चीज़ है और ताल क्या चीज़ है जब यह मालूम पड़ जाए तब आगे बढ़ना चाहिए. इसी पर काम करना चाहिए आगे बढ़ने के लिए. ऐसा नहीं है कि दो गाने गाए और हिट हो गए, उसके बाद सोचा कि मैं बहुत कुछ हो गया. नहीं, इसके बाद भी बहुत कुछ हो सकता है.

अब हर संगीत निर्देशक के बनाने का ढंग अलग है. नौशाद साहब जैसा संगीत बनाएंगे शंकर जय किशन ऐसे नहीं बनाएंगे. शंकर जयकिशन जैसे बनाएंगे एसडी बर्मन साहब ऐसा नहीं बनाएंगे. सबके गाने गाने के लिए वो तैयारी भी होनी चाहिए.

कोई संगीत निर्देशक ये नहीं बोलेंगे की वो गाना जैसे गाया था ऐसे गा दो, नहीं, हमने जो बनाए हैं वो गाओ और समझकर गाओ.

‘लागा चुनरी में दाग़, ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं’ जैसे गानों ने आपको बहुत शोहरत दिलाई. आपका पसंदीदा गाना कौन सा है?

ये कहना बहुत मुश्किल है, मैंने जितने भी गाने गाए हैं वे सभी मेरे बच्चों की तरह हैं. मैं बहुत मेहनत करके गाता था. जिस भी संगीत निर्देशक ने मुझे बुलाया और कहा कि ये गाना गा दो तो मैं बाक़ायदा उस गीत पर घर जाकर दो तीन दिन काम करता हूँ, रिहर्सल करता हूँ. कोशिश करता हूँ कि उसे अच्छी तरह से माँज कर चमका दूँ.

उसके बाद जब हम माइक्रोफ़ोन के सामने जाते थे तब संगीत निर्देशक बोलते थे कि तुमने अच्छा काम किया. ये सुनने के लिए मैं तरसता था.

आपने एक शास्त्रीय गीत ‘फूल गेंदवा ना मारो’ एक कॉमेडियन के लिए गाया. इसकी क्या कहानी है?

कमाल है कि वो गीत रोशन साहब ने बनाया था और लिखा था साहिर लुधियानवी ने. रोशन ने कहा कि मन्ना कि ये गाना तो भैरवी में है और शास्त्रीय तो है ही है और गा रहे हैं आग़ा. देखो तो सही कि आग़ा को ऐसा गाना कैसे दे दिया. परिस्थिति ही ऐसी बनी की आग़ा ये गीत गा रहा है. तुम ऐसे सोच के गाओ की आग़ा गा रहा है, ऐसा ना लगे की ये गीत जबरदस्ती उन पर थोपा गया है.

मैंने किसी भी कलाकार के लिए गाने गाए. मैं बाक़ायदा निर्देशक से पूछा करता था कि कौन गा रहा है, परिस्थिति क्या है, लहज़ा क्या होना चाहिए. मैं तो कहता हूँ कि फ़िल्मी गाना भी शास्त्रीय संगीत से कम नहीं है.

क्या आपको कभी हल्के-फुल्के गाने में आनंद आया या आपको लगा कि फ़िल्मी गाने गाने में भी

मैंने जो कुछ भी गाया, जब भी गाया हर बार, हर गीत में अपना सौ प्रतिशत दिया. कुछ कुछ संगीत निर्देशक ऐसे थे जो जब अच्छा गाना बनाते थे तो बोलते थे कि इसे मन्ना गाएगा, जैसे की बर्मन साहब.

Image caption मन्ना डे ने साढ़े तीन हज़ार से अधिक गीतों को अपनी आवाज़ दी.

किन संगीत निर्देशकों के साथ काम करने में आपको सबसे ज़्यादा मज़ा आया?

शंकर जयकिशन, ये मैं ज़रूर कहूंगा कि बीस साल में जो संगीत वो दे चुके हैं उसके जवाब में मेरे पास कोई शब्द नहीं है क्योंकि बीस साल लगातार सैंकड़ों फ़िल्मों में जो उन्होंने संगीत दिया है वह बेमिसाल है. फ़िल्म फ्लॉप भी हो जाती थी तो गीत हिट हो जाते थे.

आपको लगता है कि आपकी प्रतिभा को उन्होंने सही तौर पर पहचाना?

बिलकुल, ये मैं कभी भूलूंगा नहीं कि शंकर जी ने ख़ासकर के जैसे गाने मुझसे गवाए जैसे – ‘ऐ भाई ज़रा देख के चलो’, ‘नैन मिले चैन कहाँ’, ‘ये रात भीगी भीगी’ - ये सब शंकर जी और जयकिशन जी का बनाया हुआ है. शंकर भी बनाते थे और जयकिशन भी बनाते थे. आजा सनम जयकिशन ने बनाया था. ‘मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा’ - ये भी जयकिशन ने ही बनाया था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार