बंगला, गाड़ी सब है...आइटम सॉन्ग की क्या मजबूरी है?: राकेश मेहरा

  • 30 अक्तूबर 2013
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लद्दाख में सुबह की ठंडी बयार, सिंधु नदी का किनारा और बातचीत के लिए साथ में फ़िल्म निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा. भाग मिल्खा भाग और रंग दे बसंती जैसी फ़िल्में बनाने वाले राकेश मेहरा ने बीबीसी से कई मुद्दों पर बड़ी साफ़गोई से बाते कीं.

आइटम सॉन्ग की क्या मजबूरी?

हमारी फ़िल्मों में महिलाओं को एक प्रॉपर्टी, एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है. फ़िल्मों में आइटम सॉन्ग जैसी चीज़ें करने वाली अभिनेत्रियाँ ऐसी भी नहीं है कि उन्हें कोई पैसे की मजबूरी है..या उनके घर में कोई बीमार पड़ा है कि एक आइटम सॉन्ग कर लेंगे तो पैसे आ जाएँगे.

ऐसा भी नहीं है कि खाने को कुछ नहीं है और छोटे भाई को खाना खिलाना है. सबके पास चार चार गाड़ियाँ हैं, बंगला है, दुनिया घूमते हैं यानी कोई मजबूरी नहीं है. अगर आपकी मजबूरी सिर्फ़ ग्लैमर है कि कैसे मैं मशहूर हो जाउँ....ये तो मजबूरी साफ दिखती है लोगों को.

जितना ताज्जुब मुझे ऐसे रोल करने वालों और बनाने वालों पर होता है उतना ही ताजुब्ब दर्शकों पर होता है क्योंकि वो उसे सराहते हैं. कल अगर इन चीज़ों की माँग नहीं होगी तो वो बिकना भी बंद हो जाएगा. ये सब एक दुख भरा व्यंग है. इन चीज़ों पर आप लोग सवाल उठाएँगे, हम फ़िल्मकार अपने अंदर झाँकेंगे तो शायद कुछ बदलेगा.

राकेश मेहरा वीडियो पार्ट 2

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महिला और समाज

शर्म सी आती है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ ऐसा हो रहा है, जानवर भी ऐसा बर्ताव नहीं करते. लेकिन ये नया नहीं है. ये बस हज़ारों सालों से चल रहा है. हम सबको शर्म तो आनी ही चाहिए पर हम कर क्या रहे हैं ये सोचने वाली बात है.

जब कोई बच्चा पैदा होता है तो उसके माथे पर रेपिस्ट तो नहीं लिखा होता. समाज और उसकी परिस्थितियाँ उसे ऐसा बना देती हैं. सोचना ये है कि हम अपने समाज में कर क्या रहे हैं. अभी हम कह रहे हैं कि उन्हें फाँसी पर चढ़ा दो, ख़ून का प्यासा कैसे हो गया पूरा देश जबकि हम गाँधी के देश में रहते हैं. आप सही बोल रहे हैं कि इस बारे में फ़िल्म तो बननी ही चाहिए. ये मेरा काम है और सोच चल रही है.

राकेश मेहरा वीडियो पार्ट 3

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कैसे चुनते हैं फ़िल्म

एक लेखक, निर्देशक होने के नाते अपनी फ़िल्मों के ज़रिए आप कुछ बोलना चाहते हैं. हर बार अलग बात कहने की चाहत होती है, इसलिए हर दफ़ा नया मुद्दा उठाना चाहता हूँ. अक्स में दिखाना चाहता था कि अच्छाई और बुराई जीवन के दो पहलू हैं. वो बात कुछ अधूरी रह गई तो दिल्ली-6 बनाई.

साहिर लुधयानवी का एक शेर है - 'बहुत दिनों से है मशगला सियासत का जब जवां हो बच्चे तो क़त्ल हो जाएँ'. यहीं से रंग दे बसंती बन गई. जब मिग एयरक्राफट क्रैश हो रहे थे और कैग की रिपोर्ट में करोड़ों का घोटाला सामने आया था. बहुत गु़्स्सा आया..या तो उस गुस्से को बातों में निकाल दें या फिर कुछ किया जाए. इसलिए रंग दे बसंती बनाई.

मिल्खा सिंह को लेकर अलग दृष्टिकोण था कि अपने अतीत से भागना नहीं चाहिए. ये ज़रूरी नहीं कि हर फिल्म सामाजिक ही हो.

फ़िल्म बनाने की चुनौतियाँ

मैं अपनी मर्ज़ी से फ़िल्मकार बना हूँ इसलिए चुनौती का भी मुझे ही सामना करना होगा. किसका काम चुनौतीपूर्ण नहीं होता. हम भाग मिल्खा के लिए स्टीम इंजन के लिए शूट कर रहे थे जो कोयले से चलता है.

आम लोग मानेंगे नहीं लेकिन आप वहाँ तीस सैंकेड से ज़्यादा नहीं रुक सकते. आपके आगे मानो भट्टी जल रही है. उस ड्राइवर के बारे में सोचिए जो 16 घंटे उसी में रहता है. सड़कें बनती हैं वहाँ औरतें, बच्चियाँ काम करती हैं, तारकोल जलाती हैं. इनके सामने तो हमारी चुनौती कुछ भी नहीं . हम एसी कमरे में बैठते हैं, एक्शन बोलते हैं और फ़िल्म बन जाती है.

पैसा कमाएँ या क्रिटिकल एक्लेम

अगर मैं ये कहूँ कि बॉक्स ऑफ़िस पर कमाई से मुझे फर्क नहीं पड़ता तो मैं झूठ बोल रहा हूँ. फ़िल्म बनाने में करोड़ों का निवेश होता है, इसलिए पैसा वापस भी मिलना चाहिए. लेकिन आप इसकी आड़ में कुछ भी बनाकर नहीं बेच सकते.

फ़िल्मकार के नाते मुझे एक्सेलेंस और मनोरंजन का ध्यान रखना है, जब वो हो जाएगा तो पैसे अपने आप आ जाएँगे. पैसा आपके काम पर हावी नहीं हो सकता. मैं जब भी नई फ़िल्म करता हूँ तो सबसे पहले मैं ख़ुद को शीशे में देखकर बोलता हूँ कि तुम्हें फेल होने की अनुमति है, मैं सोचता हूँ कि ये फिल्म तो फ्लॉप होने वाली है.

इससे बुरा क्या हो सकता है. कोई फाँसी पर तो लटकाएगा. जब मैने खुद की असफल होने की अनुमति दे दी तो मन से डर निकल जाता है और वो काम में नहीं झलकता. पैसे का क्या है, कभी बनेगा कभी नहीं बनेगा

कौन गंदा करता है नदियाँ और गलियाँ

( लद्दाख में नदी किनारे कूड़ा फैला है और प्लास्टिक के पैकेट हैं)

हुआ क्या था कि रात को कुछ एलियन यहाँ आए थे और यहाँ कूड़ा फैलाकर चले गए. पता नहीं कौन लोग हैं ये जो कूड़ा फेंकते रहते हैं, गाड़ी से हाथ निकलता और चिप्स का पैकट बाहर आता है. आजकल आप कहीं रास्ता नहीं भूल सकते...बस प्लास्टिक के पैकेटों के साथ चलते रहें और मंजिल तक पहुँच जाएँगे. हम ही लोग हैं जो गंदगी फैलाते हैं....और कौन करेगा.

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