फिल्म स्टूडियोज़ः कल चमन था, अब उजड़ा दयार!

  • 6 जनवरी 2014
'झनक-झनक पायल बाजे'
Image caption वी शांताराम की सभी फ़िल्मों की शूटिंग राजकमल स्टूडियो में हुई.

भारतीय सिनेमा ने साल 2013 में अपने सौ साल पूरे कर लिए.

इस दौरान कई अविस्मरणीय फ़िल्में बनीं जिनकी शूटिंग हुई कई फ़िल्म स्टूडियोज़ में.

महबूब, आर के, फ़िल्मिस्तान जैसे स्टूडियो में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई.

इनमें से कई स्टूडियो ने बदलते वक़्त के साथ अपने आपको ढाला और तकनीक तौर पर उन्नत बनाया.

लेकिन जो स्टूडियो ऐसा नहीं कर सके वो आज खस्ताहाल हैं.

(फ़िल्में, जिन पर होगी सबकी नज़र)

एक नज़र कुछ यादगार स्टूडियोज़ के सफर पर.

राजकमल स्टूडियो

Image caption राजकमल स्टूडियो में एक कार्यक्रम के दौरान स्टूडियो के मालिक वी शांताराम और अभिनेता दिलीप कुमार.

जाने माने फ़िल्मकार वी शांताराम ने 1942 में पुणे के प्रभात स्टूडियो को छोड़कर मुंबई के परेल इलाके में बसे वडिआ मूवी टाउन को ख़रीदा और उसे राजकमल कलामंदिर का नाम दिया.

'शकुंतला' वो पहली फ़िल्म थी जिसकी यहां शूटिंग हुई. ये फ़िल्म सिनेमाघरों में तक़रीबन साल भर चली. इस स्टूडियो में वी शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म की शूटिंग यहां की, जैसे 'डॉ.कोटनिस की अमर कहानी', 'कहानी', 'दहेज़', 'झनक झनक पायल बाजे', भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म 'नवरंग' वगैरह.

(200 करोड़ रुपए बना नया पैमाना)

वी शांताराम के अलावा कई और फ़िल्मकारो ने इस स्टूडियो में काम करना शुरू किया. बीआर चोपड़ा ने अपनी फिल्मों की शूटिंग यहां शुरू की. उनके छोटे भाई यश चोपड़ा को वी शांताराम अपने बेटे जैसा मानते थे. यश चोपड़ा ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म 'धूल का फूल' से लेकर आख़िरी फ़िल्म 'जब तक है जान' का कुछ ना कुछ हिस्सा इस स्टूडियो में ज़रूर शूट किया.

सत्यजीत रे, राज कपूर, मनमोहन देसाई, हृषिकेश मुखर्जी, शक्ति सामंत, सुभाष घई और श्याम बेनेगल जैसे कई निर्देशकों ने यहां अपनी फ़िल्मो की शूटिंग की. 1975 की क्लासिक 'शोले' की डबिंग भी राजकमल स्टूडियो में ही हुई. अब इस स्टूडियो की बागडोर वी शांताराम के बेटे किरण शांताराम के हाथों में है. फिलहाल यहां ज़्यादा फ़िल्मों की शूटिंग नहीं होती.

बॉलीवुड के कई कलाकार मुंबई के उपनगरों में बस गए हैं और बेहद दूर स्थित होने की वजह से यहां आना लोग पसंद नहीं करते. इस वजह से यहां उतना काम नहीं होता. लेकिन किरण शांताराम को इससे कोई शिक़ायत नहीं है. वो ख़ुश हैं कि अपने पिता की ऐतिहासिक धरोहर को उन्होंने संभाल कर रखा हुआ है. बस अब वो कोशिश कर रहे हैं अपने पिता द्वारा इस्तेमाल की गई चीज़ों का म्यूज़ियम बनाने की.

फ़ेमस स्टूडियो

Image caption फ़ेमस स्टूडियो में गुरुदत्त की ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग हुई.

देश के बंटवारे के वक़्त ये स्टूडियो रुंगटा परिवार के हिस्से में आया. शुरुआती दौर में गुरु दत्त, जे बी प्रकाश और शक्ति सामंत जैसे कई फ़िल्मकारों के दफ़्तर भी यहीं थे.

(जहां रहते हैं बॉलीवुड सितारे)

यहां 'प्यासा', 'नीलकमल' और 'सीआईडी' जैसी कई फ़िल्मों की शूटिंग भी हुई. लेकिन 1985 के बाद से यहां शूटिंग बहुत कम हो गई.

अब यहां फ़िल्मों की शूटिंग ना के बराबर होती है क्योंकि फ़िल्मसिटी स्टूडियो के अस्तित्व में आने के बाद ज़्यादातर फ़िल्मों की वहीं शूटिंग होती है.

फ़ेमस स्टूडियो में ज़्यादातर टीवी कार्यक्रमों और विज्ञापन फ़िल्मों की शूटिंग ही होती है. 2012 में रिलीज़ हुई ऋतिक रोशन की 'अग्निपथ' और 2013 में आई 'आशिक़ी-2' के कुछ हिस्सों की ज़रूर यहां शूटिंग हुई.

अब यहां पुरानी फ़िल्मों का रिस्टोरेशन यानी पुनरुद्धार होता है. हाल ही में यहां 'पाकीज़ा', 'मिस्टर इंडिया', 'शोले' और 'वो सात दिन' जैसी फ़िल्मों का रिस्टोरेशन किया गया.

फ़िल्मालय स्टूडियो

Image caption राजकमल स्टूडियो में एक रिकॉर्डिंग के दौरान गायक किशोर कुमार के साथ वी शांताराम

मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित इस स्टूडियो की स्थापना शशाधर मुखर्जी ने साल 1958 में की थी. उन्होंने यहां 'दिल देके देखो', 'लव इन शिमला' और 'लीडर' जैसी फ़िल्मों की शूटिंग की.

फ़िलहाल इसकी बागडोर शशाधर मुखर्जी के पोते और अभिनेता जॉय मुखर्जी के बेटे मोन्जॉय मुखर्जी संभाल रहे हैं.

मोन्जॉय बताते हैं कि जब वो छोटे थे तब यहां आते थे उस वक़्त ये बहुत बड़ा स्टूडियो हुआ करता था, जहां घोड़े, शेर, बाघ जैसे जानर भी शूटिंग के लिए उपलब्ध होते थे.

फ़िलहाल यहां फ़िल्मों और टीवी सीरियलों की शूटिंग चलती है. मोन्जॉय मानते हैं कि अगर पुराने स्टूडियोज़ को टिके रहना है तो उन्हें ख़ुद ही फ़िल्म निर्माण में उतरना होगा. वो सिर्फ़ दूसरों की फ़िल्मों के सहारे ज़िंदा नहीं रह सकते.

भट्ट कैंप की ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग फ़िल्मालय में ही होती. है.

नटराज स्टूडियो

Image caption धर्मेंद्र, जॉय मुखर्जी (फ़िल्मालय स्टूडियो के मालिक), फ़िरोज़ ख़ान, मनोज कुमार और शशि कपूर.

पहले मॉडर्न स्टूडियो के नाम से जाने जाना वाला इस स्टूडियो को 1968 में शक्ति सामंत, आत्माराम, प्रमोद चक्रवर्ती, रामानंद सागर और एफ़ सी मेहरा ने साथ मिलकर ख़रीद लिया और नाम दिया नटराज स्टूडियो.

(गोवा में ज़िंदा है गब्बर)

इन पांच फ़िल्मकारों की फ़िल्मों का काम यहीं पर होता था. कई मशहूर फ़िल्में जैसे 'आराधना', 'आरज़ू', 'जुगनू' और 'तुमसे अच्छा कौन है' की शूटिंग नटराज में ही हुई.

शक्ति सामंत के बेटे अशीम सामंत बताते हैं कि साल 2000 के आस-पास आर्थिक तंगी की वजह से ये स्टूडियो बेचना पड़ा.

इसके आख़िरी दौर में यहां अक्षय कुमार की फ़िल्म 'बारूद' और टीवी सीरियल 'अंतरिक्ष' की शूटिंग हुई थी.

अशीम फ़िलहाल अपने पिता शक्ति सामंत के बैनर को किसी कॉर्पोरेट हाउस के साथ मिलकर पुनर्जीवित करना चाहते हैं.

फ़िल्म सिटी

Image caption अब ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग फ़िल्म सिटी स्टूडियो में होती है.

1977 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा अधिकृत ज़मीन पर बना ये स्टूडियो मुंबई के उपनगर गोरेगांव में स्थित है.

अब ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग यहीं पर होती है. इसे दादा साहब फालके नगर भी कहा जाता है.

इस स्टूडियो में कई रिकॉर्डिंग स्टूडियोज़, थिएटर्स, तालाब, बगीचे और एक बेहद बड़ा खुला मैदान है.

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