500 करोड़ की 'धूम' और सिर्फ़ 12 करोड़ की 'शोले'

शोले बनाम धूम-3

साल 1975 में रिलीज़ हुई थी 'शोले'. इस फ़िल्म ने उस वक़्त बॉक्स ऑफ़िस कमाई के नए कीर्तिमान बनाए थे. फ़िल्म मुंबई के एक सिनेमाहॉल में लगातार पांच साल तक चली. भारत के बाक़ी शहरों में भी फ़िल्म ने कई साल तक तहलका मचाए रखा और फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ उस दौर में तक़रीबन 12 करोड़ रुपए की कमाई की जो कि एक इतिहास था.

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कई साल तक कोई फ़िल्म 'शोले' की कमाई के आस-पास भी नहीं पहुंची. अब साल 2013 की बात करें. यशराज बैनर की 'धूम-3' ने रिलीज़ के 20 दिनों के अंदर ही बॉक्स ऑफ़िस विशेषज्ञों के मुताबिक़ कुल मिलाकर 500 करोड़ रुपए तक कमा लिए.

एक और उदाहरण पर गौर फ़रमाएं. यशराज बैनर की ही फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' पिछले 18 सालों से मुंबई के एक सिनेमाहॉल में लगातार चल रही है.

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विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसने अपनी रिलीज़ के दिन से लेकर अब तक मुंबई शहर और उसके उपनगरों में कुल मिलाकर तक़रीबन 12.5 करोड़ रुपए कमाए. वहीं 'धूम-3' ने इससे कहीं ज़्यादा का कारोबार अकेले मुंबई में सिर्फ़ एक सप्ताह में ही कर लिया.

क्यों बदला अर्थशास्त्र

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दरअसल टिकटों की क़ीमत में बेतहाशा बढ़ोत्तरी और हर छोटे बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्सेस के उदय के बाद से फ़िल्मों का व्यापार बहुत तेज़ी से बढ़ा.

पहले जहां एक सिनेमाहॉल में फ़िल्मों के चार शो हुआ करते थे अब एक मल्टीप्लेक्स में किसी बड़ी फ़िल्म के 28 से 30 शो तक होते हैं.

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यानी पुराने समय में किसी सिनेमाहॉल के एक हफ़्ते में हुए शोज़ की कुल संख्या आज एक मल्टीप्लेक्स के एक दिन में हुए शोज़ की संख्या के बराबर है.

मशहूर फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा के मुताबिक़, "पहले जहां फ़िल्में 200 से 250 प्रिंट्स के साथ रिलीज़ होती थीं वहीं आज धूम-3 जैसी फ़िल्में 4,500 प्रिंट्स के साथ रिलीज़ होती हैं. टिकटों की क़ीमत भी 10-15 रुपए से बढ़कर अब 500 रुपए या इससे भी ज़्यादा पहुंच चुकी है."

ओवरसीज़

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अब बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए भारत से बाहर का भी बाज़ार एक बहुत बड़ा मार्केट बन गया है. जहां 'धूम-3' जैसी फ़िल्म ने ओवरसीज़ में 150 करोड़ रुपए से ज़्यादा की कमाई की वहीं 80 के दशक में अगर कोई फ़िल्म विदेश में एक करोड़ रुपए भी कमा ले तो उसे बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता था.

विशेषज्ञ यश चोपड़ा और करण जौहर जैसे फ़िल्मकारों को क्रेडिट देते हैं कि उन्होंने भारतीय फ़िल्मों के लिए इस नए बाज़ार को तलाशा जिसे ओवरसीज़ मार्केट कहा जाता है.

अब अमरीका, ब्रिटेन ही नहीं बल्कि यूएई जैसे नए बाज़ार तैयार हो रहे हैं. यहां तक कि नेपाल जैसे छोटे देश में भी 'धूम-3' ने तक़रीबन छह करोड़ रुपए कमाए.

फ़िल्मों की उम्र छोटी हो गई

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लेकिन इस सारे बदलाव से एक बड़ा नुक़सान हुआ. फ़िल्मों की उम्र छोटी होने लगी. पहले फ़िल्में सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली और डायमंड जुबली तक मनाती थीं.

हफ़्ते दर हफ़्ते, महीने दर महीने फ़िल्में सिनेमाहॉल की शोभा बढ़ाती रहती थीं. लेकिन अब वो दौर नहीं रहा.

कहने को 'धूम-3' ने पांच सौ करोड़ रुपए कमाए लेकिन ये बॉक्स ऑफ़िस पर कुल जमा तीन हफ़्ते में ही दम तोड़ गई. यानी इसे जितनी कमाई करनी थी वो कर चुकी.

कोमल नाहटा कहते हैं, "दर्शकों की याददाश्त कमज़ोर हो रही है. कितनी भी बड़ी ब्लॉकबस्टर क्यों ना हो लोग दो-तीन हफ़्ते में उसे भुलाकर नई फ़िल्म का इंतज़ार करने लगते हैं. धूम-3 गई अब जय हो का इंतज़ार हो रहा है."

पहले फ़िल्मों के लिए 'री-रन' जैसी अवधारणा भी हुआ करती थी. यानी फ़िल्म की पहली रिलीज़ के कुछ सालों बाद वो दोबारा रिलीज़ होती थी और फिर उससे कमाई होती थी.

(क्या लौट आए हैं छोटी फ़िल्मों के दिन ?)

कोमल नाहटा बताते हैं कि 'शोले' बार बार रिलीज़ होकर पैसे कमाती रही. हाल ही में 'शोले' को थ्री डी में बदलकर रिलीज़ किया गया और इसने फिर से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

कोमल नाहटा कहते हैं, "अब शुरुआत में ही फ़िल्म इतने प्रिंट्स के साथ रिलीज़ होती है कि इसके री-रन का सवाल ही नहीं उठता. चेन्नई एक्सप्रेस, कृष-3 या धूम-3 को जितने पैसे कमाने थे वो कमा चुकी. अब इनके री-रन की कोई गुंजाइश नहीं."

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लेकिन इस दौर में भी ऐसा नहीं है कि सभी फ़िल्मों की आयु ही कम हो गई है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ साल 2009 में रिलीज़ हुई आमिर ख़ान की फ़िल्म 'थ्री इडियट्स' एक ऐसी फ़िल्म थी जिसका व्यापार हफ़्ते दर हफ़्ते बढ़ता रहा.

पहले सप्ताह 'थ्री इडियट्स' ने क़रीब 40 करोड़ रुपए कमाए. जो कि 'चेन्नई एक्सप्रेस', 'धूम-3' और 'कृष-3' के पहले सप्ताह के कारोबार से बहुत कम था. लेकिन उसके बावजूद फ़िल्म की कमाई लगातार बढ़ती रही और इसने दो सौ करोड़ रुपए से ऊपर का कारोबार किया.

कोमल नाहटा के मुताबिक़ फ़िल्म अच्छी हो तो वो कारोबार करने के साथ-साथ लंबे समय तक याद रखी जाएगी.

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