फ़िल्म रिव्यू: 'जय हो'

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रेटिंग: **

इरॉस इंटरनेशनल और सोहैल ख़ान प्रोडक्शंस की 'जय हो' कहानी है एक ऐसे शख़्स की जो इस दुनिया को बेहतर बनाना चाहता है. इस काम में उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उनसे वो कैसे निपटता है यही फ़िल्म की कहानी है.

जय अग्निहोत्री (सलमान ख़ान) एक बहुत दिलेर और सिद्धांतवादी आर्मी अफ़सर है. वो अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अवमानना के आरोप में सेना से निलंबित कर दिया जाता है.

(रिव्यू: 'डेढ़ इश्क़िया')

जय, आसपास के लोगों की पीड़ा और उन पर हो रहे अत्याचार से बेहद परेशान रहता है और लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है. एक दफ़ा एक विकलांग लड़की (जेनेलिया डिसूज़ा), उसके सामने ख़ुदकुशी कर लेती है जिससे जय बेहद दुखी हो जाता है. उस लड़की की वो पहले मदद कर चुका होता है.

जब उस लड़की के भाई को अपनी बहन की मौत के पीछे राज्य के गृहमंत्री की बेटी पर शक़ होता है और वो उसके ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराता है. इससे नाराज़ होकर गृहमंत्री दशरथ सिंह (डैनी) उसके भाई को मरवा डालता है.

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जय, कमज़ोर, लाचार लोगों की मदद करने के मिशन में निकल पड़ता है और इसी वजह से गृहमंत्री समेत कई शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी मोल ले लेता है.

(रिव्यू : 'मिस लवली')

जहां एक ओर आम आदमी उसके साथ होता है वहीं भ्रष्ट राजनेता और दूसरे शक्तिशाली लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं. क्या अंत में जय, इन लोगों के चंगुल से लोगों को बचा पाता है, यही फ़िल्म की कहानी है.

बिखरा स्क्रीनप्ले

'जय हो', तेलुगू फ़िल्म 'स्तालिन' का रीमेक है. 'स्तालिन', ख़ुद हॉलीवुड फ़िल्म 'पे इट फ़ॉरवर्ड' से प्रेरित है. एआर मुरुगदॉस की लिखी कहानी दिलचस्प है और देश में चल रहे वर्तमान घटनाक्रम से काफ़ी मेल खाती हुई है. लेकिन दिलीप शुक्ला का लिखा स्क्रीनप्ले ढीला है.

इंटरवल से पहले के हिस्से में तो ऐसा लगता है कि कहानी में कोई तारतम्य ही नहीं है. बस सीन्स को एक दूसरे से जोड़ दिया गया है. फ़िल्म में ढेर सारे किरदार हैं और कई किरदारों को तो ठीक से परिभाषित भी नहीं किया गया.

(रिव्यू:'शोले-3डी')

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फ़िल्म देखकर लगता है कि निर्देशक किसी जल्दबाज़ी में हैं और बिखरी फ़िल्म को समेटने की कोशिश कर रहे हैं. जेलेनिया डिसूज़ा की ख़ुदकुशी के पीछे की वजह ठीक से बताई ही नहीं गई है. और इसी वजह से दर्शकों को उनसे सहानुभूति नहीं हो पाती.

सलमान ख़ान का अच्छे नागरिक होने वाला प्लॉट भी ठीक से नहीं उभारा गया. इस वजह से लोगों को फ़िल्म प्रभावी नहीं लगेगी.

हालांकि फ़िल्म में कुछ कॉमिक और ड्रामेटिक सीन बहुत अच्छे बन पड़े हैं. सलमान ख़ान और डेज़ी शाह के कुछ सीन और कुछ एक्शन दृश्य सचमुच बहुत जानदार हैं.

साथ ही फ़िल्म के आख़िर के 20-25 मिनट बहुत प्रभावशाली हैं और दर्शकों को बांधे रखते हैं. क्लाईमेक्स अच्छा है. लेकिन दिलीप शुक्ला के लिखे संवादों में दम नहीं है. हां, हास्य दृश्यों में संवाद अच्छे हैं.

अभिनय

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सलमान ख़ान बहुत अच्छे लगे हैं. उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया है. अपना किरदार उन्होंने बड़ी सहजता से निभाया है और कई एक्शन दृश्यों में उनके प्रशंसक ताली बजाने पर मजबूर हो जाएंगे.

(रिव्यू: 'मिस्टर जो भी करवा लो')

उनकी लोकप्रियता देखते हुए इस फ़िल्म में भी एक सीन है जिसमें उन्होंने शर्ट उतारी है और हमेशा की तरह लोगों को ये सीन भी बहुत पसंद आएगा.

नवोदित अभिनेत्री डेज़ी शाह कैमरे के सामने सहज लगी हैं. हालांकि वो ग्लैमरस नहीं हैं लेकिन उन्होंने ठीक-ठाक काम किया है. सलमान ख़ान की बहन के रोल में तब्बू भी अच्छी रही हैं लेकिन वो फ़िल्म में फ़्रेश नहीं लगी हैं.

खलनायक के रोल में डैनी बेहतरीन रहे हैं. नादिरा बब्बर ने कई जगह लोगों को हंसाया है. भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के रोल में आदित्य पंचोली और शरद कपूर को बहुत सीमित मौक़े मिले हैं.

क्लाईमेक्स में सुनील शेट्टी की मौजूदगी इसे और प्रभावी बना देती है. संतोष शुक्ला ने गुंडे के रोल में अपने बॉलीवुड करियर की बड़ी ज़बरदस्त शुरुआत की है. बाकी कलाकार भी ठीक हैं.

निर्देशन

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सोहैल ख़ान का निर्देशन कहीं कहीं पर अच्छा है. एक्शन दृश्यों में जहां वो सटीक रहे हैं वहीं नाटकीय और भावुक दृश्यों को फ़िल्माने में वो विफल रहे.

(रिव्यू:'धूम-3')

साजिद-वाजिद, देवी श्री प्रसाद और अमल मलिक का संगीत बहुत निराशाजनक है. सलमान ख़ान की फ़िल्म में एक भी सुपरहिट गाने का ना होना उनके प्रशंसकों को बहुत निराश करेगा. फ़िल्म के एक्शन और स्टंट ज़रूर कमाल के हैं.

कुल मिलाकर 'जय हो' एक कमज़ोर स्क्रीनप्ले वाली फ़िल्म है. लेकिन सलमान ख़ान पूरी फ़िल्म में छाए हैं.

सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में सलमान के प्रशंसकों को फ़िल्म पसंद आएगी. लेकिन मल्टीप्लेक्सेस में फ़िल्म को मिश्रित प्रतिक्रिया मिलेगी.

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