हर्फ-ब-हर्फ हरफ़न मौला – आई एस जोहर

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एक लफ्ज़ है – हरफ़न मौला. इस एक लफ्ज़ को अगर किसी नाम में बदला जाए तो एक नाम हो सकता है – आईएस जोहर. पूरा नाम इन्द्र सेन जोहर. पैदाइश : पंजाब के चकवाल जिले की तलागंग तहसील (अब पाकिस्तान में)16 फरवरी 1920 को. 10 मार्च 1984 को इस दुनिया से रुख़्सत हुए. मगर जाने से पहले अपने कारनामों की बदौलत एक यादगार इंसान बन गए.

सबसे पहले एक मशहूर फ़िल्म कलाकार, जो कभी फ़िल्म का हीरो तो कभी हास्य अभिनेता की तरह पर्दे पर नज़र आता. लेकिन पर्दे से परे वे लेखक,निर्माता-निर्देशक भी थे.

असल में उनके फ़िल्मी सफर की शुरूआत ही प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक रूप के शोरी की फ़िल्म ‘एक थी लड़की’ के लेखक के तौर पर ही हुई. इसी फ़िल्म में हास्य अभिनेता मजनू के साथ जोड़ी बनाकर एक भूमिका भी निभाई. अगले 35 बरस तक जोहर पर्दे पर लगातार छाए रहे.

दो एमए और एलएलबी

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Image caption आईएस जोहर को जॉनी मेरा नाम फ़िल्म में तिहरी भूमिका के लिए फ़िल्म फ़ेयर अवॉर्ड मिला था.

दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना, जॉय मुखर्जी जैसे कई सितारों के साथ हास्य भूमिकाओं के अलावा किशोर कुमार के साथ ‘बेवक़ूफ’(1960), ‘अकलमंद’(1966) और ‘श्रीमान जी’ (1968) और महमूद के साथ ‘जोहर-महमूद इन गोआ’ (1965), ‘जोहर-महमूद इन हांगकांग’ (1971) में जोड़ी बनाकर मुख्य भूमिकाओं में भी काम किया.

अपनी फ़िल्म ‘जोहर-महमूद इन गोआ’ की कामयाबी से इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने अपने ही नाम से दो और फ़िल्में ‘जोहर इन काश्मीर’ (1966) और ‘जोहर इन बाम्बे’ भी बना डालीं. दोनो ही फ़िल्में फ्लॉप हुईं.

अलबत्ता विजय आनंद के निदेशन में बनी सुपर हिट फ़िल्म ‘जॉनी मेरा नाम’(1970) में अपनी तिहरी हास्य भूमिका के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवार्ड ज़रूर मिला. इस फ़िल्म में उनके तीनों रूप ‘पहलाराम’, ‘दूजाराम’ और ‘तीजाराम’ आज भी दर्शकों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं.

इसी तरह फ़िल्म ‘शागिर्द’ में जॉय मुखर्जी के साथ उनकी अधेड़ उम्र के आशिक़ की भूमिका भी यादगार है.

फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत ‘बड़े मियां दीवाने, ऐसे न बनो/हसीना क्या चाहे, हमसे सुनो’ के बजते ही जोहर का चेहरा नज़र आने लगता है.

मगर फ़िल्मों में अभिनय करने भर से कोई हरफ़न मौला कहलाने का हक़दार नहीं हो जाता.

उसके लिए बहुत कुछ ऐसा करना होता है जो अमूमन नहीं होता. अब जैसे आईएस जोहर ने दो बार एमए किया. पहली बार अर्थशास्त्र में, दूसरी मर्तबा राजनीति शास्त्र में.

फिर भी दिल नहीं माना तो वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए एलएलबी भी कर डाला.

पेशा चुनने का मौका आया तो पेशा इख्तियार किया फ़िल्म लेखक और अभिनेता का. पहला कदम सही पड़ा तो फिर डायरेक्टर भी बन गए.

यश चोपड़ा के गुरू

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Image caption शागिर्द आईएस जोहर के लाजवाब अभिनय के लिए हमेशा याद किया जाता है.

मौका दिया उस दौर के धुरंधर निर्माता फिल्मिस्तान के एस मुखर्जी ने उन्हें फ़िल्म ‘श्रीमती जी (1952)’ और उसके बाद ‘नास्तिक’ के लेखन-निर्देशन का. ‘नास्तिक’ की ज़बरदस्त कामयाबी ने जोहर को स्थापित किया.

इस जगह एक बात का ज़िक्र करना मुनासिब होगा. फ़िल्म ‘नास्तिक’ की कहानी 1947 के बंटवारे में विस्थापित होकर आए लोगों के दुख-दर्द की कहानी है, जो असल में जोहर के अपने निजी अनुभवों की ही कहानी पर ही आधारित है.

फ़िल्म का नायक जीवन की उथल-पुथल से घबराकर ईश्वर में आस्था खो देता है और नास्तिक बन जाता है. विख्यात निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा इस फ़िल्म में जोहर के असिस्टेंट डायरेक्टर थे.

दरअसल, यश चोपड़ा के बड़े भाई बीआर चोपड़ा फ़िल्म जगत से निराश होकर पत्रकारिता की ओर लौटने की तैयारी में थे तब जोहर ने, जो कि लाहौर के दिनों से उनके मित्र थे, उन्हें अपनी लिखी एक कहानी देकर फ़िल्म बनाने का हौसला दिया था.

किस्मत से वह फ़िल्म बेहद कामयाब हुई और बीआर चोपड़ा के पांव पूरी तरह जम गए. इस फ़िल्म का नाम था ‘अफ़साना’ (1951). फ़िल्म के हीरो थे अशोक कुमार.

इस फ़िल्म की कामयाबी से सीनियर चोपड़ा साहब जोहर की प्रतिभा से इतने मुतासिर हो गए कि उन्होंने अपने छोटे भाई को बजाय अपना असिस्टेंट बनाने के जोहर के पास भेज दिया.

अब यह दीगर बात है कि यश चोपड़ा बाद में बड़े भाई की शागिर्दी करके ही यश चोपड़ा बन पाए. लेकिन उन्होंने हमेशा इस बात को याद रखा कि जोहर उनके पहले गुरू थे.

इश्क़ और राजनीति

जोहर कुछ-कुछ शौक से और कुछ-कुछ आदत से शायद सब कुछ ही करते थे. मसलन इश्क़.

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Image caption आईएस जोहर की पहली फ़िल्म थी- एक थी लड़की. इसे उन्होंने लिखा भी था और इसी में पहली बार अभिनय भी किया था.

उन्होंने उम्र भर अनगिनत इश्क़ किए और शायद आधा दर्जन शादियां भी कीं. पहली पत्नी रमा बंस से भले ही आख़िर तक प्रेम का नाता बना रहा लेकिन अलगाव काफ़ी पहले हो गया था.

फिर उनकी ज़िंदगी में प्रोतिमा बेदी भी आईं. प्रसिद्ध कैमरामैन जाल मिस्त्री की पत्नी को भी वे एक क्रिकेट मैच देखते-देखते ले उड़े.

याद पड़ता है कि एक बार बातचीत में उन्होंने बताया था कि जब वे लाहौर के एफसी कालेज में छात्र थे तो कोई लड़की उन्हें घास नहीं डालती थी.

वजह यह कि उस वक़्त वे काफ़ी दुबले-पतले थे और हड्डियों का ढांचा भर नज़र आते थे. तब उनकी नाक ज़रूरत से ज़्यादा बाहर भागती हुई लगती थी.

अपनी इसी कमज़ोरी को ढकने के लिए और लड़कियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया. पहले कुछ लेख और फिर नाटक लिखना शुरू किया.

ज़ाहिर है कि वे अपने मक़सद में कामयाब हुए. ‘कामयाब न होता तो लिखता ही क्यों रहता?’ उन्होंने कहा था.

उनकी शुरुआती फ़िल्में उनके इस बयान की ताईद करती हुई लगती हैं. साठ के दशक में कामयाबी की चर्बी जिस्म पर चढ़ी तो हुलिया कुछ बेहतर हुआ.

और दीगर कारनामों में जोहर क्रिकेट प्रेमी उर्फ क्रिकेट खिलाड़ी भी थे. जब-जब किसी सामजिक कार्य में मदद के लिए फ़िल्मी सितारों के क्रिकेट मैच होते तो जोहर अपनी चटपटी कमेंट्री और ठहाकेदार बैटिंग और बॉलिंग से रंग जमा देते थे. लेकिन भारतीय टीम के मैच बड़े संजीदा तरीके से देखते और टीम का हौसला भी बढ़ाते थे.

क्रिकेट से भी ज़्यादा उनकी दिलचस्पी थी राजनीति में.

नेताओं का मखौल उड़ाने में उन्हें बहुत मज़ा आता था. अपनी फ़िल्मों के ज़रिए वो देश के हालात पर फ़िल्में बनाकर टिप्पणी करते थे.

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Image caption आईएस जोहर ने अपने दौर के सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया. फ़िल्म बेवकूफ़ में किशोर कुमार के साथ.

गोआ की आज़ादी की लड़ाई पर ‘जोहर-महमूद इन गोआ’ बनाई ,तो कश्मीर के मसले पर ‘जोहर इन काश्मीर’.

बांग्लादेश की बात आई तो ‘जय बांग्ला देश’ बना डाली. इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी से नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए ‘नसबंदी’(1978) बना डाली.

यह सारी फ़िल्में फ़िल्म निर्माण के स्तर की दृष्टि से न तो अच्छी फ़िल्में थी और न ही कामयाब फ़िल्में लेकिन जोहर का अपना अंदाज़ था और बात कहने की ज़िद थी.

इसी बात कहने की ज़िद की ख़ातिर ही वे अक्सर चुनाव में भी स्वतंत्र उम्मीदवार की हैसियत से खड़े हो जाते थे और अपने भाषणों और बयानों से राजनेताओं को दुखी करते रहते थे.

हॉलीवुड

वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध फ़िल्म वालों ने जनता पार्टी को मदद की. जब जनता सरकार ने भी निराश किया तो जोहर के निशाने पर समाजवादी नेता राज नारायण आ गए, जो उस समय सरकार में मंत्री भी थे.

जोहर जब-तब उनको अपने बयानों से छेड़ते थे. उन्होने घोषणा कर दी कि जहां से भी राज नारायण चुनाव लड़ेंगे वे उनके विरुद्ध खड़े होंगे.

नेताजी के नाम से लोकप्रिय राजनारायण जी उनसे काफ़ी परेशान रहे. यह और बात है कि फ़िल्मों में उनकी कॉमेडी पर हंसने वालों ने चुनाव में उनको कभी गंभीरता से नहीं लिया. यह भी सच है कि वे ख़ुद भी अपने चुनाव को गंभीरता से नहीं लेते थे.

अंग्रेज़ी फ़िल्म पत्रिका ‘फ़िल्मफेयर’ में उनका सवाल-जवाब का कॉलम ‘क्वेश्चन बाक्स’ बेहद पापुलर था. 1978 में जब मेनका गांधी ने ‘सूर्या’ नाम से एक पत्रिका शुरू की तो उसमें आईएस जोहर का एक कॉलम भी छपता था ‘री-राईटिंग आफ़ द हिस्ट्री’ जिसमें वे तात्कालिक राजनतिक-सामाजिक घटनाओं पर व्यंग लिखते थे.

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Image caption आईएस जोहर हॉलीवुड की फ़िल्म लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया में.

उन्होने ख़ुद को भले ही कभी गंभीरता से न लिया हो लेकिन हॉलीवुड ने उनको बड़ी गंभीरता से लिया. इसी कारण उनको ‘हैरी ब्लैक’ (1958), ‘नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर’ (1959), ‘लारेंस आफ़ अरेबिया’ ( 1962) और ‘डेथ आन द नाईल’ (1978) जैसी फ़िल्मों में कास्ट किया.

जिस वक़्त पाकिस्तान में जनरल ज़िया-उल-हक़ ने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का तख़्ता पलट कर फांसी देने का षड़यंत्र रचा तब इस विषय पर आईएस जोहर ने एक नाटक लिखा था ‘भुट्टो’ जो बहुत चर्चित भी हुआ और प्रशंसा भी पाई. इस नाटक के अलावा जोहर ने लगभग एक दर्जन और भी नाटक लिखे लेकिन वे इतने चर्चित नहीं हुए.

10 मार्च 1984 को सात महीने की लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया. मरने से पहले तक उनके सेंस आफ ह्यूमर में कोई कमी नहीं आई.

मृत्यु के दो-तीन दिन पहले उन्होंने अपने बेटे अनिल और बेटी अंबिका को बुलाकर कहा था – ‘मेरे मरने की ख़बर छपे तो मुझे अख़बार भेजना मत भूलना.’

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