सत्यमेव जयते: सीज़न नया, सवाल पुराना

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रविवार बेफ़िक्री से भरा दिन होता है. ना बच्चों के स्कूल की चिंता ना आफ़िस जाने का टेंशन. हां कुछ बिन बुलाए मेहमानों के आ जाने का डर ज़रूर बना रहता है.

आमिर ख़ान यही कहते हुए दोबारा नज़र आ रहे हैं इंडियन टेलीविज़न स्क्रीन पर. सत्यमेव जयते के दूसरे सीज़न की शुरूआत 2 मार्च से हो चुकी है.

पहले संस्करण की ज़बरदस्त सफलता के बाद दूसरे सीज़न का आना तो निश्चित था ही लेकिन ध्यान देने वाली बात ये थी कि पिछली बार की तरह इस बार ये शो लोगों में उतना लोकप्रिय होता है या नहीं.

इस कार्यक्रम ने पिछली बार कई महत्वपूर्ण मुद्दों को छुआ और एक बहस को जन्म भी दिया लेकिन आमिर को विरोध और आलोचना भी झेलनी पड़ी. आलोचकों ने कहा कि ये कार्यक्रम एक तरफ़ा ढंग से मुद्दों को पेश करता है.

कितना है दम

इस बार के कार्यक्रम में कितना दम है इस सवाल के जवाब में जानी-मानी फ़िल्म अभिनेत्री और वर्तमान में एक टैलेंट शो में निर्णायक की भूमिका में दिखने वाली किरण खेर कहती हैं कि इस शो में जान नहीं है.

किरण का मानना है कि एक चैट शो में जब तक टकराव नहीं होगा तो उसमें मज़ा नहीं आएगा. अगर आप दर्शकों को बांध नहीं पा रहे हैं तो शो बोरियत भरा हो जाता है. शो एकतरफ़ा नज़र आता है.’’

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Image caption सत्यमेव जयते के पहले सीज़न ने ख़ासी लोकप्रियता बटोरी थी लेकिन शो पर एकतरफ़ा होने के आरोप भी लगे.

किरण अपना तर्क रखते हुए कहती हैं कि अगर आप यह कहते हैं कि ‘‘हमारे देश में खाप प्रथा नहीं होनी चाहिए तो आपको उन लोगों को भी बुलाना चाहिए जो कहते हैं कि खाप प्रथा होनी चाहिए.’’

किरण तो यहां तक कहती हैं कि जब ये शो आता है तो वो सो जाती हैं क्योंकि ये बहुत उबाऊ है.

हालांकि आमिर इस कार्यक्रम के प्रसारण से पहले प्रेस से बातचीत में साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि उन्हें संतुलन बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

आमिर कहते हैं हमारे सामने जो सच्चाई आती है हम वो रखते हैं. अगर बैलेंस करना ग़लत है तो हम उस चीज़ को नहीं बताते हैं. हो सकता है आप हमारी बात नहीं मानें. ठीक है मत मानिए. एक मुद्दे पर कितना संतुलन है हम ये नहीं सोचते.

रविवार है कितना मुनासिब

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Image caption अभिनेत्री किरन खेर 'सत्यमेव जयते' को एक उबाऊ शो कहती हैं.

इस कार्यक्रम को लेकर एक सवाल ये भी रहा है कि क्या रविवार की सुबह इस कार्यक्रम के लिए सही समय है.

हफ़्ते भर के बाद आई इस छुट्टी के दिन लोग भारी-भरकम मुद्दों पर होने वाली चर्चा में शायद हिस्सा ना लेना चाहें.

पिछली बार का अनुभव शायद इस शक़ के लिए कोई मज़बूत आधार नहीं देता लेकिन इस पर प्रतिक्रिया मिली-जुली है.

टीवी शो ‘दिया और बाती’ की संध्या कहती हैं कि ‘हमारे देश के नौजवानों को इस तरह के कार्यक्रमों की ज़रूरत है. हर रविवार को पूरे परिवार के साथ ये शो देखना चाहिए ताकि वे इस पर बातचीत कर सकें."

इसके विपरीत टीवी अभिनेता शरद मल्होत्रा का कहना है कि रविवार के दिन वो बिल्कुल तनावमुक्त रहना चाहते हैं.

शरद का मानना है, ‘‘वो वक्त गया जब हम सबके परिवार इकट्ठे होकर महाभारत और रामायण देखते थे. नौजवान लोग अब शनिवार की पार्टी के बाद इतवार को देर से सोकर उठते हैं तो इस बात का ध्यान रखते हुए अगर इस कार्यक्रम के वक़्त में थोड़ा बदलाव किया जाएगा तो शायद और ज़्यादा दर्शक इससे जुड़ पाएंगे.’’

ऊंची दुकान, फीके पकवान ?

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Image caption टीवी अभिनेत्री दीपिका सिंह कहती हैं कि युवाओं को इस तरह के कार्यक्रम की ज़रूरत है.

आमिर ख़ान का नाम किसी कार्यक्रम के साथ जुड़ना ही उसकी तरफ़ लोगों को खींचने के लिए काफ़ी है.

लेकिन जिस तरह की प्रतिक्रिया सत्यमेव जयते को मिली उसके चलते ये सवाल भी उठा कि क्या कार्यक्रम को ज़रूरत से ज़्यादा पब्लिसिटी मिल रही है.

टीवी प्रडयूसर सुधीर शर्मा कहते हैं, ‘‘कोई भी जब बदलाव लाने की कोशिश करता है तो उसे समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है. वही आमिर के साथ भी हो रहा है.’’

अभिनेता आरिफ़ ज़कारिया का मानना है, ‘‘शो के अंतर्गत जो वादे आमिर या कोई और कर रहा है, उन्हें शो के बाहर निभाना बहुत बड़ी बात है.’’

जाने-माने टीवी प्रोड्यूसर यश पटनायक का मानना है कि चैनल औऱ आमिर दोनों ने एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का काम लिया है. ऐसे शो आने के बाद लोगों के अंदर जो परिवर्तन की लहर जाग गई है उसको तोड़ पाना मुश्किल है.

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