फ़िल्म रिव्यू: 'आंखों देखी'

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रेटिंग **

मिथ्या टॉकीज़ की 'आंखों देखी' दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी है.

राजा उर्फ़ बाऊजी (संजय मिश्रा) और ऋषि (रजत कपूर) दोनों भाई हैं और दिल्ली में एक छोटे से घर में रहते हैं.

बाऊजी की पत्नी हैं पुष्पा(सीमा पाहवा), उनकी बेटी रीटा (माया साराओ) और एक बेटा शम्मी(चंद्रचूड़ राय). ऋषि की पत्नी हैं लता (तरनजीत कौर) और एक बेटा अशोक (चैतन्य महावर).

रीटा एक लड़के अज्जू (नमित दास) से प्यार करती है पर रीटा का परिवार इसके बिलकुल ख़िलाफ़ हैं क्योंकि लोग अज्जू के बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं.

(रिव्यू:'क्वीन')

परिवार के बड़े, रीटा को अज्जू से मिलने के लिए मना करते हैं और उससे दूर रहने के लिए कहते हैं पर रीटा के पिता बाऊजी सबको कहते हैं कि वो अज्जू के बारे में कही गई बातों पर यक़ीन न करें और आँखों देखी चीज़ों पर ही विश्वास करें.

धीरे धीरे वो भी सिर्फ़ आंखों देखी चीज़ पर विश्वास करना शुरू कर देते हैं. उनके इस सोच से क्या क्या हलचल मचती है? यही फ़िल्म की कहानी है.

पटकथा और संवाद

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रजत कपूर की कहानी थोड़ी सी भटक जाती है क्योंकि वो अलग-अलग समय पर अलग अलग दिशाओं में चली जाती है.

बाऊजी की 'आंखों देखी' वाली सोच बीच में सांकेतिक भाषा में बदल जाती है. वो जुआ खेलना क्यों शुरू कर देते हैं और वो उसके लिए इतनी जल्दी मान कैसे जाते हैं ये थोड़ा अटपटा सा लगता है.

पटकथा को रजत कपूरने बहुत ही वास्तविक रखा है. फ़िल्म में कई हास्य के पल भी हैं और कहानी दिल को छू जाती है.

पटकथा से ये साफ़ हो जाता है कि निर्देशक रजत कपूर ने मध्यम वर्गीय परिवार की बारीकियों पर बहुत अच्छे से समझा है क्योंकि उन्होंने एक मध्यम वर्गीय परिवार के रहन सहन, उनकी डर और उनकी भावनाओं को बहुत अच्छे तरीक़े से दिखाया है.

( रिव्यू : 'बेवकूफ़ियां')

संवाद जो ख़ुद रजत कपूर ने लिखे हैं बेहद कमाल के हैं और फ़िल्म की कहानी और मूड के साथ बिलकुल फ़िट बैठते हैं.

अभिनय और निर्देशन

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फ़िल्म में सभी कलाकारों ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. संजय मिश्रा ने 'बाऊजी' के किरदार में बहुत ही कमाल के लग रहे हैं.

रजत कपूर ने अपने सादे अभिनय से 'ऋषि' के किरदार को पूरी तरह जीवंत कर दिया है. कुल मिलकर हर एक कलाकार ने अपने स्वाभाविक अभिनय द्वारा एक मध्यम वर्गीय परिवार को अच्छी तरह दिखाया है.

रजत कपूर ने निर्देशन में भी काफ़ी अच्छा काम किया है पर क्योंकि फ़िल्म की कहानी एक ही विचारधारा वाली है इसीलिए हो सकता है कि ये फ़िल्म समाज के किसी एक ही तबक़े को ज़्यादा लुभाए.

कुल मिलाकर 'आंखों देखी' को बहुत ही अच्छी तरह से बनाया गया है पर ये अपनी विचारधारा के चलते ज़्यादा दर्शक नहीं जुटा पायेगी.

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