अब भी चल रही है शेक्सपियर की नौटंकी

विलियम शेक्सपियर

ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब उसकी कठपुतलियां. पर कई लोगों के लिए रंगमंच ही उनकी ज़िंदगी है और उनका भगवान सिर्फ़ एक ही है- विलियम शेक्सपियर.

27 मार्च को 'वर्ल्ड थिएटर डे' है और हमने यह जानने की कोशिश की कि भला क्यों आज के दौर में भी दर्शकों को क्यों लुभा रहे हैं शेक्सपियर के नाटक.

(कौन हैं ये नाटककार?)

विलियम शेक्सपियर के नाटकों को भारत लाने वाले अंग्रेज़ थे. यूरोपीय व्यापारियों के मनोरंजन के लिए शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया जाता था. फिर धीरे-धीरे ये नाटक हिंदी और कई भाषाओँ में अनुवाद किए गए.

आज शेक्सपियर के जन्म के लगभग 500 साल बाद भी शेक्सपियर की छाप भारतीय नाटककारों पर साफ़ देखी जा सकती है.

('जो महिला धरती पर नहीं आना चाहता')

हाल में एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा) के सालाना नाटक समारोह में शेक्सपियर के 'जूलियस सीज़र' का असमिया संस्करण और 'ऑथेलो' के मलयाली अनुवाद 'यामादुथु' का मंचन किया गया.

पर आख़िर ऐसा क्या ख़ास है इन नाटकों में जो भारतीय नाटककारों को इतना लुभाते हैं?

विश्वप्रसिद्ध नाटक

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शेक्सपियर के नाटकों की दो ख़ास बातें हैं. पहली यह कि उनके सारे नाटक पूरे विश्व में मशहूर हैं. इन सभी नाटकों में एक ऐसा भाव तो होता ही है जिससे हर इंसान राब्ता रखता है.

शेक्सपियर के नाटकों की कहानी और उनका विषय समय और क्षेत्र तक सीमित नहीं है.

साल 2012 में मुम्बई के प्रसिद्ध नाटककार सुनील शॉनबाघ ने शेक्सपियर के नाटक 'ऑल इज़ वेल देट एंड्स वेल' को गुजराती में प्रस्तुत किया. इस नाटक 'मारो पियो गयो रंगून/सौ सारु जेनु छेवट सारु' का मंचन मई 2012 लंदन के वर्ल्ड शेक्सपियर फेस्टिवल में किया गया.

इस साल मई में एक बार फिर यह नाटक ग्लोब थिएटर में दिखाया जाएगा. नायिका मानसी पारेख गोहिल जो इस नाटक में 'हेली' (शेक्सपियर की 'हेलेना') का किरदार निभाती हैं, वह कहती हैं "शेक्सपियर के इस गुजराती अनुवाद में मुख्य भूमिका निभाना मेरे लिए बड़ी गर्व की बात है."

उन्होंने कहा, "ये नाटक संगीतमय होने के साथ-साथ काफी मज़ाकिया भी है. लंदन के ग्लोब थिएटर में जाकर इस नाटक का मंचन करना बहुत बड़ी बात है. 'सौ सारु जेनु छेवट सारु' गुजराती भाषा में आनेवाले शेक्सपियर नाटकों के लिए नए मापदंड तय करता है."

संजीदा पात्र

शेक्सपियर के नाटकों की दूसरी ख़ास बात है उनके पात्र. शेक्सपियर के नाटकों को ज़िंदा रखने का श्रेय उनके संजीदा और दिलचस्प पात्रों को जाता है. इन सभी किरदारों में एक ऐसी बुराई या अच्छाई है जो हमें आज भी अपने आस पास के लोगों में नज़र आ जाती हैं फिर चाहे वो 'मैकबेथ' का महत्वकांक्षी स्वभाव हो या फिर 'ऑथेलो' का ईर्ष्या भरा बरताव.

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थिएटर और फ़िल्म अभिनेता नमित दास जो निर्देशक अतुल कुमार के 'हैमलट द क्लाउन प्रिंस' में पोलोनियस बने थे, अपने अनुभव को कुछ इस तरह से बयान करते हैं, "कई बार ऐसा होता है कि हम अपने अंदर छुपे एक भाव को अच्छे तरीक़े से पहचानते है, समझते हैं लेकिन फिर भी हम उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते क्योंकि वह भाव या वह चीज़ समय के साथ, लोगों के साथ बदलते रहते हैं. हम बस उस भाव को महसूस कर सकते हैं और किसी को इसके बारे में नहीं बता सकते और यही शेक्सपियर के पात्रों में नज़र आता है जो उन्हें काफ़ी दिलचस्प बना देता है."

('नाटकों के लिए हो बजट')

वह कहते हैं, “वो पात्र जो भी कहते हैं वो सिर्फ़ ऊपरी तौर पर कहते हैं पर उनके मन में कुछ और ही चल रहा होता है. अपनी इसी भावना को पहचान कर मैंने पोलोनियस का किरदार निभाया और बाक़ी काम शेक्सपियर की कहानी ने कर दिया जिसने हमारे किरदारों को एक दिशा दी. शायद इसी वजह से शेक्सपियर के नाटक दुनियाभर में पसंद किए जाते हैं और लोग उन्हें देखना आज भी पसंद करते हैं.”

शेक्सपियर ने अपनी कहानियों में इंसानी बातचीत और मनोभाव का तालमेल बहुत ही सटीक ढंग से लिखा है जो एक इंसान के अंतर्मन की व्यथा को बड़ी सरलता से लोगों के सामने ला देता है.

यही वह चीज़ है जो हर रंगमंच का प्रेमी अनुभव करता है जब वह शेक्सपियर का कोई नाटक देखता है.

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