बाबू मोशाय ! ज़िंदगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ में है

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ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'आनंद' हिंदी सिनेमा की एक यादगार फ़िल्म मानी जाती है.

फ़िल्म अपनी भावपूर्ण कहानी और राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के बेमिसाल अभिनय के अलावा ज़बरदस्त डायलॉग के लिए भी जानी जाती है.

(पढ़िए: गुलज़ार पर बीबीसी की ख़ास पेशकश)

फ़िल्म के कई संवाद लोगों की आंखों में आंसू ला देते हैं. इन्हें लिखा है गुलज़ार ने.

ऐसी ही कई बेहतरीन संवाद गुलज़ार ने कई फ़िल्मों में लिखे हैं. एक नज़र गुलज़ार के कुछ चुनिंदा संवादों पर.

1. फ़िल्म: आनंद (1971)

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"बाबूमोशाय , ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है…उसे न आप बदल सकते हैं न मैं!"

2. फ़िल्म: नमक हराम (1973)

"जीने की आरज़ू में मरे जा रहे हैं लोग.… मरने की आरज़ू में जीए जा रहा हूं मैं!"

3. फ़िल्म: माचिस (1996)

"अरे कोई एक आदमी लड़ने के लिए गया और जाकर आज़ादी उठा कर ले आया और लाकर हमें दे दी के ये लो….आज़ादी तुम्हारे लिए लाये हैं बांट लो!"

4. फ़िल्म: साथिया (2002)

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"घर छोड़के शादी करने में एक फ़ायदा है.…लड़की बार बार माइके जाने की धमकी नहीं देती."

5. फ़िल्म: आंधी (1975)

"मेरा शौहर बनने की कोशिश मत करो. बीवी हो, बीवी की तरह रहो."

6. फ़िल्म: इजाज़त (1987)

"वहीँ..वही शहर है, वही गली, वही घर,सब कुछ.… सब कुछ वही तो नहीं है."

7. फ़िल्म: अंगूर (1982)

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"अब गुलाब का फूल ख़ूबसूरत है तो है. अब वो ख़ूबसूरत क्यों है, अबे छोड़ो ना यार."

8. फ़िल्म: चुपके चुपके (1975)

"हमारे देश में नमक खाने को तो मिलता नहीं. छिड़कने को कहां से मिलेगा. क्यों जीजाजी!."

9. फ़िल्म: बावर्ची (1972)

"किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में हम ये छोटी छोटी खुशियों के मौके खो देते हैं."

10. फ़िल्म: आनंद(1971)

"ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं बाबू मोशाय. जब तक ज़िंदा हूं, मरा नहीं. जब मर गया, तो साला मैं ही नहीं."

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