हम भटकते हैं, गुलज़ार कभी नहीं : दीप्ति नवल

गुलज़ार को लंबे समय से जानने वाले कुछ लोगों में शामिल अभिनेत्री और लेखिका दीप्ति नवल कहती हैं कि एक रचयिता के तौर पर गुलज़ार जैसा अनुशासित शख़्स दूसरा कोई नहीं है.

(जब गुलज़ार ने झगड़ा ख़त्म कराया)

गुलज़ार के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ख़ासियत पर टिप्पणी करते हुए दीप्ति कहती हैं ‘‘गुलज़ार के बारे में जब भी कोई पूछेगा तो ये कहना होगा को वो एक बेहद अनुशासित शख़्सियत हैं. हम लोग भटक जाते हैं. हमें खींच खींच कर ख़ुद को वापिस लाना पड़ता है लेकिन गुलज़ार लगातार उसी ट्रैक पर बने रहते हैं."

(गुलज़ार पर बीबीसी की ख़ास पेशकश)

"एक कवि आदम जो कभी भी भटक सकता है, कहीं और ही निकल सकता है उसके अंदर लेखन के लिए जो प्रतिबद्धता है वो मैने किसी और में नहीं देखी.’’

दीप्ति नवल की हिंदी कविताओं की किताब 'लम्हा-लम्हा' का परिचय गुलज़ार ने ही लिखा है.

पहली मुलाक़ात

गुलज़ार से दीप्ति नवल की मुलाक़ात उस वक्त हुई जब वो न्यूयॉर्क मे पढ़ाई कर रही थीं और गुलज़ार एक कार्यक्रम के सिलसिले में वहां गए.

(फ़ारुख़ शेख पर दीप्ति)

दीप्ति बताती हैं, "गुलज़ार पंडित रविशंकर जी से मिलने न्यूयॉर्क आए थे. शायद वो अपनी फ़िल्म मीरा का संगीत रविशंकर जी से कराना चाहते थे और रविशंकर जी का वहां एक कार्यक्रम था. वहीं पर पहली बार मुलाक़ात हुई. मैं कॉलेज के ज़माने से रेडियो शो किया करती थी तो उनका इंटरव्यू लेने वहां गई थी."

(गुलज़ार पर सुनिए दीप्ति नवल को)

कॉलेज के बाद दीप्ति जब मुंबई आई और फ़िल्में करने लगीं तो ये संपर्क लगातार बना रहा.

इतने सालों से गुलज़ार को बेहद क़रीब से जानने वाली दीप्ति उनकी शायरी के जुदा अंदाज़ पर कहती हैं,‘‘मैं गुलज़ार की भक्त हूं. उनकी शायरी में जो रवानगी है वो कहीं नहीं. वो जिस तरह बात कह देते हैं बस पानी की तरह और वो ज़ेहन में भीतर तक उतर जाती है."

(ज़िंदगी से प्रेरणा लेती हूं: दीप्ति नवल)

"लगता है जैसे ये बात तो बस ऐसे ही कही जा सकती थी. और तो कोई तरीक़ा ही नहीं है इसे कहने का.’’

दीप्ति मानती हैं कि गुलज़ार कहते हैं तो बहुत स्वाभाविक लगता है कोई और कहे तो लगता है बहुत ज़्यादा हो गया.

रचनात्मक सहयोग

दीप्ति नवल को लंबे समय से गुलज़ार से मिलने का मौक़ा नहीं मिल पाया है और इस पर वो कुछ शिकायत भरे लहजे में कहती हैं, "अब वो किसी को वक्त देना ही नहीं चाहते. कंजूस हो गए हैं."

हालांकि दीप्ति बताती हैं, ‘‘जब मैने हिंदुस्तानी में लिखना चाहा तो उसमें गुलज़ार साहब ने मेरी बहुत मदद की. वो उस वक्त मुझे मिले जब एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत थी जो मेरा साथ देता. मैं हमेशा लिखने के बाद उन्हें दिखाती थी और वो हमेशा मुझे बताते कि क्या तुम्हारी ताक़त है, उसको उभारो. ये क़मज़ोरी है उसे निकाल दो. वो मेरे मार्गदर्शक रहे हैं. मेरी पहली कविताओं की किताब की कविताएं उन्ही का चुनाव थीं.’’

सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार गुलज़ार को दिए जाने पर दीप्ति कहती हैं, मेरे ख़्याल से ये तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था. उनसे ज़्यादा कौन इस अवॉर्ड का हक़दार है.’’

दीप्ति नवल ने गुलज़ार की फ़िल्म 'अंगूर' में भी काम किया है.

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