गुलज़ार ने झगड़ा ख़त्म कराया: लता मंगेशकर

  • 2 मई 2014
लता मंगेशकर

78 साल के गुलज़ार के लिखे गानों के करोड़ों प्रशंसक हैं. लेकिन जब वो युवा थे तब भी उनके कद्रदानों की कमी नहीं थी.

उनके लिखे एक गाने की ऊष्मा ने संगीतकार एसडी बर्मन और गायिका लता मंगेशकर के रिश्तों पर पड़ी बर्फ़ को पिघला दिया.

दरअसल 60 के दशक में लता और सचिनदेव बर्मन के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा चल रहा था और लता, उनके लिए गा नहीं रही थीं.

उनका झगड़ा ख़त्म हुआ मशहूर शायर गुलज़ार की वजह से जो उन दिनों फ़िल्म उद्योग में बिलकुल नए थे.

(मैं फिलॉसफर नहीं हूं : गुलज़ार)

कुछ समय पहले बीबीसी से ख़ास बातचीत में गुलज़ार से जुड़ी ऐसी ही कई दिलचस्प बातें लता मंगेशकर ने बांटी.

लता ने बताया "बर्मन दादा के साथ मेरा झगड़ा चल रहा था. इस बीच एक दिन उनका फ़ोन आया कि एक नया लड़का आया है उसने फ़िल्म 'बंदिनी' के लिए ये गाना लिखा है 'मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे'. मुझे ये गाना इतना पसंद आया कि मैं गाने के लिए मान गई."

अनोखे हैं गुलज़ार

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लता मंगेशकर के मुताबिक गुलज़ार की शायरी बाकी शायरों से बिलकुल अलग होती है. उनके सोचने का ढंग बिलकुल जुदा होता है.

वो कहती हैं "कई बार मैं उनसे पूछती कि आपने ये शब्द क्यों लिखा है या ये लाइन क्यों लिखी है, तो वो सिर्फ़ हंस देते और कहते मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया. वो उसकी कोई वजह नहीं बताते. उन्हें जो अच्छा लगता है वो वही लिखते हैं."

(लम्हों में होती है ज़िंदगी: गुलज़ार)

गुलज़ार के लिखे लता के पसंदीदा गाने हैं 'नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा', 'यारा सीली-सीली' और 'पानी-पानी रे'.

लता मंगेशकर ने बताया कि उनके भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर भी गुलज़ार के बहुत बड़े प्रशंसक हैं.

वो कहती हैं "मैं भगवान की शुक्रगुज़ार हूं कि मुझे गुलज़ार के लिखे ढेर सारे गाने गाने का मौका मिला. उन्होंने आरडी बर्मन से लेकर विशाल तक के लिए गाने लिखे."

'फ़िल्मों के लिए लिखने में नहीं थी दिलचस्पी'

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में गुलज़ार ने बताया कि शायरी उनका पहला प्यार है, और जब उन्होंने अपने करियर का पहला फ़िल्मी गीत 'मोरा गोरा अंग लई ले' लिखा तो वो फ़िल्मों के लिए गाने लिखने को लेकर बहुत ज़्यादा उत्सुक नहीं थे, लेकिन फिर एक के बाद एक गाने लिखने का मौका मिलता गया और वो गाने लिखते चले गए.

(लद्दाख फ़िल्म समारोह के नज़ारे)

गुलज़ार ने 60 के दशक से लेकर अब तक ढेरों गीत लिखे हैं. उनके लिखे गानों ने लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ. वो हर किस्म के गाने लिखने में माहिर हैं.

'इस मोड़ से आते हैं कुछ सुस्त क़दम रस्ते', 'मुसाफ़िर हूं यारों', 'आने वाला पल जाने वाला है', 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है' से लेकर 'कजरारे-कजरारे' और 'बीड़ी जलई ले' जैसे गाने गुलज़ार के लेखन की विविधता को व्यक्त करते हैं.

उन्होंने शायरी और गाने लिखने के अलावा 'परिचय','आंधी','अंगूर','कोशिश' और 'माचिस' जैसी फ़िल्मों को लिखा और निर्देशित किया.

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