सर्कस की ख़ातिर मॉरिशस से भारत तक का सफ़र

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कभी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा सर्कस भारत में अपनी पहचान तेज़ी से खोता जा रहा है. हवा हो गए वो दिन जब किसी शहर में सर्कस का तंबू गड़ता था तो उस शहर की फ़िजां ही बदल जाती थी.

(सर्कस के 'शेर')

जितने दिन सर्कस चलता था मानो शहर में त्योहार का सा माहौल बन जाता था. लेकिन अब जानवर के करतब, जोकर की हँसी भारतीयों के लिए उतनी लुभावनी नहीं रह गई है.

ऐसे समय में भी सर्कस के दीवानों की कमी नहीं है और उनमें से एक हैं 21 साल की विक्टोरिया बुंगारू, जो मॉरिशस की रहने वाली हैं.

स्टूडेंट वीज़ा पर सर्कस

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हैरानी की बात ये है कि विक्टोरिया ने सर्कस की कलाबाज़ियां और परफॉर्मिंग आर्ट्स सीखने के लिए सर्कस के लिए विख्यात रूस या चीन जैसे देशों को नहीं बल्कि भारत को चुना.

पतली रस्सी पर चलना, रिंग के सहारे कलाबाज़ियां दिखाना और शरीर के लचीलेपन का इस्तेमाल कर जिम्नास्टिक के करतब दिखाना- इन सबकी ट्रेनिंग हासिल करने विक्टोरिया भारत आई हैं और उन्होंने अपनी ट्रेनिंग के लिए चुना है मुंबई स्थित प्रख्यात रेंबो सर्कस को.

(भाड़े की हंसी)

और विक्टोरिया सर्कस सीखने आई हैं स्टूडेंट वीज़ा पर.

शायद ये भारत के इतिहास में पहला मौक़ा होगा जब किसी दूसरे देश का नागरिक स्टूडेंट वीज़ा पर सर्कस की कलाबाजियां सीखने आया है.

कैसे किया फ़ैसला ?

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Image caption 21 साल की विक्टोरिया बुंगारू मॉरीशस से भारत सर्कस की ट्रेनिंग लेने आई हैं.

ये ख़्याल विक्टोरिया को आया कैसे? इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया, "मैं मॉरिशस में रेंबो सर्कस की दो कलाकारों रीता और रेनू से मिली थी. और उनसे इतनी प्रभावित हुई कि भारत आकर उनके साथ ये कला सीखने का फ़ैसला कर लिया. मैंने ये करतब तो चीन में भी नहीं देखे जो सर्कस सीखने के लिए सबसे अच्छी जगह मानी जाती है."

(महिला कॉमेडियन की मुश्किलें)

लेकिन सर्कस के प्रति उनकी दिलचस्पी की शुरुआत कब और कैसे हुई ?

(सर्कस के माहिर छात्र)

इसके जवाब में विक्टोरिया कहती हैं, "मेरा लचीला बदन था. मैंने डांस और जिमनास्टिक सीखा. जब मैं टीवी पर रियलिटी शो देखती थी तो मुझे लगता कि ये सब कारनामे तो मैं आसानी से कर लूंगी. फिर मैंने नेट पर चीन के एक सर्कस स्कूल को खोजा. उसमें मेरा चयन हो गया."

विक्टोरिया ने बताया कि चीन के उस स्कूल में सीखने के बाद भी उन्हें लगा कि कुछ अधूरा है. तब रीता और रेनू से मिलकर उन्होंने भारत आकर ट्रेनिंग करने का फ़ैसला किया.

काफ़ी कोशिशों के बाद विक्टोरिया ने अपने मां-बाप को इस बात के लिए राज़ी कर लिया.

परेशानी

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लेकिन विक्टोरिया को भारत आने के लिए वीज़ा मिलने में ख़ासी दिक़्क़तें पेश आईं.

वो स्टूडेंट वीज़ा पर सर्कस सीखने के लिए आना चाहती थीं लेकिन उनका ये अनुरोध ठुकरा दिया गया क्योंकि स्टूडेंट वीज़ा किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए ही दिया जाता है.

(भारतीय सर्कस के 125 साल)

सर्कस सीखने के लिए स्टूडेंट वीज़ा मिलने का प्रावधान नहीं है.

उन्होंने रेंबो सर्कस के मालिक सुजीत दिलीप से बात की तब सुजीत ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया.

विक्टोरिया के मुताबिक़ जब सुजीत ने भारतीय दूतावास से बात कर उन्हें समझाया तब जाकर उन्हें वीज़ा मिला.

'बुरे हालात'

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लेकिन भारत आकर भी उनकी परेशानियां ख़त्म नहीं हुईं. विक्टोरिया के साथ उनके पिता भी उन्हें मुंबई छोड़ने आए.

जब उन्होंने सर्कस और उसमें काम करने वाले कलाकारों की हालत देखी तो विक्टोरिया को वहां छोड़ने के लिए वो राज़ी ही नहीं हुए.

विक्टोरिया ने कहा, "यहां नहाने के लिए शॉवर नहीं होता था. मग से पानी डालकर नहाना पड़ता था. टॉयलेट पेपर नहीं था. टेंट में रहना पड़ता था. पूरा माहौल बिल्कुल अलग था."

लेकिन विक्टोरिया के सर्कस के प्रति समर्पण को देखकर उन्हें झुकना पड़ा और वो तैयार हो गए.

भारत में कद्र नहीं

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विक्टोरिया कहती हैं, "यहां का सर्कस बहुत अच्छा है. यहां के कलाकार बहुत मेहनती हैं और उनमें ज़बरदस्त समर्पण हैं. लेकिन अफ़सोस की बात तो ये है कि इनकी मेहनत को यहां पूछने वाला कोई नहीं है."

(भारतीय सर्कस का 'पतन')

वो कहती हैं कि भारत में सर्कस की ट्रेनिंग उपलब्ध है लेकिन यहां लोगों को अब सर्कस पसंद नहीं.

जबकि मॉ़रिशस के लोग सर्कस के दीवाने हैं, लेकिन वहां कोई ट्रेनिंग स्कूल नहीं है. इसलिए विक्टोरिया भारत में अपनी ट्रेनिंग ख़त्म करने के बाद मॉरिशस जाकर ट्रेनिंग स्कूल खोलना चाहती हैं.

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