ज्योत्सना मिलन–चलते-चलते ही चले जाना

ज्योत्स्ना मिलन

3 मई 2014 को मशहूर कवियत्री-लेखिका ज्योत्सना मिलन का देहांत हो गया. डाक्टर उनके दिल की बात समझ नहीं पाए और वो नाज़ुक सा दिल बिना कुछ कहे ख़ामोश हो गया.

आज यह कहना कि ज्योत्सना जी किस ऊंचे पाए की लेखिका और कवियत्री थीं असल में उन तमाम बातों को दोहराना भर होगा जो न जाने कब से कही जाती रही हैं. आज भी कही जा रही हैं. और अगर अपनी सामाजिक और साहित्यिक समझ पर भरोसा करूं तो यह तमाम बातें चलती भी रहेंगी.

यह कह चुकने के बाद जी चाहता है जोड़ दूं कि ‘हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ’. ज्योत्सना जी का लेखन जिस दाद का हक़दार था, उससे कुछ कम ही उन्हें मिला.

यह बात अगर कभी किसी को, मुझे मिलाकर, महसूस नहीं हुई तो उसकी वजह शायद ज्योत्सना जी ख़ुद थीं.

एक दोस्त

एक ऐसे समाज में जहां कमोबेश हर शख्स को किसी न किसी बात को लेकर ज़माने से शिकायत है, वहीं ज्योत्सना जी से मिलने पर दुनिया से अपने मुतालबे भी भूलने को जी चाहता था.

सामाजिक अन्याय और अत्याचार को लेकर वे भले ही उतेजित हो जाती हों लेकिन ख़ुद अपने लिए कुछ हासिल करने की तमन्ना या कुछ न मिल पाने का शिकवा उनकी ज़ात का हिस्सा कभी नहीं रहा.

अब ऐसे में कोई उनके हासिल और ना-हासिल के बारे क्या और कैसे सोचता, जब उनका होना ख़ुद इस समाज के लिए एक बड़ा हासिल था.

उनकी शख़्सियत की एक बेहद ख़ूबसूरत बात यह थी कि उम्र के सालों की गिनती उनके संदर्भ में बेहद बेमानी थी.

आप उन्हें हिंदी सहित्य के विराट रूप लेखक सचिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय या फ़िर निर्मल वर्मा के साथ बैठे बात करते देखें और या फिर नवीन सागर, उदयन वाजपेयी, राम कुमार तिवारी जैसे साहित्यिक, ज्योत्सना जी दोनों ही बार सिर्फ एक दोस्त नज़र आती थीं. न वे किसी से बड़ी थीं और न किसी से छोटी.

जान-पहचान

पीछे मुड़कर याद करता हूं तो जी चाहता है कहूं कि सदियों पहले उन्हें बिना जाने-पहचाने भोपाल के कुछ साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देखा था.

छोटे से क़द की यह औरत हर वक़्त तेज़ कदमों से आगे बढ़कर हर फ़ासले को छोटा बना देती थीं. चेहरे पर जब चश्मा लगा होता तो अकेले होंठ मुस्कराकर एक ख़ुशनुमा अहसास से भर देते थे. ज़ाहिर है जवाब में मेरे सवालों से भरे चेहरे पर भी जवाबी मुस्कान आ जाती.

आख़िर एक दिन ये अजनबीपन ख़त्म हुआ. क़िसी और एक दिन प्रोफेसर्स कालोनी में उनके पड़ोस में भी रहने लगा.

मकानों के बीच बस कुछ मकानों का फ़ासला था, लेकिन रिश्तों के बीच कोई फ़ासला न था. न मकानों का, और न हिजाबों का.

उस एक घर के दरवाज़े के पीछे चार लोग होते थे – रमेश चन्द्र शाह, ज्योत्सना जी, शम्पा और राजुला.

अगर आप दरवाज़े पर बिना आवाज़ दिए या फिर बिना घंटी बजाए, बाहर खड़े रहें तो आप इस धोखे में वापस लौट सकते थे कि घर पर कोई नहीं है.

सामंजस्य की तुला

आज की इस चीख़ती-चिलाती, ऊंची आवाज़ों से डराती हुई इस दुनिया में ऐसे पुर-सुकून कोनों को याद करना और याद दिलाना सवाब का काम मानता हूं.

इस परिवार की यह एक ख़ूबी रही है कि राजनैतिक और सामाजिक मसलों पर सहमति और असहमति पर एक दूसरे से खुलकर बात कर लेते मगर न कभी आवाज़ें ऊंची होतीं और न किसी चेहरे पर तनाव रह जाता.

शाह साहब और ज्योत्सना जी के बीच ही नहीं बल्कि दोनो बेटियों के बीच भी एक अदभुत सामंजस्य हमेशा बना रहा. इस सामंजस्य की तुला को हमेशा ज्योत्सना जी ही थामे हुए लगती थीं.

ज्योत्सना मिलन, अपनी इसी बेहतरीन इंसानी सिफ़त के साथ ही साथ या फिर इसी सिफ़त की बदौलत ही एक बेहतरीन लेखिका और बेहद दिलकश कवियत्री के तौर पर कामयाब हैं.

अपने इस बहु-आयामी लेखन कर्म में उन्होने दो कविता संग्रह – 'घर नहीं' और 'अपने आगे-आगे', दो उपन्यास – 'अपने साथ' और 'अ अस्तु का'. चार कहानी संग्रह – 'चीख़ के आर-पार', 'ख़ंडहर' तथा अन्य कहानियां, 'अंधेरे में इंतज़ार' और 'उम्मीद की दूसरी सूरत'.

आज जब वे अचानक और अविश्वसनीय रूप से जा चुकी हैं तो मुझे उनकी कविता ‘पीछे’ बेसाख़्ता याद आ रही है.

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