प्रवासियों के दर्द के साथ 'नया पता'

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"सिनेमा सिर्फ़ अमीरों के लिए ही नहीं होता. समाज के आइने के रूप में इसे भी आम लोगों की साधारण कहानियों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए."

इसी सोच के साथ फ़िल्म 'नया पता' के निर्देशक पवन श्रीवास्तव ने फ़िल्म बनाने की कोशिश की है.

यह फ़िल्म 90 के दशक में गन्ना मिलों के बंद होने के बाद नौकरी की तलाश में अपने माता-पिता और नई दुल्हन को छोड़कर बिहार के छपरा ज़िले से दिल्ली आए राम स्वारथ दुबे की कहानी है.

फ़िल्म के निर्देशक पवन श्रीवास्तव जाने-अनजाने में नायक दुबे के जीवन के भीतरी संघर्ष के माध्यम से प्रवास का मुद्दा केंद्र में ले आते हैं.

दो पतों के बीच की ज़िंदगी

श्रीवास्तव कहते हैं, "प्रवास केवल एक जगह से दूसरी नई जगह पलायन करना नहीं है यह दो पतों के बीच झूल रहे जीवन की बानगी भी है."

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इस फ़िल्म के माध्यम से वह प्रवासियों के भावनात्मक पक्ष को दिखाने की कोशिश करते हैं.

फ़िल्म के एक दृश्य में चांद की ओर देखते हुए नायक अपनी पत्नी से कहता है कि यह बहुत भाग्यशाली है क्योंकि इसका पता कभी नहीं बदलता.

दिल्ली रहते हुए नायक महसूस करता है कि उसने परिवार की ज़िम्मेदारियों को तो निभाया लेकिन कभी अपनी ज़िंदगी ना जी सका.

पटकथा

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छपरा ज़िले के मारवराह गांव के श्रीवास्तव के अवचेतन में यह विषय हमेशा से था लेकिन इस विषय पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा उनको रोज़गार की तलाश में बिहार से महानगरों की ओर गाड़ियों से पलायन करती भीड़ को देख कर मिली.

उन्होंने 2011 में 'नया पता' की कहानी लिखनी शुरू कर दी थी. उस वक़्त उन्हें बड़ी निराशा हुई जब उन्होंने फ़िल्म के बारे में कुछ निर्माताओं से बात की.

निर्माताओं ने फ़िल्म को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि इसमें पटकथा नहीं है.

लेकिन दोस्तों ने स्क्रिप्ट की सराहना की और फ़िल्म बनाने में साथ देने का वादा किया.

क्राउड फ़ंडिंग का सहारा

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श्रीवास्तव गर्व से बताते हैं कि नौ राज्यों के लोगों ने एक भोजपुरी फ़िल्म में काम किया है. पैसे की ज़रूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने क्राउड फंडिंग का सहारा लिया.

इसके तहत श्रीवास्तव ने छोटी सी अपील के साथ फ़ेसबुक पर एक पेज बनाया. ढाई साल के दौरान उन्होंने क्राउड फंडिंग से 11 लाख रुपए जुटाए.

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कम बजट से पैदा हुई चुनौतियों के बावजूद इस फ़िल्म के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया सराहनीय है.

यहां तक कि वरिष्ठ पत्रकार जावेद नकवी ने इसकी तुलना दो बीघा ज़मीन जैसी क्लासिक फ़िल्म से की है.

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